आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के अनुसार प्रेमचंद का विवेचन - Interpretation of Premchand according to Acharya Nanddulare Vajpayee
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने अपने विचारों और साहित्यिक निष्कर्षो में निरन्तर संशोधन और परिवर्तन किया है। अपने प्रारम्भिक लेखन में उन्होंने प्रेमचंद को स्थायी महत्त्व का कथाकार न मान कर सामयिक घटनाओं का लेखक माना था। उनके साहित्य की सोद्देश्यता को भी प्रचारात्मक बताकर उसकी आलोचना की थी। इसका कारण बताते हुए उन्होंने लिखा था कि "हम तो रचयिता की सम्पूर्ण कृतियों में एक अन्तर्निहित चेतनधारा देखना चाहते हैं। यह धारा हमें प्रेमचंद में नहीं मिलती। घटना बाहुल्य और वर्णनों का अनावश्यक विस्तार उनमें बहुत अधिक है। इससे उनकी कला में स्थूलता आ गई है।" (- हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी') लेकिन हम देखेंगे कि आगे चलकर उन्होंने अपने इन आलोचकीय निष्कर्षों में संशोधन किया है।
वाजपेयी जी ने प्रेमचंद की औपन्यासिक यात्रा के विकास को दो सोपानों के अन्तर्गत रखकर देखा है। प्रथम सोपान में 'सेवासदन', 'प्रेमाश्रम' और 'रंगभूमि' और दूसरे में 'गबन', 'कायाकल्प', 'कर्मभूमि' और 'गोदान' को रखा है। 'गबन' से प्रेमचंद के उपन्यास साहित्य के प्रौढ़ काल की शुरूआत मानी है। उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानी कला का विवेचन अपनी पुस्तक 'प्रेमचंद एक विवेचन' में किया है। उनकी पद्धति कृति के सर्जनात्मक वैशिष्ट्य के उद्घाटन की न होकर उपन्यास की सम्पूर्ण व्यवस्था के विभिन्न तत्त्वों के आधार पर उसे परखने की है। मुख्यतः उपन्यास के कथानक, चरित्र चित्रण, विचार विवेचन, कला विवेचन आदि की दृष्टि से उपन्यासों का मूल्यांकन किया गया है।
इस पद्धति से प्रेमचंद का मूल्यांकन करने के कारण उनकी आलोचना में तटस्थता की कुछ कमी दिखाई देती है और उसमें असंगतियाँ भी हैं। प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' के सम्बन्ध में उनका यह निष्कर्ष असंगत और पूर्वाग्रहयुक्त जान पड़ता है- " 'गोदान' में न तो महाकाव्य के से औदात्य और उत्कर्ष का समारम्भ आया है और न गहनतम उच्छवास का सा सीमित और तन्मयकारी प्रभाव ही व्यक्त हो पाया है। हमारी दृष्टि में वह राष्ट्रीय प्रतिनिधि उपन्यास की उन शर्तों को पूरा नहीं करता जिन्हें टॉलस्टाय का 'वार एंड पीस' उपन्यास करता है ।" (- 'प्रेमचंद : एक विवेचन')
प्रेमचंद के चरित्रों का किसी वर्ग का प्रतिनिधि होना वाजपेयी जी के अनुसार प्रेमचंद के उपन्यासों का कमज़ोर पक्ष है।
‘प्रेमाश्रम' के चरित्रों में वे वैयक्तिक चित्रण का अभाव देखते हैं। इस पक्ष की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा है कि "प्रतिनिधि पात्रों के रहने से उपन्यास का आकर्षण घट जाता है। इसमें मार्मिक परिस्थितियों और सूक्ष्म मानसिक तथ्यों आदि का चित्रण नहीं हो पाता। केवल मोट-मोटे चारित्रिक पहलू ही उभर पाते हैं।" (- 'प्रेमचंद : एक विवेचन') वाजपेयी जी के अनुसार प्रेमचंद के उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आदर्शवादिता है। प्रेमचंद चरित्रों और उनकी प्रवृत्तियों के साथ-साथ परिस्थितियों और घटनाओं के चित्रण में सदैव आदर्श का लक्ष्य रखते हैं।
