प्रगतिवाद एवं प्रयोगवाद में निहित अन्तर - Inherent difference between progressivism and experimentalism

प्रगतिवाद हो या प्रयोगवाद, दोनों ही काव्य-दृष्टियाँ हिन्दी साहित्य के इतिहास में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। एक के बाद एक उभरी इन काव्य प्रवृत्तियों के स्वभाव में अत्यधिक अन्तर दिखाई देता है। यह अन्तर इतना अधिक है कि कई बार प्रयोगवाद प्रगतिवाद की केवल प्रतिक्रिया नहीं बल्कि विरोध में उभरा वाद प्रतीत होता है।


दोनों काव्य-दृष्टियों की पृष्ठभूमि, इनके पीछे कार्यरत विचारधाराओं को देखने के पश्चात् इन दो काव्य- दृष्टियों में निहित अन्तर स्वच्छ रूप से देखा जा सकता है। मूलतः प्रगतिवाद मार्क्सवादी दर्शन की ठोस जमीन पर उभरा वाद था।

मार्क्स के विचारों के प्रति यह इतना अधिक प्रतिबद्ध था कि उसमें समाज से इतर अन्य किसी विषय को किंचित भी स्थान न था । इस अतिसामाजिकता और सार्वजनिकता में वैयक्तिकता लुप्त सी हो गई । प्रगतिवादियों ने कला-समस्या पर कभी विचार नहीं किया। प्रचारीपन और विचारधारा का दबाव इतना अधिक था कि प्रगतिवाद में एक नीरस एकरसता आ गई और प्रयोगवाद का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो गया। प्रगतिवादी काव्य-दृष्टि के ठीक विपरीत प्रयोगवाद अत्यधिक व्यक्तिवादी भूमि पर टिका था। विशेष बात यह कि लीक का विरोध करने वाले प्रयोगवादियों ने अपनी वैयक्तिकता में छायावादियों की-सी भावुकता शामिल नहीं होने दी ।

अपने व्यक्तिवाद को बौद्धिकता की आधारभूमि पर मजबूती के साथ खड़ा करनेवाले प्रयोगवादी इस मायने में भी प्रगतिवादियों से पूर्णतः भिन्न सिद्ध हुए।


प्रगतिवादियों ने अपनी अभिव्यक्तियों में ग्रामीण जीवन के शब्द, शिल्प और संवेदनाओं को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया । लोकगीतों की शैली और संवेदना को उन्होंने बड़ी सहजता के साथ अपना लिया। इसके ठीक विपरीत प्रयोगवादी कविता अधिकतर शहरी जीवन की जटिलताओं को बौद्धिकता के साथ व्यक्त करती थी।


प्रगतिवादी कविता जिस बेलौसपन के साथ आगे बढ़ती गई, उस बेलौस निश्चिन्तता का प्रयोगवादी कविता ने न केवल निषेध किया बल्कि वह अपनी सन्देह व आशंका को कविता में अधिकाधिक स्थान देने लगी। जहाँ स्पष्ट व स्थिर शैली प्रगतिवाद की विशेषता कहलायी वहीं संकेतपूर्ण शैली को प्रयोगवादी विशेषता माना गया।


भाव, भाषा, शिल्प-संवेदना के लगभग हर स्तर पर प्रयोगवाद अपने पूर्ववर्ती प्रगतिवाद से भिन्न सिद्ध होता है। बावजूद इसके दोनों काव्य-दृष्टियों में स्थित इस भिन्नता को कहाँ तक उचित और अन्तिम माना जाए, यह भी एक विचारणीय प्रश्न है।


1943 में प्रकाशित तारसप्तक में मुक्तिबोध की सोलह, नेमिचन्द जैन की दस, भारतभूषण अग्रवाल की तेरह,

