आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के अनुसार जयशंकर प्रसाद - Jaishankar Prasad according to Acharya Nanddulare Vajpayee

छायावाद के जिन कवियों का विवेचन वाजपेयी जी ने किया है उनमें जयशंकर प्रसाद सबसे प्रमुख हैं। 'प्रसाद' के काव्य और गद्य साहित्य को समझने-समझाने की दृष्टि से उन्होंने समय-समय पर कई निबन्ध लिखे हैं, जिन्हें 'जयशंकर प्रसाद' नामक पुस्तक में संकलित किया गया है। वाजपेयी जी ने सन् 1931 के एक निबन्ध में लिखा था कि 'प्रसाद', 'पंत' और 'निराला' की वृहत्त्रयी ऐतिहासिक दृष्टि से हिन्दी साहित्य में युगान्तर उपस्थित कर चुकी है। यह कविता के अन्तरंग और बाह्यांगों की मौलिक सृष्टि करके साहित्य-समाज के सामने आई। इनमें भी ऐतिहासिक दृष्टि से श्री जयशंकर प्रसाद का कार्य सबसे अधिक विशेषता समन्वित है।

(- 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी') प्रसाद के काव्य के विश्लेषण के आधार पर वाजपेयी जी ने उन्हें अनुभूति, सौन्दर्य-बोध और दार्शनिक गाम्भीर्य आदि की दृष्टि से आधुनिक युग का सर्वश्रेष्ठ कलाकार और चिन्तक माना है। उन्होंने उनकी कविताओं में महाकाव्यात्मक उदात्तता और उद्देश्य की महानता देखी है। शुक्ल जी ने 'प्रसाद' की प्रणयानुभूति को "ससीम से कूदकर असीम पर जाती हुई" कहा था। वाजपेयी जी ने कहा कि 'प्रसाद' असीम के नहीं अपितु मनुष्यों और मानवीय भावनाओं के कवि हैं।


प्रसाद' का आरम्भिक काव्य


'प्रसाद' के आरम्भिक काव्य 'चित्रधारा' को उन्होंने प्राकृतिक वर्णनों द्वारा माधुर्य-भाव की सृष्टि करने वाला काव्य बताया है जिसमें उनका प्रेम प्रकृति से न होकर रमणीयता से है।

रमणीय दृश्यों पर भी वे मुग्ध कम होते हैं, उनके प्रति जिज्ञासा अधिक प्रकट करते हैं। लेकिन यह जिज्ञासा ही आगे उनके विकास में सहायक हुई है और वे प्रेम-प्रधान शृंगारी कवियों की श्रेणी से ऊपर उठकर उच्चतर रहस्यकाव्य का सृजन कर सके हैं।


वाजपेयी जी ने दिखाया है 'प्रसाद' का प्रकृति प्रेम और मानव-चरित्र सम्बन्धी धारणा उत्तरोत्तर गहरी होती गई है। ‘प्रेम-पथिक' में उनकी जिज्ञासा प्रकृति-प्रेम से हटकर मनुष्य-प्रेम के रूप में प्रकट हुई है। 'आँसू' एक विरह-काव्य है। इस काव्य को कवि के जीवन की वास्तविक प्रयोगशाला का आविष्कार बताते हुए वाजपेयी जी कवि की प्रेम सम्बन्धी साहसपूर्ण आत्माभिव्यक्ति को छायावाद का स्थल माना है-

"यदि वह छायावाद है तो इसी अर्थ में कि वह मानवीय प्रेम अपने उत्कर्ष में एक अलौकिक आध्यात्मिक छाया से सम्पन्न हो उठा है।" (- ‘हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी') 'आँसू' का मूल्यांकन करते हुए वाजपेयी जी ने लिखा है कि "प्रसाद जी मनुष्यों के और मानवीय भावनाओं के कवि हैं। शेष प्रकृति यदि उनके लिए चैतन्य है, तो भी मनुष्य सापेक्ष है। यह विकास-भूमि यदि संकीर्ण है, तो भी मनुष्यता के प्रति तीव्र आकर्षण से भरी हुई है। 'आँसू' में प्रसाद जी ने यह निश्चित रीति से प्रकट कर दिया है कि मानुषीय विरह-मिलन के इंगितों पर वे विराट् प्रकृति को भी साज सजाकर नाच नचा सकते हैं। यह शेष प्रकृति पर मनुष्य की विजय का शंखनाद है ! कवि जयशंकर प्रसाद का प्रकर्ष यहीं पर है।" (- 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी')