उनकी दूसरी मुख्य विशेषता सोद्देश्यता है। उन्होंने प्रेमचंद के उपन्यासों के सम्बन्ध में आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद या यथार्थोन्मुखी आदर्शवाद जैसे शब्दों के प्रयोग को अनुचित बताया है और प्रेमचंद को पूरी तरह आदर्शवादी लेखक घोषित किया है "वास्तव में प्रेमचंद जी अपने विचार और लेखन में आदर्शवादी हैं। आपका चरित्र-चित्रण और मनोवैज्ञानिक चित्रण आदर्शवादी हैं।" (वही) प्रेमचंद के उपन्यासों में आदर्शवाद के स्वरूप को व्याख्यायित करते हुए वाजपेयी जी लिखते हैं कि "प्रेमचंद के उपन्यास समाज की वास्तविक गतिविधि से इतना सीधा सम्बन्ध रखते हैं कि उनकी कला अत्यधिक यथार्थ भूमि पर काम करती प्रतीत होती है;
परन्तु यथार्थ के इस आवरण में काम करती हुई प्रेमचंद की कला वस्तुतः आदर्शप्रधान है।" (- 'आधुनिक साहित्य' ) इस आदर्शवाद की विशेषता यह है कि "उनके उपन्यासों का वस्तुचयन और घटनाविकास अत्यधिक प्रत्यक्ष भूमि पर किया गया है; परन्तु उनके चरित्र प्रमुख रूप से आदर्शवादी हैं । " (- 'आधुनिक साहित्य')
अपनी पुस्तक 'नया साहित्य : नये प्रश्न' के 'निकष' में प्रेमचंद के उपन्यासों सम्बन्धी अपने पूर्ववर्ती विचारों की समीक्षा करते हुए उन्होंने स्वीकार किया है कि पहले उनकी दृष्टि प्रेमचंद के उपन्यासों के दुर्बल पक्ष पर ही गई थी।
बाद में उन्हें यह अहसास हुआ कि इन उपन्यासों का एक अत्यधिक सबल पक्ष भी है। उन्होंने इस सबल पक्ष की व्याख्या करते हुए लिखा है कि "उनका सबल पक्ष है भारतीय परिस्थितियों और विशेषकर भारतीय ग्रामों का उनका विशाल अनुभव और उससे भी बढ़कर ग्रामीण जन-समाज के प्रति उनकी अपार सहानुभूति । उनकी एक तीसरी विशेषता जिसमें वे बड़ी हद तक पारंगत है, उनका नैतिक दृष्टिकोण है जिसके कारण उनके उपन्यासों में एक भी अश्लील चित्र नहीं मिलता।" (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न') अपने इस परिवर्तित दृष्टिकोण के अनुसार उन्होंने प्रेमचंद की दृष्टि को उनकी आस्था से आलोकित होकर भी अन्ततः वस्तून्मुखी घोषित किया है।
उन्होंने लिखा है कि "प्रेमचंद के उपन्यास कतिपय स्पष्ट सीमाओं के रहते हुए भी राष्ट्रीय श्रेणी की कृतियाँ हैं, जिन्हें हम विदेशों में भारतीय प्रतिभा के नमूने के तौर पर रख सकते हैं।" (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न) उन्होंने प्रेमचंद की उपन्यास रचना में उत्तरोत्तर विकास को रेखांकित किया है और उनकी अन्तिम रचना 'गोदान' को उनकी सर्वोत्कृष्ट रचना माना है।
प्रेमचंद के उपन्यासों की समीक्षा के साथ उनकी कहानियों की समीक्षा भी वाजपेयी जी ने की है। प्रेमचंद को वाजपेयी जी हिन्दी का ही नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय साहित्य का सर्वश्रेष्ठ लेखक मानते हैं। उनके अनुसार प्रेमचंद की कथा-शैली अतिरंजना प्रधान है। वे करुणा की अपेक्षा हास्य और व्यंग्य की भाव- सृष्टि अधिक सफलता से करते हैं। प्रेमचंद की कहानियों की विशेषताएँ बताते हुए उन्होंने लिखा है कि "साधारण विवेक, अनुभव की प्रौढ़ता, आत्मविश्वास और कथा का स्वाभाविक सौन्दर्य प्रेमचंद की ऐसी विशेषता है, जो उन्हें हिन्दी कहानियों का श्रेष्ठ निर्माता सिद्ध करती हैं। प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि अतिशय उदार और तथ्यपूर्ण है।" (- 'आधुनिक साहित्य')
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