प्रभाकर माचवे की तेईस गिरिजाकुमार माथुर की बारह, रामविलास शर्मा की उन्नीस और अज्ञेय की सत्रह अर्थात् एक सौ दस कविताएँ शामिल थीं। 'हिन्दी कविता की प्रगतिशील भूमिका' (सं. प्रभाकर श्रोत्रिय) में डॉ. रणजीत इन कविताओं का विश्लेषण कर स्पष्ट करते हैं कि मुक्तिबोध की सोलह में से दस, नेमिचन्द जैन की दस में से छह, भारतभूषण अग्रवाल की तेरह में से आठ, प्रभाकर माचवे की तेईस में से नौ गिरिजाकुमार माथुर की बारह में से एक, रामविलास शर्मा की उन्नीस में से चौदह और स्वयं अज्ञेय की सत्रह में से सोलह कविताएँ प्रगतिशील कविताएँ हैं। इस संख्या के आधार पर वे 'तारसप्तक' को प्रगतिशील कविताओं का संकलन मानते हैं।


इस आधार पर प्रयोगवादी कवि तथा काव्य-दृष्टि का विश्लेषण करें तो विशुद्ध प्रयोगवादी कवियों की संख्या अत्यधिक कम है। विशुद्ध प्रयोगवादी की तुलना में सामाजिकता की पृष्ठभूमि को बनाये रखते हुए नवनिर्माण के लिए उत्सुक प्रगतिशील प्रयोगवादियों की संख्या अधिक है। परिवेशगत विडम्बनाओं की बेचैनी को भीतर समेटते हुए, उलझी संवेदनाओं के साथ समाजहित के लिए प्रयासरत कवि भाषा और भाव को लेकर विविध प्रयोग करते पाए जाते हैं। इन्हें देखने के पश्चात् इस बात को स्वीकारना होगा कि प्रगतिवाद और प्रयोगवाद दो सिरों पर खड़े बाद लगते हैं लेकिन गहरा अध्ययन इनकी परस्पर उपकारकर्त्ता की भूमिका को अधोरेखित करता है।

कविता को लेकर पश्चिमी विचारधाराओं के अधीन होकर सोचने की अपेक्षा स्वतन्त्र रूप से सोचें तो कुछेक बातें सामने आयेंगी।


भारतीय दृष्टि मूलतः परम्परा में विश्वास रखती है। समय के अन्तराल में प्राचीन तत्त्वों का क्षरण होता अवश्य है किन्तु यही तत्त्व नवीनता का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। इस दृष्टि से प्रगतिवाद हो या प्रयोगवाद, दो भिन्न काव्य-दृष्टियों में निहित अन्तर विषमता को नहीं बल्कि परम्परा और क्रमिक विकास के सिद्धान्त को ही अधोरेखित करता है।


नये पथ के अन्वेषण की भावना


प्रयोगवाद हिन्दी कविता की एक विवादास्पद काव्य प्रवृत्ति है। कुछ तो अज्ञेय के विचारों का अनुगमन करते हुए और कुछ स्वयंस्फूर्ति के साथ प्रयोगवाद ने जिन लक्ष्यों का निर्धारण किया,

उनमें पहला ही लक्ष्य प्रयोगवादी आस्थाओं के आधार पर नवीन कला-मूल्यों की स्थापना करना था। प्रगतिवादी काव्य का विरोध करने के मूल में भी कई बार प्रगतिवाद में निहित परिपाटी पर चलने का भाव, स्वच्छन्द वैयक्तिकता का अभाव, राजनीति से प्रतिबद्ध व संचलित होकर किया गया लेखन आदि मुद्दे कारणभूत रहे। प्रयोगवादियों में प्राचीन के प्रति घृणा और नवीनता के प्रति अत्यधिक मोह का भाव स्पष्ट दिखाई देता है।


रामधारीसिंह 'दिनकर' 'काव्य की भूमिका' में लिखते हैं- "प्रगतिवाद आन्दोलन अभी चल ही रहा था कि 'तारसप्तक' का पहला भाग प्रकाशित हुआ, जो इस बात की सूचना थी कि हिन्दी के नये कवि कविता की प्रचलित शैली से संतुष्ट नहीं थे।"


