जायसी - Joyce
विजयदेवनारायण साही जायसी को हिन्दी के प्रथम विधिवत कवि के रूप में स्वीकार करते हैं। उनका कथन है- "कबीर में प्रयास के चिह्न हैं, जायसी में प्रयास कहीं दिखाई नहीं देता।" इस कथन के गहरे निहितार्थ हैं। वस्तुतः विजयदेवनारायण साही जायसी को बीसवीं शताब्दी का ही कवि मानते हैं, भले ही उन्होंने सोलहवीं शताब्दी में लिखा हो । जायसी की सृजनशीलता कैसे एक व्यापक अर्थ में आधुनिक है, इसका विवेचन करते हुए उन्होंने लिखा है कि "उनकी विशेषता इसमें है कि उनके पद्मावत में इन प्रश्नों के विभिन्न स्तरों का नितान्त तिरोभाव हो जाता है।
ऐसे युग में जहाँ परमार्थ सम्प्रदाय में, नैतिकता पक्षपात में, संस्कृति सामूहिक अलगावों में, सामाजिकता हिन्दू-तुरक संघर्ष में और राजनीति निरंकुशता में निरन्तर स्तरीकृत होती रहती है, एक ऐसी विराट् सुगन्ध की कल्पना करना जिसमें सारे स्तर विलीन हो जाते हों, विषाद से भर जाना तो था ही, केवल अंशतः समझे जाने के लिए निमन्त्रण देना भी था। पद्मावती के जलने के साथ वैभव सम्पन्न एक पूरी आन्तरिक दुनिया जल जाती है। अलाउद्दीन जिसे नहीं देखता, जायसी जिसे देख रहे थे।"
एक कवि के रूप में जायसी की वास्तविक स्थापना आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी करते हैं। उनकी 'जायसी ग्रन्थावली' भी व्यावहारिक आलोचना का अन्यतम उदाहरण है लेकिन आचार्य शुक्ल के जायसी सम्बन्धी मूल्यांकन पर साही का मन्तव्य है कि "बारम्बार जायसी को पढ़ते समय मुझे यह लगता रहा है कि शुक्ल जी ने जो फ्रेमवर्क, जो चौखटा जायसी के लिए बनाया है, उस चौखटे से मेरा मतान्तर हैं।" वस्तुतः साही जायसी के अनेक काव्यांशों की अर्थव्यंजना को बदलकर शुक्ल जी की व्याख्या और मूल स्थापनाओं से अपना मतभेद अभिव्यक्त करते हैं।
जायसी की शैली में विजयदेवनारायण साही एक वैशिष्ट्य उद्घाटित करते हैं जो उनकी उक्तियों और ब्यौरों के मायने ही बदल देती है। अपने मत की सम्पुष्टि के लिए वे अलाउद्दीन के भोज का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं जिसे आचार्य शुक्ल ने एक सीमा के उपरान्त बोझिल व अनावश्यक विस्तार माना है और बीच-बीच में जायसी पर दर्शनवादी होने का आरोप भी लगाते हैं। इसी तरह जौहर के बाद पद्मिनी के जलकर मरने की खबर पर साही सुल्तान की प्रतिक्रिया का उल्लेख करते हैं। आचार्य शुक्ल इसे शान्त रस का उदाहरण मानते हैं, जबकि साही कुछ उद्धरणों के आधार पर इसे जायसी की 'बौद्धिक सघनता' के रूप में प्रस्तुत किए जाने पर बल देते हैं।
आचार्य शुक्ल की रसवादी व्याख्या के विरोध में साही जायसी के 'बौद्धिक सघनता' आदि की बात करते हैं।
विजयदेवनारायण साही अपने कवि हृदय की संवेदना के आधार पर जायसी के काव्यत्व की गहराई में जाकर झाँकने का अनूठा प्रयास करते हैं। वे जायसी की पहचान 'सूफी' नहीं, बल्कि एक 'कवि' के रूप में स्थापित करते हैं । वे 'पद्मावत' की कथा की तथाकथित ऐतिहासिकता और उससे सम्बद्ध प्रमाणों की संदिग्धता का तर्क देते हुए उसे कवि कल्पना के रूप में देखने की भरपूर वकालत करते हैं।
'पद्मावत का विश्लेषण' उनका एक महत्त्वपूर्ण लेख है जिसमें कथा की बनावट का विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए साही ने जायसी की मूल सर्जनात्मक क्षमता का ईमानदारी से उद्घाटन किया है। उनकी प्रबल धारणा है कि जायसी की ऐसी सर्जनात्मकता वस्तुतः कवि की है न कि सूफी सन्त की जायसी की एक नयी समझ, नयी आलोचनात्मक भाषा और नये प्रत्यय को उद्घाटित करते हुए साही उन्हें अध्यात्मवादियों के बीच भौतिकवादी तथा भौतिकवादियों के बीच अध्यात्मवादी करार देते हैं।
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