कला और ध्यान-साधना में अन्तर सम्बन्ध - Interrelationship between art and meditation

असाध्य वीणा का मूल प्रतिपाद्य


कला और ध्यान-साधना में गहरा सम्बन्ध होता है। कला को आध्यात्मिक साधना के रूप में बरतने की भारत में पुरानी परम्परा रही हैं। कबीर और सूफी सन्तों की कविताओं में इस बात के अनेक प्रमाण भरे पड़े हैं। ताजमहल और अजंता एल्लोरा की गुफाएँ और खजुराहो के मन्दिर भी आज की तरह पर्यटन के स्थल मात्र नहीं थे बल्कि वे ध्यान-साधना के विशिष्ट केन्द्र थे और उनका वास्तु विन्यास भी इसी बात को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया था। आधुनिकता के आगमन से इहलौकिकता और भौतिकता का जोर बढ़ा और कला और अध्यात्म के आपसी सम्बन्ध की बात पृष्ठभूमि में चली गई। अज्ञेय इस भूली-बिसरी काव्य-परम्परा को पुनः कविता के केन्द्र में लेकर आते हैं।

और इस तरह भारतीय काव्य-परम्परा का पुनराविष्कार करते हैं। 'असाध्य वीणा' कविता की शुरुआत में ही अज्ञेय कला और अध्यात्म के इस आपसी सम्बन्ध का संकेत कर देते हैं। इस कविता में प्रियंवद केशकम्बली कहता है-


राजन ! पर मैं तो


कलावंत हूँ नहीं, शिष्य, साधक हूँ- जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी ।


वज्रकीर्ति !


प्राचीन किरीटी तरु !


अभिमंत्रित वीणा !


ध्यान मात्र इनका तो गद्गद् विह्वल कर देने वाला है !


प्रियंवद कलाकार नहीं है। वह तो साधक है। इसीलिए वह वीणा को बजाने का अहंकार नहीं करता है। वह वीणा को बजाने की चेष्टा भी नहीं करता है। इसके विपरीत वह वीणा, किरीटी तरु और वीणा बनाने वाले वज्रकीर्ति में ध्यान लगाता है। वह कलाविद होने के अहंकार को नहीं पालता है। वह आत्माभिव्यक्ति के सिद्धान्त को नहीं मानता। वह तो वीणा और किरीटी तरु में ध्यान लगाता है, उसको अपने मैडिटेशन का माध्यम बनाता है।


अहम् का विलयन


ध्यान और साधना के लिए अहम् का विलयन आवश्यक है। स्वयं को भूलकर बल्कि सब कुछ को भूलकर कर सिर्फ़ एक जगह अपने समूचे अस्तित्व को एकाग्र कर लेना ही ध्यान की पद्धत्ति होती है। केशकम्बली भी सब कुछ को भूलकर, यहाँ तक की अपने को भी भूलकर, सिर्फ़ वीणा पर ध्यान लगाता है। यानी केशकम्बली को कर्त्ता होने का दर्प नहीं है। वह अपने को सर्जक नहीं समझता। क्योंकि ऐसा समझना ध्यान के मार्ग से भटकना है, अहंकार में जीना है और वीणा का अपमान करना है। यह बात आधुनिक कला की रचना प्रक्रिया से बिल्कुल भिन्न है । आधुनिक कला में कलाकार या कर्त्ता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होता है ।

आधुनिक कलाकार आत्माभिव्यक्ति करता है और अपनी अनुभूति के प्रति बेहद ईमानदार होता है। तभी वह सर्जना कर पाता है। और वह अपने को भूलकर रचना नहीं करता है अपितु रचना में आत्माभिव्यक्ति करता है। इसीलिए प्रसव पीड़ा से गुजरता है। और आत्माभिव्यक्ति के उपरान्त कथार्सिस के माध्यम से राहत पता है जैसा कि अरस्तू ने बताया है। - यदि आधुनिक कलाकार की आत्माभिव्यक्ति न हो तो वह पागल और बीमार हो जाए।