स्पष्ट है, प्रयोगवाद के मूल में ही नये पथ के अन्वेषण की भावना प्रगाढ़ रूप से कार्यरत थी। इसी नवीनता की ललक ने स्वभाव, मत, विचार और मूल्यगत भिन्नता के कवियों को एक सूत्र में बाँधा । काव्य के प्रति अन्वेषी दृष्टिकोण सभी कवियों में दृष्टिगोचर होने वाला एकमात्र समान तत्त्व था। जिन कवियों में प्रयोग की प्रवृत्ति एवं नये पथ के अन्वेषण की भावना का अभाव था, उन्हें अज्ञेय ने 'तारसप्तक' में शामिल नहीं किया। इस सन्दर्भ में अज्ञेय के मतानुसार सप्तक के कवियों ने यहाँ तक कह दिया कि यदि अन्ततः 'तारसप्तक' के पाठक वे ही बचे तो भी उन्हें कोई पछतावा नहीं । अर्थात् उन्हें अपने कविता को मोर्चे में अकेला होना मान्य था किन्तु नवीन पथ के प्रति आग्रही भूमिका के साथ कोई समझौता मान्य नहीं था ।


'तारसप्तक' का लगभग प्रत्येक कवि अपने पथ को ढूंढने के लिए बेचैन था । प्रगतिवाद पर आलोचनात्मक कटाक्ष करते हुए प्रयोगवादियों ने एक बात स्पष्ट कर दी थी कि नये प्रयोगों को अपनाकर ही काव्य- निर्माण से जुड़ी कई कमियों को दूर किया जा सकता है। अज्ञेय इस सन्दर्भ में कहते हैं "नवोन्मेष से - विस्फूर्जित और उत्सेकित कल्पना की हिन्दी कविता में कमी है। उसके लिए हमें अपना अलंकार- विधान आमूल बदलना होगा । उपमान माँजने होंगे, रूपकों की कलई खोलनी होगी, उत्प्रेक्षाएँ सचमुच भाव के उत्स से उत्प्रेरित हैं। या नहीं यह देखना होगा । "

अज्ञेय के इस वक्तव्य से एक बात स्पष्ट होती है कि अज्ञेय स्वयं एवं उनके प्रयोगवादी कवि कमोबेश मात्रा में जिस नये पथ के अन्वेषण के आकांक्षी थे वह पथ अधिकतर कविता के शिल्प-पक्ष से जुड़ा हुआ था। कविता की वस्तु में नवीनता के लिए जो आग्रह किये गए वे शिल्प- -पक्ष की तुलना में कम ही रहे।


प्रयोगवादी कवियों ने साधारणीकरण और सम्प्रेषण की समस्या पर विचार करते हुए पाया कि इन समस्याओं का निवारण भी नवीनता को अपनाकर ही किया जा सकता है। साधारणीकरण केवल नये प्रयोगों से सम्भव है। यदि पुरानी सामग्री से सम्प्रेषण की समस्या हल हो जाती तो प्रयोगों की ओर जाने का कोई प्रयोजन ही नहीं था ।

प्रयोगवादी कवियों ने इसी नयी दृष्टि से व्यक्ति और समाज को परखा है। संवेदनाओं के स्तर पर भी नयेपन के आकांक्षी कवि नये क्षेत्रों का अन्वेषण करते पाया जाते हैं "प्रयोग सभी कालों के कवियों ने किए हैं - किन्तु कवि क्रमशः अनुभव करता आया है कि जिन क्षेत्रों में प्रयोग हुए हैं, उनसे आगे बढ़कर अब उन क्षेत्रों का अन्वेषण करना चाहिए जिन्हें अभी नहीं छुआ गया, या जिनको अभेद्य मान लिया गया है" तात्पर्य यह कि 'तारसप्तक' के लगभग सभी कवि कविता की पारम्परिक संवेदनाओं तथा शैलियों से असंतुष्ट होकर नये पथ का अन्वेषण करते-करते ही प्रयोगवादी बने थे। नये पक्ष के अन्वेषण के लिए सभी प्रयोगवादी कटिबद्ध थे।

विषय- वस्तु का नयापन हो या भाषा पक्ष का नयापन हो, इन कवियों का प्राप्य रहा बल्कि कह सकते हैं कि नये पथ के अन्वेषण की प्रबल आकांक्षा ही प्रयोगवादियों को 'प्रयोग' करने के लिए विवश करती थी। नयेपन की आकांक्षा से प्रेरित यह कवि परम्परापालन के लिए आग्रही दृष्टिकोण रखने वालों को दो टूक सुनाते हैं- "जो लोग प्रयोग की निन्दा करने के लिए परम्परा की दुहाई देते हैं, वे भूल जाते हैं कि परम्परा कम से कम कवि के लिए ऐसी कोई पोटली बाँधकर अलग रखी हुई चीज नहीं है जिसे वह उठाकर सिर पर लाद ले और चल निकले। (कुछ आलोचकों के लिए भले ही वैसा हो) परम्परा का कवि के लिए कोई अर्थ नहीं है जब तक वह उसे ठोक बजाकर,