'आँसू' के बाद आई उनकी रचना 'झरना' को वाजपेयी जी प्रसाद के मानसिक विकास की दृष्टि से परिवर्तन काल की रचना मानते हैं। इसमें एक विचित्र अवसाद है। इसकी अधिकांश कविताएँ बहुत साधारण कविताएँ हैं इसलिए कुछ अच्छी कविताएँ भी अच्छा प्रभाव नहीं पैदा कर सकीं। 'झरना' में प्रसाद ने कुछ नये प्रयोग किए थे जो उन्हें जीवन की गम्भीर परिस्थितियों से परिचित करवा रहे थे। 'कामायनी' में अपने युग की सामाजिक और सांस्कृतिक हीनताओं के प्रति जो विरक्ति और क्षोभ है उसका उद्गम स्रोत 'झरना' में दिखाई देता है।


आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी का नवचेतना का महाकाव्य 'कामायनी'


वाजपेयी जी के अनुसार 'कामायनी' की रचना 'प्रसाद' ने मानव प्रकृति का विश्लेषण करके की है। यह नये युग की काव्यकृति है इसलिए उसमें दृष्टि की नवीनता है। इस नयी दृष्टि का मूल प्रेरणा-स्रोत नवीन जीवन- स्थितयाँ हैं । इस नयी दृष्टि का प्रथम सूत्र उसके नायक की कल्पना में है। कामायनी का नायक परम्परागत धीरोदात्त नायक नहीं है। काव्येतिहास में यह एक नितान्त नवीन कल्पना है। कवि ने उसे सत् और असत् का प्रतिनिधि नहीं बनाया है । वह मानवीय गुणों और दुर्बलताओं से युक्त है और मनुष्यता का प्रतिनिधि है ।


'कामायनी' के अपने विवेचन में वाजपेयी जी ने दिखाया है कि यह कृति प्रमाणित करती है कि 'प्रसाद' का जीवन-दर्शन संघर्षात्मक न होकर समन्वयकारी है।


'कामायनी' में बहुत कम चरित्रों के माध्यम से इस महान् जीवन के विविध रूपों को निरूपित किया गया है। उनकी चरित्र भूमिकाएँ भी एकदम मानवीय हैं इस कारण से ही काव्य में विभिन्न रसों की मार्मिक योजना हो सकी है। वाजपेयी जी के शब्दों में "प्रतीकात्मकता के साथ मानवीय पक्षों का ऐसा उत्कृष्ट समन्वय अन्यत्र दुर्लभ है।" (- 'रीति और शैली') इसके अतिरिक्त "सूक्ष्म मानसिक भावनाओं की निवृत्ति उन्हें रूपायित करने में दिखाई देती है। आशा, वासना और लज्जा जैसी मनोवृत्तियों को चित्रोपम साकारता देना कामायनी काव्य की ही विशेषता है ।"

(- 'रीति और शैली) वाजपेयी जी के अनुसार 'कामायनी' की मुख्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए बताते हैं कि उसका एक सुविकसित और प्रौढ़तर मनोवैज्ञानिक आधार है जिसमें व्यापक अन्तर्निहित दार्शनिक चिन्तन का निरूपण सम्भव हुआ है। इसमें नीतिवादी प्रतीक व्यंजना के स्थान पर आनन्दवादी आध्यामिक अभिव्यंजना की स्थापना है। जीवन प्रयोगों का विस्तार इसमें आदर्शवादी लीक से हटकर दिखाया गया है। 'कामायनी' में नवीन सांस्कृतिक निर्माण का प्रयास हुआ है तथा काव्योत्कर्ष की दृष्टि से यह हिन्दी की एक महान् कृति है।


नाटक और उपन्यास


वाजपेयी जी ने जयशंकर प्रसाद के नाटकों की समीक्षा में लिखा है कि उनके नाटक शास्त्रीय पद्धति के नहीं हैं।

प्रसाद अपने नाटकों में एक नवीन नाट्यशैली का प्रादुर्भाव करते हैं जिसे 'स्वच्छन्द नाट्यशैली' कहा जा सकता है। उन्होंने लिखा है कि प्रसाद के नाटक साहित्य के प्रगतिशील और विकासमान स्वरूप को प्रकट करते हैं। इन नाटकों में जहाँ भी साहित्य और इतिहास के बीच समन्वय स्थापित नहीं हो पाता वहाँ नाट्यकृति में पूर्ण साहित्यिकता और संगति नहीं आ पाती है। साहित्य पर इतिहास के आरोपण के कारण इन नाटकों में कई जगह वस्तुचरित्र और रस-संवेदन में एक असन्तुलन भी पैदा हो गया है। प्रसाद के नाटकों की विशेषताएँ बताते हुए उन्होंने लिखा है कि प्रसाद ने अपने नाटकों में इतिहास की पाबंदी में रहकर ही घटनाओं और चरित्रों का स्वतन्त्र निर्माण किया है और जीवन-संघर्ष को दिखाया है।

