व्यक्तिवादी आलोचना : अर्थ और स्वरूप - Individualist Criticism: Meaning and Form

सामान्य रूप से व्यक्ति को केन्द्र में रखकर साहित्य का विवेचन और मूल्यांकन करने की पद्धति को व्यक्तिवादी आलोचना पद्धति कहा जाता है। व्यक्तिवादी आलोचना अपने आप में पूर्ण रूप से स्वतन्त्र आलोचना-पद्धति नहीं है। अनेक आलोचना पद्धतियों में लेखक या आलोचक के व्यक्तिगत विचारों को महत्त्व दिया जाता है। एक प्रकार से ये सभी आलोचना पद्धतियाँ व्यक्तिवादी आलोचना पद्धतियाँ हैं।


वस्तुवादी आलोचना में रचना को कवि, पाठक और परिवेश जैसे बाह्य तत्त्वों से स्वतन्त्र माना जाता है। वस्तुवादी आलोचक साहित्यिक रचना का विवेचन एक आत्म-निर्भर और स्वायत्त वस्तु के रूप में करता है।

वह रचना के संगठन, संगति, सन्तुलन और एकता जैसे आन्तरिक अवयवों और उनके पारस्परिक सम्बन्धों के आधार पर उसका मूल्यांकन करता है। व्यक्तिवादी रचना में लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों, निर्णयों, मूल्यों और प्रवृत्तियों को समाहित करता है और उन्हें अपने लेखन का आधार बनाता है। यह माना जाता है कि रचना में अभिव्यक्त संवेदनाएँ किसी न किसी रूप में लेखक की संवेदनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। उदाहरण के लिए, व्यक्तिवादी आलोचना के अनुसार मुक्तिबोध की कविताओं में अभिव्यक्त ऊहापोह, संघर्ष और वैचारिक उलझनों को समझने के लिए मुक्तिबोध के व्यक्तित्व और जीवन-संघर्ष की जानकारी आवश्यक है,

उसके बिना उनकी कविताओं का पूरा और वास्तविक अर्थ खुलता ही नहीं है । जब आलोचक द्वारा उस रचना के विवेचन और मूल्यांकनमें इन्हीं आधारों को प्राथमिकता दी जाती है या स्वयं आलोचक की अभिरुचि और अनुभूति रचना के मूल्यांकनका आधार बनती है, तब भी वह आलोचना व्यक्तिवादी आलोचना कहलाती है।


वस्तुतः व्यक्तिवादी आलोचना रचना, रचनाकार, आलोचक और पाठक के अन्तस्सूत्रों पर आधारित होती है। रचना में अभिव्यक्त वैयक्तिकता के दो रूप हो सकते हैं।

एक रचना के पात्रों और स्थितियों की वैयक्तिकता और दूसरी रचनाकार के व्यक्तित्व और जीवन के प्रतिबिम्ब । रचनाकार अपनी रचना में अपने जीवनानुभावों, विचारों और कल्पनाओं को ही व्यक्त करता है। इस दृष्टि से रचना से उसका व्यक्तित्व अभिन्न हो जाता है। साहित्य का आलोचक रचना और रचनाकार सम्बन्धी उपर्युक्त बातों को अपने विवेचन का आधार बनाता है और अपनी जीवन-दृष्टि और व्यक्तिगत प्रतिभा से उसका मूल्यांकनकरता है। पाठक तक पहुँचने पर वह भी अपनी मानसिक, सामाजिक परिस्थिति तथा व्यक्तिगत अभिरुचि और अनुभूति के आधार पर उस रचना का अर्थ ग्रहण करता है। वह न केवल अर्थ ग्रहण करता है, बल्कि उस रचना में अपना अर्थ भरता भी है।


पाश्चात्य साहित्य-चिन्तन में पाठक के दृष्टिकोण से साहित्य को समझने के गम्भीर प्रयास हुए हैं और पाठक की निजी प्रतिक्रिया को महत्त्व दिया गया है। यह बताया गया है कि रचना का वास्तविक अर्थ रचनाकार के मन्तव्य और आलोचक के निष्कर्ष पर निर्भर नहीं होता है। एक पाठक भिन्न-भिन्न अवसरों और परिस्थितियों में एक ही रचना का भिन्न-भिन्न अर्थ कर सकता है।

अलग-अलग पाठकों द्वारा अलग-अलग अर्थ ग्रहण करना भी स्वाभाविक है। इसलिए पाठक द्वारा वस्तुतः रचना का पुनर्निर्माण किया जाता है और उसमें नये अर्थ भरे जाते हैं। पाठक प्रतिक्रिया आधारित इस आलोचना की मान्यता है कि हम यह सोचने में अधिक समय नहीं लगाते कि कोई कविता 'कविता' है या नहीं। हमारा यह निजी निर्णय इस बात की सार्थकता को परिलक्षित करता है कि किसी साहित्यिक रचना की अर्थवत्ता उसके प्रत्यक्ष इन्द्रियबोधात्मक स्वरूप या व्यक्त शब्दार्थ में न होकर पाठक द्वारा उसकी आत्मनिष्ठ पुनसृष्टि और उस पुनर्दृष्टि के सार्वजनिक प्रदर्शन में होती है।