प्रकृति के जीवन प्रवाह के साथ संलयन


कला को साधना और ध्यान का माध्यम बनाने वाली इस काव्य-परम्परा की दूसरी विशेषता यह होती है। कि वह मानव जीवन और प्रकृति में संगति और साहचर्य देखती है।

वह आधुनिक समझ के अनुरूप मानव और प्रकृति के बीच अन्तर अथवा प्रतिद्वन्द्विता नहीं देखती । बल्कि इसके ठीक विपरीत प्रकृति को भी मानवीय अस्तित्व का हिस्सा समझती है। वह जीवन के प्रवाह पर अपना ध्यान लगाती है और इस जीवन प्रवाह में मानव और मानवेतर प्राणियों के साथ साथ पेड़-पौधों तथा वनस्पतियों को भी शामिल करती है। 'असाध्य वीणा' शीर्षक इस कविता में भी प्रियंवद केशकम्बली वीणा पर ध्यान लगाते हुए जब साधना में उतरता है तो किरीटी तरु के माध्यम से प्रकृति से एक विशेष किस्म का साहचर्य बनाता है। वह अपने को किरीटी तरु से अलग नहीं समझता है बल्कि उससे एक रिश्ता बनाता है। वह पूर्ण समर्पण के साथ अपने को किरीटी तरु के जीवन प्रवाह और कार्य व्यापार के हाथों सौंप देता है। इसीलिए वह कहता है-


नहीं, नहीं ! वीणा यह मेरी गोद रखी है, रहे


किन्तु मैं ही तो


तेरी गोदी बैठा मोद-भरा बालक हूँ, मेरी हर किलक


ओततात ! सँभाल मुझे,


पुलक में डूब जाय:


विस्मय से भर आँके


तेरे अनुभव का एक एक अन्तस्वर तेरे दोलन की लोरी पर झयूँ मैं तन्मय-


गा तू :


तेरी लय पर मेरी साँसें


भरें, पुरें, रीतें, विश्रांति पायें।


किरीटी तर और उस पर रहने वाले पशु-पक्षियों के माध्यम से वह जगत् के जीवन प्रवाह पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है। उस जीवन प्रवाह में वह अपने अस्तित्व का समर्पण कर देता है, उसका हिस्सा वह स्वयं भी बन जाता है। और उसी से आग्रह करता है कि वह गाये यानी कला की रचना करे। ध्यान और साधना वाली उस कला की रचना करे जो अन्तस् के अँधियारे को जगमग कर सके। स्पष्ट है कि कला की रचना केशकम्बली नहीं करेगा बल्कि उसकी रचना उस जीवन प्रवाह में होगा जिसके ध्यान में केशकम्बली डूबा हुआ है।


यहाँ थोड़ी देर रुक कर अज्ञेय के सूक्ष्म प्रकृति पर्यवेक्षण पर भी विचार कर लेना समीचीन होगा। पत्तियों पर वर्षा बूँदों की पट-पट, घनी रात में महुए का चुपचाप टपकना, खग शावक की चिहुक,

वन झरने से निकलता लहरीले जल का कल निदान, पार्वती गाँव के ढोलक की थाप, गड़रियों की अनमनी बाँसुरी, कठफोड़े का ठेका, शरद ऋतु ताल लहरियों की सरसर ध्वनि, कून्जों का क्रेंकार, हंस-बलाका, चीड़ वन के गन्ध, जल प्रपात के प्लुत स्वर, झिल्लीदादुर कोकिल चातक की पुकार आदि के माध्यम से संसृति की साँय-साँय (जगत् का जीवन-प्रवाह ) का ऐसा विशद् और सूक्ष्म वर्णन अन्यत्र दुर्लभ है। आधुनिक हिन्दी कविता में शायद ही कोई ऐसी कविता हो जो प्रकृति के कार्यव्यापार का वर्णन इतने जतन और बारीक ब्यौरों के माध्यम से करती हो। एक साथ इतनी क्रियाओं और उनके लिए उपयुक्त विशेषणों का प्रयोग भी अज्ञेय के असाधारण शब्द सामर्थ्य का संकेत करते हैं। प्रकृति के पर्यवेक्षण की ऐसी पैनी दृष्टि और उसकी ऐसी शानदार अभिव्यक्ति आधुनिक हिन्दी कविता की दुर्लभ उपलब्धि है। बहरहाल !