तोड़-मरोड़कर देखकर आत्मसात नहीं कर लेता, जब तक वह एक इतना गहरा संस्कार नहीं बन जाती कि उसका चेष्टापूर्वक ध्यानकर उसका निर्वाह करना अनावश्यक न हो जाए..."8 अज्ञेय समेत प्रयोगवाद के सभी कवि नये भाव, नये विषय, नयी संवेदनाएँ, नयी भाषा की तलाश में जुटे रहे। उनकी दृष्टि में नयेपन का अन्वेषण अनिवार्य था क्योंकि तथ्यों को संस्कारबद्ध पुरानेपन ने जकड़ लिया था। इस जकड़न से मुक्ति पाने के लिए प्रयोगवादियों को नयेपन का अन्वेषण अपरिहार्य लगा।


नये शिल्प का प्रयोग


प्रयोगवादी कवि शिल्प प्रयोग को लेकर अत्यन्त सतर्क रहे हैं। संवेदना व वस्तु-तत्त्व को ठोसपन प्रदान करने वाले एक पूरक तत्त्व के रूप में शिल्प की स्वीकार्यता की अपेक्षा प्रयोगवादियों ने शिल्प को उसके स्वतन्त्र अस्तित्व के साथ स्वीकारा।

अज्ञेय ने शिल्प की तुलना में वस्तु को अधिक महत्त्व देने की वृत्ति का निषेध किया है। 'तारसप्तक' में वे स्पष्ट कर चुके थे "वस्तु को शिल्प से अलग नहीं किया जा सकता।" अज्ञेय समेत समस्त - प्रयोगवादी कवि शिल्प को केवल एक 'फॉर्म' मात्र नहीं मानते थे अतः शिल्प को असाधारण महत्त्व देते थे। वे यह भी स्वीकार करते थे कि शिल्प-प्रयोग में कृत्रिम छन्द-विधान आदि रचना की संवेदनाओं का प्रभाव कम करते हैं किन्तु वस्तु के लिए पूरकछन्द, अलंकार, बिम्ब, प्रतीकादि के कारण वस्तु अधिक प्रभावपूर्ण बन जाती है। इस दृष्टि से प्रयोगवादियों ने भरसक प्रयास किए कि रचना के सम्प्रेषण के लिए अनुकूल शिल्प के नावीन्यपूर्ण प्रयोग किये जाए ।

सामान्यतः कवि अपनी संवेदनाओं को जिन साधनों द्वारा प्रस्तुत करता है, वे साधन शिल्पगत उपकरण कहलाते हैं। प्रयोगवादी कवियों ने ऐसे नये-नये साधन तलाशने का प्रयास किया। उनके मतानुसार उनकी मौलिक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति प्राचीन शिल्पगत उपकरणों के माध्यम से सम्भव नहीं थी । अतः नवीन शिल्पगत उपकरणों को तलाशना अनिवार्य था । जहाँ प्रयोगवादी कवियों ने प्राचीन, प्रचलित उपकरणों को उपयुक्त जाना वहाँ भी उन्हें पारम्परिक रूप में यथावत प्रयोग करने की अपेक्षा नवीन संस्कार के साथ प्रयुक्त किया। बिम्ब, प्रतीक, अप्रस्तुत योजना, शब्द, भाषा, छन्द, मिथक आदि के नव्यतम प्रयोग के साथ प्रयोगवादियों ने अपना रचना संसार सजाया।


