'परिवर्तन' कविता का परिचय - Introduction to the poem 'Change'
छायावादी काव्यधारा को संवारने में पन्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। उनके द्वारा रचित 'पल्लव' का छायावाद के इतिहास में विशिष्ट महत्त्व हैं। इसे पन्त की उत्कृष्टतम काव्य-कृति माना जाता है। यह सन् 1922 से 1926 के मध्य लिखी गई कविताओं का काव्य-संग्रह है। इसकी रचनाओं को छह भागों में विभक्त किया जा सकता है.
प्रणय भावप्रधान रचनाएँ : उच्छवास, आँसू, स्मृति आदि ।
कल्पनाप्रधान रचनाएँ : वीचिविलास, विश्व वेणु, निर्झर गान, नक्षत्र ।
भावप्रधान रचनाएँ : मोह, विसर्जन, मुस्कान आदि।
चिन्तन-प्रधान रचनाएँ : नारी, विश्वव्याप्ति, जीवन-यान, शिशु आदि ।
भाव और कल्पनाप्रधान रचनाएँ : बालापन, छाया, मौन निमन्त्रण, बादल, स्वप्न ।
भाव, कल्पना एवं चिन्तन प्रधान रचना : परिवर्तन |
'पल्लव' के महत्त्व को इस प्रकार समझा जा सकता है कि उस समय के विद्वान् आलोचक शुकदेव बिहारी मिश्र ने कहा था कि "मैं हिन्दी में केवल नवरत्नों को ही महान् कवि मानता आया हूँ किन्तु 'पल्लव' को पढ़कर मुझे ऐसा ज्ञात होता है कि यह बालक भी महाकवि है।"
'परिवर्तन' काव्य-संग्रह 'पल्लव' में संकलित लम्बी रचना है। इसमें कवि की भावुकता, विराट् कल्पना, चिन्तनशीलता, संवेदनशीलता, विश्वव्यापी अनुभूति, पाण्डित्य प्रखरता और कला-मर्मज्ञता का भव्य परिचय प्राप्त होता है । 'परिवर्तन' उस दौर की रचना है, जब प्रबन्धात्मक रचना-विधान को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ और उसकी प्रासंगिकता और महत्त्व के बारे में कोई सन्देह नहीं था। इसमें पन्त के बदलते विचारों की आहट है। डॉ० नगेन्द्र ने इस कविता के महत्त्व को प्रकट करते हुए लिखा है कि "वास्तव में पन्त ने ना तो इससे पूर्व ही और ना इसके बाद ही इतनी आवेशपूर्ण कविता लिखी है। ... 'परिवर्तन' पन्त के काव्याकाश में दूरवर्ती तारे के सदृश्य है, जो सबसे पृथक् रहकर अपनी ज्योति विकीर्ण करता है।"
'परिवर्तन' कविता किसी आख्यान या इतिवृत्त का सहारा लिए बिना परिवर्तन सम्बन्धी धारणा को आवेशपूर्ण ढंग से बिम्बात्मक रूप में अभिव्यक्त करती है । एक प्रमुख बिम्ब और उससे छोटे-छोटे बिम्बों को जोड़ने का प्रयास यही इसकी रचना-5 -प्रक्रिया और रचना संघर्ष है। यह कविता मुक्तक खण्डों का एक संकलन प्रतीत होती है। इसके प्रत्येक छन्द को स्वतन्त्र छन्द के रूप में पढ़ा जा सकता है। निराशा की अन्तर्वर्ती मनोदशा का सूत्र ही इस कविता को बाँधे हुए है, जो इस कविता के खण्डों में एकता स्थापित करता है और इसे एक लम्बी कविता बनाता है।
'परिवर्तन' कविता में एक विशेष क्रम दिखाई देता है, जिसके कारण हम इसे छह भागों में विभाजित कर सकते हैं। पहले खण्ड में प्रथम पाँच पदों को लिया जा सकता है, जिसमें कवि पन्त ने आरम्भ में ही प्रश्न किया है. - "कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल ?" कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्ण पुरातन और स्वर्ण काल की बातें मिथ्या है, आज का यथार्थ यह है कि सुख दुःख में परिवर्तित हो रहा है और यह परिवर्तन ही संसार का नियम है-
खोलता इधर जन्म लोचन, मूँदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण, अभी उत्सव औ हास- हुलास,
अभी अवसाद, अश्रु, उच्छवास !
