केदारनाथ अग्रवाल - Kedarnath Agarwal
केदारनाथ अग्रवाल - Kedarnath Agarwal
केदारनाथ अग्रवाल प्रगतिशील कविता के प्रखर रचनाकार हैं। वे उत्तरप्रदेश के अति पिछड़े, अभावग्रस्त, सूदखोरों की बस्ती बाँदा में वर्षों तक रहे। वहाँ का विषमतामयी जीवन, उसकी विद्रूपता उनकी कविताओं में सहज ही झलक उठती है, तो वहीं बुंदेलखंड का सुरमयी रंगों से युक्त प्रकृति-वर्णन संघर्ष से भरे जीवन को एक नयी दिशा देती दिखाई देती है। केदारजी की काव्य संवेदना का मजबूत पक्ष उनकी जनवादी सामाजिक यथार्थवादी चेतना है और इनका विश्लेषण किए बिना उनका सही मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं "कविता - केवल व्यक्ति की मानसिकता या चेतना की इकाई मात्र नहीं होती। वह वस्तुसत्ता से निरूपित हुई एक नितान्त नयी संश्लिष्ट इकाई होती है। यह संश्लिष्ट इकाई मानवीय बोध की इकाई होकर दूसरों के मानवीय बोध की इकाई बन जाती है।
ऐसा ही क्रम बराबर चलता रहा है और आदमी ऐसे क्रम के द्वारा ही अपने को, अपने समाज को, अपने परिवेश को और देशकाल के घटनाक्रम को और उसके विभिन्न आयामों को और तदनुरूप कविता को रचता रहा है।"
'युग की गंगा' काव्य-संकलन में केदारजी की यथार्थवादी विचारधारा से ओत-प्रोत कविताएँ संकलित हैं। इसकी भूमिका में वे स्वयं लिखते हैं कि "हिन्दी का यह युग समाजवाद, यथार्थवाद, प्रगतिवाद और मार्क्सवाद का युग है। जनता ने साम्राज्यवादी मोर्चे के विरोध में अपना नया बलवान मोर्चा बनाया है और साम्राज्यवादी अर्थनीति का अन्तकाल आ गया है... हिन्दी की कविता अब न रस की प्यासी है,
न अलंकार की इच्छुक है और न संगीत की तुकात पदावली की भूखी है। भगवान् अब उसके लिए व्यर्थ है... अब वह चाहती है किसान की वाणी, मजदूर की वाणी और जन जन की वाणी।"
केदारजी को जब हम प्रगतिवादी आन्दोलन के साथ जुड़े हुए देखते हैं तो हम यही मानते हैं कि वे प्रगतिशील धारा के ही कवि है। मगर सत्तर साल के उनके विराट् काव्य-सृजन को परखने पर यह तथ्य उजागर हो जाता है कि उनका काव्य-संसार काफ़ी व्यापक है, जिसमें अनन्त सृष्टि समाविष्ट है।
उनकी कविता की अन्तर्वस्तु को यदि हम सूक्ष्मता से देखेंगे तो पाएँगे कि प्रेम और प्रकृति सौन्दर्य की कविताओं से रचनात्मक जीवन आरम्भ करके उन्होंने आगे जनवादी चेतना को अपनाया और शोषित पीड़ित मानवता के उद्धार के लिए अपनी कविताओं के दायरे को मानवीय समाज के उपेक्षित वर्गों तक फैलाने का विनम्र प्रयास किया है। उनके काव्य में अभिव्यक्त प्रेम की भावना का विस्तार पत्नी प्रेम, प्रकृति के प्रति अनुराग और श्रमिक वर्ग के साथ उनकी संवेदना जुड़ जाने से श्रम-सौन्दर्य के प्रति अमिट श्रद्धा भी उत्पन्न हुई है। केदारजी के काव्य के विभिन्न आयामों को परखते समय हमें उनके काव्य की इन्द्रधनुषीय आभा से गुजरने का मौका मिलेगा।
केदारनाथ अग्रवाल की रचनाओं में प्राकृतिक तत्त्वों की संख्या भी असीमित है धरती आसमान, सूरज- चन्द्रमा-तारे, प्रभात संध्या, दिन-रात, हवा-पानी, नदी-नाले, खेत-खलिहान, पशु-पक्षी, ईंट-पत्थर, स्त्री-पुरुष, बच्चे-बड़े-बूढ़े हर कोई उनकी विस्तृत सूची में शामिल हैं। इनके अलावा उनकी समूची कविता-साधना पर हम नज़र डालें तो स्पष्ट होता है कि लोकतन्त्र, राजतन्त्र- तानाशाही, हर किसी चीज़, हर कोई तत्त्व, हर कोई तन्त्र पर उन्होंने लेखनी चलाई है। मानवता के महान् पुजारी के रूप में उन्होंने मानव के श्रेष्ठतम स्वरूप को पेश करने का • प्रयास किया है। श्रम शक्ति को श्रेष्ठतम साबित करने के क्रम में उन्होंने सभी क्षेत्रों के श्रमिकों का राष्ट्र के उद्धार के लिए विराट् योगदान को अंकित करने के साथ-साथ उनमें अटूट आस्था भरने की विराट् चेष्टा की हैं।
ज़िंदगी को वह गढ़ेंगे जो शिलाएँ तोड़ते हैं,
जो भगीरथ नीर की निर्भय शिराएँ मोड़ते हैं। यज्ञ को इस शक्ति श्रम के
श्रेष्ठतम मैं मानता हूँ।
शोषितों पीड़ितों का पक्ष लेते हुए उन्होंने तमाम वर्गों को समेटा और पूँजीपतियों और महाजनों को आड़े हाथों लिया। अपनी लेखनी से उन्होंने किसान की अनन्य आराधना की है।
मैं तो तुमको मान मुहब्बत सब देता हूँ मैं तुम पर कविता लिखता हूँ कवियों में तुमको लेकर आगे बढ़ता हूँ असली भारत पुत्र तुम्हीं हो।
केदारनाथ अग्रवाल ने मार्क्सवादी दर्शन को जीवन का आधार मानकर जनसाधारण के जीवन की गहरी व व्यापक संवेदना को अपने कवियों में मुखरित किया है। कवि केदार की जनवादी लेखनी पूर्णरूपेण भारत की सोंधी मिट्टी की देन है। इसीलिए इनकी कविताओं में भारत की धरती की सुगन्ध और आस्था का स्वर मिलता है।
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