प्रियम्बद केशकम्बली अपने अहम् को तिरोहित करके अपने अस्तित्व को जीवन प्रवाह को सौंप देता है। बल्कि यह कहना अधिक सार्थक होगा कि उसे यह बोध हो जाता है कि वह खुद भी उस जीवन प्रवाह का ही हिस्सा है, उसी अखण्ड आनन्दमयी चेतना का एक अणु है। यह महसूस करना ही ध्यान और साधना (मैडिटेशन) की अवस्था है। केशकम्बली साक्षी भाव से उस आनन्दमयी चेतना के प्रवाह को एक बिन्दु से देखता है जिसका हिस्सा वह स्वयं भी है। ध्यान और साधना की इस अवस्था में ही वह किरीटी तरु या उस आनन्दमय जीवन प्रवाह से वीणा को बजाने का आग्रह करता है। और वीणा बजने लगती है। उससे अलौकिक स्वर फूटता है।

वह खुद नहीं बजाता है। वह तो सिर्फ़ माध्यम के रूप में वीणा को बजाता है लेकिन उसके मन में यह बात बैठी हुई है कि वह वादक नहीं है। वीणा को बजा कोई और रहा है और वह स्वयं उस वीणा वादन का साक्षी मात्र है। वह माध्यम के रूप में वीणा को बजा रहा है और साक्षी भाव से उसे बजते हुए देख रहा है। यही वह बिन्दु है जिसकी वजह से इस कविता को रहस्यवादी कहा गया है। अध्यात्म और ध्यान आदि को न समझने वाले और सिर्फ तर्क तक ही सीमित रहने वाले आधुनिक मानस के लिए ये बातें निश्चित तौर पर पहेली हैं। लेकिन दर्शन और अध्यात्म के अध्येता इस पहेली में नागार्जुन के बौद्ध मत तथा गीता में संकलित कृष्ण के उपदेशों की अन्तर्ध्वनि को सुन सकते हैं जब वे अर्जुन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि तुम कर्त्ता नहीं हो इसीलिए कर्मफल पर तुम्हारा अधिकार नहीं है तुम तो माध्यम मात्र हो ।


अलौकिक आनन्द की अनुभूति


वीणा के बजने के साथ ही संगीत की सृष्टि होती है और यह संगीत अलौकिक आनन्द से भरा हुआ है। इस आनन्द की तुलना ब्रह्मानन्द से की जा सकती है। प्राचीन काव्यशास्त्रियों ने कला को ब्रह्मास्वादसहोदर कहा ही है। अज्ञेय अपनी इस कविता में अलौकिक संगीत के अवतरण का वर्णन करते हैं-


सहसा वीणा झनझना उठी-


संगीतकार की आँखों में ठंडी पिघली ज्वाला-सी झलक गई-


रोमांच एक बिजली सा सबके तन में दौड़ गया। अवतरित हुआ संगी


स्वयंभू


जिसमें सोता है अखण्ड


ब्रह्मा का मौन


अशेष प्रभामय ।


ध्यान और साधना वाली कला की यह विशेषता होती है कि वह अनिवार्यतः अलौकिक आनन्दमयी चेतना से युक्त होती है। आधुनिक कला से यह आनन्द नहीं पाया जा सकता है।