दूसरे खण्ड में पद संख्या छह से दस को लिया जा सकता है, जिसमें परिवर्तन को विभिन्न साँग-रूपकों द्वारा मूर्त किया गया है। इसमें प्रयुक्त मुख्य रूपक- शिव, वासुकि, निरंकुश नृप और काल के हैं। जिनका निहित भाव है 'विनाश'। -
अरे क्षण-क्षण सौ-सौ निःश्वास । छा रहे जगती का आकाश ! चतुर्दिक घहस्घहर आक्रान्ति । ग्रस्त करती सुख-शान्ति !
पद संख्या ग्यारह और बारह को तीसरे खण्ड में स्वीकार किया जा सकता है, जिसमें संसार की नश्वरता और उसकी सतत परिवर्तनशीलता पर चिन्तन किया गया है।
मनुष्य के जीवन से लिए गए विभिन्न प्रतीक चित्रों द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि नश्वर संसार में सुख और शान्ति केवल भ्रान्ति है-
हाय री दुर्बल भ्रान्ति !
कहाँ नश्वर जगती में शान्ति ?
सृष्टि ही का तात्पर्य अशान्ति !
खण्ड अर्थात् पद संख्या तेरह से सत्रह तक यह स्थापना है कि संसार में सब कुछदुःखमय है।
संसार में हिंसा, रोष, अकाल, क्रूरता, संहार, युद्ध, शोषण का साम्राज्य छाया हुआ है वस्तुतः यह पूरा संसार दुःख से परिपूर्ण है-
सकल रोओं से हाथ पसार,
लूटता इधर लोभ गृह द्वार उधर वामन डग स्वेच्छाचार, नापता जगती का विस्तार !
इस प्रकार प्रथम चार खण्डों में निराशा के अनुभव के विभिन्न रूप अभिव्यक्त हुए हैं। इसके बाद कविता एक नया मोड़ लेती है और पाँचवा खण्ड (पद संख्या अट्ठारह से अट्ठाईस),
जो सबसे लम्बा है, में दुःख के कारण उत्पन्न निराशा से उबरने के लिए कवि संसार की परिवर्तनशीलता पर दार्शनिक ढंग से चिन्तन करता है. -
बिना दुःख के सब सुख निस्सार
बिना आँसू के जीवन भार
दीन दुर्बल है रे संसार इसी से दया क्षमा औ प्यार !
पद संख्या उनतीस से बत्तीस को छठा खण्ड माना जा सकता है, जिसमें कवि ने परिवर्तन को सर्वव्यापी
और सर्वशक्तिमान् माना है। उनके अनुसार संसार में जो कुछ है, जैसा है, वह परिवर्तन ही है-
तुम्हारा ही अशेष व्यापार,
हमारा भ्रम, मिथ्याहंकार, तुम ही में निराकार साकार, मृत्यु जीवन सब एकाकार।
'परिवर्तन' लम्बी कविताओं के इतिहास में सबसे पहली सशक्त शीर्षस्थ कविता है। यह कविता न केवल आकार में बड़ी है वरन् अपने रागात्मक और वैचारिक आयाम में भी बड़ी है।
पन्त मूलतः मानवतावादी हैं अतः वे परिवर्तन निरन्तरता में जहाँ स्थितियों की कटुता के दर्शन करते हैं, वहीं दीनदुर्बल संसार में प्यार, दया और क्षमा के निरन्तर अस्तित्व को भी व्यक्त करते हैं। उनका विश्वास है कि मानव के उच्च मूल्य हमेशा उसके जीवन व्यापार का संचालन करते रहेंगे। शान्तिप्रिय द्विवेदी के शब्दों में " 'परिवर्तन' में कवि की विशेषता यह है कि उसने दर्शनशास्त्र की शुष्कता में भी काव्य का रस संचार कर दिया है। ज्ञान को भाव बना दिया है, काल को कला का स्पर्श दे दिया है।... इसमें सभी छन्दों और सभी रसों का समावेश है। कथा का आधार लेकर लिखे गए हिन्दी के प्रबन्ध काव्य अनेक हैं, किन्तु बिना किसी आधार के केवल भाव और कला का इतना विशद् काव्य खड़ीबोली में कोई नहीं।"
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