व्यक्तिवादी आलोचना और साहित्यिक मूल्यांकन - Individualistic Criticism and Literary Evaluation
व्यक्तिवादी आलोचना पद्धति पाठक को यह सुविधा प्रदान करती है कि वह लेखक के जीवन-संघर्ष, व्यक्तित्व और विचारों के आलोक में कृति के अर्थ और मूल्य को समझ सके। कृति के सन्देश को पाठक के लिए सुबोध बनाने में कृतिकार के व्यक्तित्व और जीवन का ज्ञान बहुत सहायक हो सकता है। लेखक के व्यक्तित्व की जानकारी के अभाव में साहित्यिक आलोचना कभी-कभी एकांगी हो जाती है। लेखक के व्यक्तित्व की अच्छाइयों एवं सीमाओं के सन्दर्भ में कृति के अर्थ की सम्भावनाएँ बढ़ जाती है। यहाँ यह भी ध्यान देने की बात है कि व्यक्तित्व पर अधिक बल देने से उसके अन्य पक्षों की उपेक्षा होने की आशंका भी बढ़ जाती है।
लेखक का व्यक्तित्व और विचारधारा एक सीमा से आगे कृति के वस्तुपरक और स्वतन्त्र मूल्यांकनमें बाधा बन सकता है।
साहित्य के रूप, शैली और विषय वस्तु आदि के साथ-साथ उसके ऐतिहासिक परिवेश पर भी उचित ध्यान दिया जाना आवश्यक होता है। व्यक्तिवादी आलोचना की यह बहुत बड़ी सीमा है कि वह इन पक्षों को अधिक महत्त्व नहीं देती है। साहित्य के व्यापक रचनात्मक और मानवीय मूल्यों पर यह पद्धति अधिक ध्यान नहीं देती है, इसलिए कई बार साहित्यिक रचना व्यक्तिगत कल्पनाओं, कुण्ठाओं और रचनाकार के विचारों का पुंज बन जाती है।
यह आलोचना पद्धति साहित्य के व्यापक सन्दर्भों में व्यक्तित्व का अतिक्रमण करने वाली महान् रचनाओं का मूल्यांकनकरने में समर्थ नहीं है। रचना, रचनाकार और पाठक के अन्तरसम्बन्धों पर कृति का अर्थ, आस्वाद और महत्त्व निर्भर करता है। व्यक्तिवादी आलोचना के अन्तर्गत रचनाकार के व्यक्तित्व और जीवन के सन्दर्भ में रचना का विवेचन किया जाता है। रचना में अभिव्यक्त भावों और विचारों की संगति लेखक के व्यक्तित्व और जीवन स्थितियों से बिठाने का प्रयास भी किया जाता है। इस प्रक्रिया में पाठक द्वारा गृहीत अर्थ में कृति से अधिक महत्त्व कृतिकार का हो जाता है। यह स्थिति साहित्य के मूल लक्ष्य और अर्थ को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।
आलोचना का मुख्य लक्ष्य अच्छी रचना की पहचान करते हुए उसके मूल्य का निर्धारण करना और इस प्रकार दूसरे पाठकों में उसके प्रति रुचि पैदा करना होता है। इसके साथ-साथ वह रचना की संवेदना का विस्तार भी करती है ताकि पाठक को उसके मर्म तक पहुँचने में सुविधा हो। रचना की अनुभूति में सहायक होने में ही आलोचना की सार्थकता है। व्यक्तिवादी आलोचना में आलोचक की अपनी रुचि और पसंद ही उसकी रचना सम्बन्धी अनुभूति और निष्कर्षों का आधार होते हैं, इसलिए रचना की संवेदना का विस्तार करते हुए पाठक तक उसके मर्म को पहुँचाने में इस पद्धति का योगदान बहुत सीमित है।
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