भारतेन्दुयुगीन प्रयोगात्मक और उपयोगितावादी कविता - Indian-era experimental and utilitarian poetry

द्विवेदी युग की कविता के सम्बन्ध में डॉ. शर्मा का मत है कि इस युग की अधिकांश कविताएँ प्रयोगात्मक हैं जिनमें कलात्मक स्थिरता का अभाव है। लेकिन इनके प्रारम्भिक कच्चेपन में सीखने की पर्याप्त सामग्री है। डॉ. शर्मा के अनुसार इस युग की कविता अधिकतर समाजोन्मुख है। उसका भावबोध अक्सर उथला, विचार शक्ति क्षीण और भाषा कमजोर है, लेकिन उसका उपयोगितावादी लक्ष्य स्पष्ट है। इस काव्यधारा में व्यक्तिवादी भावोद्गार कम हैं और यह रहस्यवाद की विरोधी है। इन कवियों ने जिन विषयों को कविता के लिए चुना उन पर छायावादी कवियों ने, और आगे चलकर प्रगतिवादी कवियों ने भी कविताएं लिखी हैं। इस युग की कविता का विकास छायावादी और प्रगतिशील कविता में होता है।।


विद्रोह और पलायन का रोमांटिक काव्य : छायावाद


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा 'छायावाद' को रहस्यवाद और काव्य शैली के दो अर्थों में सीमित कर परिभाषित करने से असहमत होकर डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि "छायावाद को इन दो अर्थों तक सीमित नहीं किया जा सकता । छायावाद हिन्दी साहित्य की रोमांटिक धारा है। वह मूलतः रीतिकालीन परम्परा की विरोधी है। वह एक मानववादी धारा है जिसका एक कमज़ोर पक्ष रहस्यवाद भी है।" (- 'आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना') डॉ. शर्मा छायावाद को थोथी नैतिकता, रूढ़िवाद और सामन्ती साम्राज्यवादी बन्धनों के प्रति विद्रोह मानते हैं। चूँकि यह विद्रोह मध्यवर्ग के तत्वावधान में हुआ था इसलिए इसके साथ मध्यवर्गीय पराजय और पलायन की भावना जुड़ी हुई है।


वस्तुतः डॉ. शर्मा ने छायावाद के उद्भव और विकास को हिन्दी साहित्य की परम्परा का एक सोपान माना है और उसे भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास के परिप्रेक्ष्य में देखा है। इस काव्यधारा को 'विकासमान आधुनिक भारत के अन्तर्विरोधों का साहित्य' कह कर उन्होंने इसकी शक्ति और सीमा स्पष्ट कर दी है। उनके अनुसार व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए सामाजिक स्वाधीनता की माँग, मानवीय प्रेम और शृंगार के स्वरों के साथ-साथ सामाजिक संरचना में परिवर्तन के लिए क्रान्ति और विप्लव का आह्वान छायावाद की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इन कवियों ने छन्द और भाषा में नये प्रयोग करके हिन्दी साहित्य में एक नये युग का सूत्रपात किया ।


हिन्दी की यथार्थवादी चेतना का एक स्तर छायावादी कविता में सामने आता है। डॉ. शर्मा यथार्थवादी धारा के विकास को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि "छायावाद से पहले और उसके समानान्तर, स्वाधीनता आन्दोलन से सम्बद्ध, जो 'इतिवृत्तात्मक' कविता लिखी जा रही थी, उसके नरम और गरम दो राजनैतिक पक्ष थे। नरम पक्ष के प्रतिनिधि थे मैथिलीशरण गुप्त और गरम पक्ष के प्रतिनिधि थे गयाप्रसाद शुक्ल सनेही 'त्रिशूल' । छायावाद ने गरम पक्ष से नाता जोड़ा, विशेषकर निराला ने छायावादी कविता में आरम्भ से ही भाषा, भाव, शिल्प इन सबके सम्मिलित स्तर पर एक अन्य धारा विकसित हो रही थी। यह धारा यथार्थवाद की थी।" (- 'नयी कविता और अस्तित्ववाद