लेकिन ऐतिहासिक पाबंदी के बावजूद घटनाओं की नाटकोपयोगी योजना तथा चरित्रों और परिस्थितियों का संघर्ष शिष्ट और सौम्य भाषा में किया है- "इतिहास की घटनाओं को नाटकीय स्वरूप में ढालकर सजीव पात्रों की सृष्टि करना और अतीत के उन व्यक्तियों और परिस्थितियों के प्रति आज के पाठक और नाट्यदर्शक का मन रमा लेना, प्रसाद की विशेषता है। उनके नाटकों में घटनाओं के आकर्षण की अपेक्षा चरित्रों की विविधता और उनकी मनोभावनाओं का उन्मेष और प्रदर्शन अधिक है।" (- 'आधुनिक साहित्य')


प्रसाद के उपन्यासों में वाजपेयी जी ने 'कंकाल' उपन्यास पर कुछ विस्तार से प्रकाश डाला है।

'कंकाल' के सम्बन्ध में उन्होंने यह स्वीकार किया है कि इसमें 'प्रोपेगेण्डा' है। लिखा है "इस शब्द (प्रोपेगेण्डा) से हिन्दी के साहित्यिक डरते-से हैं, क्योंकि इसने प्रेमचंद जी को भी बदनाम किया है। पर वास्तव में यह दर मिथ्या है। प्रत्येक साहित्यकार जीवन और जगत् सम्बन्धी अपने अनुभव और अपनी धारणाएँ रखता है जो उसकी साहित्यिक कृतियों में प्रतिफलित हुआ करती है। जिसके ये अनुभव और धारणाएँ जितनी अधिक दृढ होंगी और जो जितने अधिक कौशलपूर्वक उनकी शक्ति समेट कर अपने साहित्य में संकलित कर सकेगा,

उसकी कृति उतनी ही अधिक शक्तिशालिनी होगी।" (- 'जयशंकर प्रसाद) वाजपेयी जी ने 'कंकाल' में एक नयी प्रवृत्ति का उल्लेख किया है जिसे प्रकृतिवादी प्रवृत्ति कहा जा सकता है। उन्होंने लिखा है कि "इसके सभी पात्र वर्णसंकर और अधिकतर कामवृत्तियों में लिप्त हैं । यद्यपि प्रसाद जी ने इस उपन्यास में एक आदर्शवादी पात्र भी रखा है, जिसे उपन्यास के सभी पात्र सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और जिसके आदेश से उपन्यास के अन्त में 'भारत-संघ' जैसी आदर्शवादी संस्था का निर्माण भी होता है, पर कंकाल में लेखक का मुख्य झुकाव पात्रों की प्रवृत्तिमूलकता की ओर ही है।

सभी इन्द्रिय-वृत्तियों का परितोष ही चाहते हैं।" (- 'रीति और शैली') 'कंकाल' पर लिखने से पहले वाजपेयी जी 'यथार्थवाद' को साहित्य से बहिष्कृत वस्तु समझते थे। लेकिन 'कंकाल' का स्वागत किया और उसकी प्रशंसा की । इस उपन्यास की विशेषताएँ बताते हुए उन्होंने लिखा है कि "प्रसाद के 'कंकाल' में न तो किसी चरित्र में आदि से अन्त तक नैतिकता का निर्वाह हुआ है और न उपन्यास के अन्त में किसी ऊँचे आदर्श की कल्पना की गई है। कभी-कभी तो आवश्यक रूप से किसी भले आदमी का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया गया है,

जिससे उपन्यास की सारी चरित्रसृष्टि वर्णसंकर और विपथगामी बन गई है। फिर भी इस उपन्यास का लक्ष्य मुझे अनैतिक नहीं जान पड़ा, बल्कि सामाजिक परिष्कार में सहायक ही प्रतीत हुआ।" (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न ' ) अपनी समीक्षा- दृष्टि पर 'कंकाल' के प्रभाव को स्वीकार करते हुए वाजपेयी जी लिखते हैं कि कंकाल पर लिखने के समय से ही "मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि साहित्य में आदर्श का ही नहीं यथार्थ का भी स्थान हो सकता है, यदि लेखक का लक्ष्य समाज की कुरूपताओं, रूढ़ियों और अन्धविश्वासों पर तीव्र प्रकाश डालना और व्यंग्य करना हो। यह मेरी साहित्यिक चेतना की एक नयी उपलब्धि थी।" (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न')