आधुनिक कला विरेचन ( कथार्सिस) करती है अर्थात् हमारे भावों का शुद्धिकरण करती है। कलाकार को भी सर्जना का सुख देती है। उसके सर्जना और भावों को अभिव्यक्त होने का अवसर देकर उसे मानसिक पीड़ा और व्याघात से बचाती है। उसे एक तरह की राहत प्रदान करती है। लेकिन वह अलौकिक नहीं होती है। वह अनिवार्यतः आनन्दमयी भी नहीं होती है। वैसे भी हिन्दी साहित्य के शीर्ष आलोचकों ने आधुनिक कविता के सन्दर्भ में रस सिद्धान्त को ख़ारिज करने में खूब दिलचस्पी ली है।


श्रोता पर प्रभाव


ध्यान और साधना वाली आधुनिकता पूर्व में प्रचलित इस कला की एक विशेषता यह होती है कि यह कार्यात्मक (फंक्सनल) होती है अर्थात् आनन्द की सृष्टि के अलावे यह अपने श्रोताओं पर कुछ विशेष प्रभाव भी छोड़ती है।

सभी श्रोताओं पर यह प्रभाव अलग-अलग होता है, एक जैसा नहीं। इसका कारण यह है कि सभी श्रोताओं का भाव स्तर और अध्यात्मिक स्तर अलग-अलग होता है। ध्यान रहे कि व्यक्ति के इस भाव स्तर का कोई सम्बन्ध उसके भौतिक और सामाजिक हैसियत से नहीं होता है। इसका अमीरी-गरीबी, जाति-पाँति या किसी भी तरह की सांसारिक पदवी से कोई लेना-देना नहीं है। इसका सम्बन्ध व्यक्ति की आध्यात्मिक चेतना के परिष्कार और हृदय की पवित्रता से होता है। अतः उनके उदात्तीकरण के लिए आवश्यक है कि उनके आध्यात्मिक स्तर के हिसाब से ही उन पर कार्य किया जाए और उनकी चेतना का परिष्कार किया जाए।

चित के उदात्तीकरण से ही उनमें उत्तरदायित्व की भावना और कर्त्तव्यबोध का विकास होता है। वे व्यर्थ के लोभ-लालच और आकांक्षाओं को त्याग कर एकनिष्ठता से स्वार्थरहित कर्म में रत होते हैं। इसीलिए इस कविता में एक ही संगीत को सुनने के उपरान्त सबको अपने भाव स्तर के अनुरूप अलग-अलग बोध होता -


डूब गए सब एक साथ


सब अलग अलग एकाकी पार तिरे ।


राजा ने अलग सुना


जय देवी यशः काय


वरमाल लिए


गाती थी मंगल गीत


दुन्दुभी दूर कहीं बजती थी


राज मुकुट सहसा हल्का हो आया था, मानो हो फूल सिरिस का


ईर्ष्या महदाकांक्षा द्वेष चाटुता


सभी पुराने लुगड़े से झर गए निखर आया था जीवन-कांचन धर्म भाव से जिसे निछावर वह कर देगा ।


संगीत तो एक ही उत्पन्न हुआ लेकिन सबने उसे अलग-अलग सुना अर्थात् अलग-अलग उसका अर्थ लगाया। राजा ने अलग सुना, रानी ने अलग सुना और इनके साथ सभी श्रोताओं ने अपने भाव स्तर के अनुरूप अलग-अलग संगीत सुना। सबमें अलग-अलग बोध जगा। सबकी इयत्ता भी अलग-अलग जगी अर्थात् सबको अपनी अस्मिता का अलग-अलग बोध हुआ। इसीलिए सबको निःस्वार्थ कर्त्तव्य का अलग-अलग बोध हुआ। और फिर सबकी इयत्ता संधीत होकर जीवन प्रवाह में विलीन हो गई। अर्थात् सबको यह बोध भी हुआ कि वे एक जीवन-प्रवाह के हिस्से हैं, ब्रह्म के ही अंश हैं। इसीलिए सबके स्वार्थ, मोह, लोभ, लालच, ईर्ष्या आदि झर गए और उनके हृदय उदात्त हो गए।