बिम्ब का प्रयोग


बिम्बों की सार्थकता उनके उभरने में होती है। प्रयोगवादियों द्वारा प्रयुक्त बिम्ब-विधान इतनी नवीनता लिये हुए है कि कई बार सम्प्रेषण बाधित हो जाता है। व्यक्तिगत अनुभवों को व्यापक सामाजिक फलक प्रदान करने हेतु बिम्ब प्रयोग किया जाता है क्योंकि हमारी सोच के मूल में बिम्ब विद्यमान होते हैं। एक कवि जब बिम्ब- प्रयोग करता है तो अपने ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्रहण किये गए नितान्त स्थूल बिम्बों को कल्पना के स्तर पर नवीन रूप प्रदान कर प्रस्तुत करता है। इसी कारण कई आलोचक बिम्ब-प्रधान भाषा को ही सफल काव्य भाषा मानते हैं। प्रयोगवादी कवि अपनी काव्य-भाषा को बिम्बप्रधान बनाने के लिए प्रयासरत रहे।

बिम्बों के सार्थक प्रयोग की महिमा अज्ञेय जैसे कवि खूब जानते थे। अतः उन्होंने ऐसे बिम्ब चुने जो पाठकों के मन में प्रतिमा निर्माण करने में सक्षम हों, ऐसे बिम्ब चुने जो पाठकों के व्यक्तिगत अनुभवों से जुड़कर व्यापक सामाजिक अर्थग्रहण में सार्थक सिद्ध हों। प्रयोगवादी कवियों ने नवीन शिल्प प्रयोगों में बिम्ब का उपयोग करते हुए अपनी काव्य-भाषा को अधिक सजीव व मूर्त बनाया। बिम्बों ने भी उनके चिन्तन को सम्प्रेषणीय और संवेदनाओं को मूर्त बनाकर पाठकों तक पहुँचाया । प्रयोगवादी कवि ऐन्द्रिय बिम्ब-प्रयोग में अधिक रमे हुए प्रतीत होते हैं। इसके अलावा प्राकृतिक, पौराणिक, मनोवैज्ञानिक, गन्ध-स्पर्श बिम्बों का मार्मिक प्रयोग प्रयोगवादी कविता के शिल्प-विधान में नवीनता का समावेश कर गया।

नवीन शिल्प प्रयोग करने के क्रम में धीरे-धीरे प्रयोगवादी कवि ऐसे बिम्बों का प्रयोग करने लगे जो ऐन्द्रिय बिम्बों के दायरे में नहीं आते। जीवन-सत्य की जटिलता, विचित्र अनुभव, खण्डित मानसिकता, रहस्यपूर्णता और विविध भावनाओं को उद्दीप्त करनेवाली बिम्बाभिव्यक्ति इस दौर की कविता की विशेषता रही।


अज्ञेय ने अपनी 'असाध्य वीणा' में शिल्प प्रयोग के कई अभूतपूर्व उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। ध्वनि बिम्बों के प्रयोग का एक अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत है-


हरी तलहटी, में, छोटे पेड़ों की ओट, ताल पर बँधे समय वन पशुओं की नानाविध आतुर तृप्त पुकारें गर्जन,

घुर्धर, चीख, भूक, हुक्का, चिचियाहट ।


अज्ञेय जैसे प्रयोगवादी कवियों ने शिल्प की दृष्टि से इतने नवीन प्रयोग किए कि उनकी ताज़गी काव्य- शिल्प में नवीन प्राण फूँक देती है। उन्होंने कई रंग-बिरंगी छटाओं को अपने काव्य-शिल्प में जीवन्त बना दिया । प्रयोगवादी कवियों को विशेषतः अज्ञेय को रंगों का खूब ज्ञान था। वे बड़ी बारीकी से मिश्रित अमिश्रित रंग-रूपों का सार्थक प्रयोग करते हैं। इस संश्लिष्ट रंगप्रयोग के माध्यम से वे संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है -


गेहूँ की हरी बालियों में से


कभी राई की उजली,


कभी सरसों की पीली फूल - ज्योत्स्ना दिप गई कभी लघु नीलिमा तीसी की चमकी और छिप गई । 10


कभी लाली पोस्ते की सहसा चौंका गई -


ठीक इसी प्रकार रस, गन्ध, स्पर्श बिम्बों से लेकर विराट् बिम्बों तक कई अप्रतिम बिम्ब-प्रयोग प्रयोगवादी कवियों ने किये हैं।