प्रगतिशील कविता की भाषा और शिल्प-पक्ष - Language and craft of progressive poetry
कोई भी कृति कथ्य और कथन-पद्धत्ति के स्वभाविक संश्लेष के साथ प्रकट होती है। सजग और सतर्क रचनाकार भी रचना-प्रक्रिया के क्रम में उसे समग्रता में हासिल करता है। इसके बावजूद साहित्य आलोचना में अनुभूति और अभिव्यक्ति पक्ष का अलग-अलग विश्लेषण किया जाता है। भाषा-शिल्प के अन्तर्गत अभिव्यक्ति के उन सभी प्रतिमानों एवं उपकरणों पर विचार किया जाता है जो रचना के सौन्दर्य को निर्मित करते हैं। कविता के सन्दर्भ में सौन्दर्य के प्रमुख उपकरण हैं भाषा, काव्य-रूप या शैली, बिम्ब, प्रतीक, अलंकार छन्द और लय । सामान्यत: प्रगतिशील कविता में इन सौन्दर्य-मूल्यों के प्रति अतिशय लोभ नहीं दिखता, फिर भी हिन्दी कविता की मान्य कसौटी पर प्रगतिशील कविता बिल्कुल खरी साबित होती है।
प्रगतिशील कविता की भाषा-शैली पर विचार करने से पूर्व यह ध्यान देने योग्य मुद्दा है कि नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल आदि के काव्य-शिल्प को यदि शमशेर, मुक्तिबोध आदि के काव्य-शिल्प से मिलाकर देखा जाएगा तो बिल्कुल भिन्न परिणाम उपलब्ध होंगे, क्योंकि इन सबकी शिल्पगत प्रवृतियों में गुणात्मक अन्तर है । जहाँ नागार्जुन, केदार और त्रिलोचन की कविता लोक- शिल्प के ताने-बाने में गुथी सामान्य जनों को सम्बोधित है, वहीं मुक्तिबोध और शमशेर की कविता भाववादी शिल्प के तहत शिक्षित मध्यमवर्ग के सम्मुख प्रस्तुत हुई है । अतः इस अन्तर को समझते हुए यहाँ प्रगतिशील कविता की शिल्पगत विशेषताओं को समेकित करके प्रस्तुत किया जा रहा है।
प्रगतिशील कविता की भाषा पर विचार करते हुए जो सवाल सबसे पहले हमारे सामने उपस्थित होते हैं, वे हैं - साहित्य किसके लिए है ? और साहित्य की उपयोगिता क्या है ? अगर साहित्य सामान्य लोगों के लिए है और रोटी की तरह साहित्य में भी सबका बराबर हिस्सा शामिल है तो निश्चित रूप से साहित्य की भाषा वही होगी, जो प्रगतिशील कवियों की हैं। इसी प्रकार, अगर कविता की कोई तात्कालिक उपयोगिता होती है और कविता वैज्ञानिक दर्शन की तरह 'कार्य का निर्देशक' है तो वह वैसे ही लिखी जाएगी, जैसा प्रगतिशील कवियों ने लिखा है। आज अपनी साहित्यिक चर्चाओं में जब यह विचार हम बड़े पुरजोर ढंग से रखते हैं कि साहित्य सिर्फ़ थोड़े से लोगों के लिए नहीं है,
बल्कि सबके लिए है, तो प्रगतिशील रचनाएँ और भी महत्त्वपूर्ण हो उठती हैं, क्योंकि अपने साहित्य को इन्होंने सदैव जनाभिमुख बनाए रखा। प्रगतिशील कवियों में से एक नागार्जुन ने खुद ही कहा था कि "मौलिकता किताबी ज्ञान में निहित नहीं रहती, वह कवि के व्यापक जीवन अनुभव और उससे पैदा होने वाले साहस के भीतर से जन्म लेती है। मेरी कविता का सम्बन्ध आम जनता से है और आम जनता से मेरा मतलब बौद्धिक स्तर पर दर्जा चार तक पढ़ी हुई जनता से है। आर्थिक स्तर पर जो दो जून की रोटी खा लेती है।"
(- मेरे साक्षात्कार - नागार्जुन, पृष्ठ 116) इस प्रकार नागार्जुन के भाषा चिन्तन से यह स्पष्ट हो जाता है कि साहित्य में ऐसी भाषा का संयोजन करना चाहिए जो लोक सामान्य के नजदीक पहुँचकर सीधे उनसे संवाद कायम करे। फिर भी यह कार्य इतना सहज नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भाषा को साधारण जनता के निकट लाकर कविता को लोक- निर्णय के लिए प्रस्तावित कर देना अत्यन्त क्रान्तिकारी और नैतिक साहस का काम है। यह एक प्रकार से अध्यात्मवादी, रूढ़िवादी और कुलीनतावादी भाषा संस्कारों को निर्णायक चुनौती देना भी है। प्रगतिशील कवियों ने अपने साहित्य में उस भाषा को महत्त्व दिया जिस भाषा ने साहित्य को रोमांटिकता की परिधि से निकालकर उसे गाँव की गलियों एवं शहर के सड़कों और पगडंडियों पर चलना सिखाया।
प्रगतिशील रचनाकार साहित्य की भाषा को गहन सकर्मक दायित्व बोध से जोड़कर देखने के पक्ष में हैं। उनकी स्पष्ट मान्यता है कि साहित्य की भाषा बोलचाल के निकट हो और भाषा का निर्माण जीवन से सीधे सम्पर्क के द्वारा हो। हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भाषा की सरलता और उसकी जनपक्षधरता के मूल में रचनाकार की रचनाधर्मिता महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। "यथार्थ के प्रखर दबावों और जीवन के प्रामाणिक स्पन्दनों को व्यक्त करने वाली लय को और जनता के जीवन्त आन्तरिक छन्दों को पकड़े बिना काव्य-भाषा को जन-मन में कवि के विचार वहन करने का विश्वसनीय साधन नहीं बनाया जा सकता। कवि अपनी कविता में जो दुनिया रचता है अथवा जीवन का जो पुनःसृजन करता है, उसे दुनिया से संवेद वस्तुजगत् से तटस्थ रह कर नहीं, बल्कि उसमें सक्रिय हिस्सेदारी अदा करते हुए सम्पन्न करता है। " ( प्रगतिशील कविता के सौन्दर्य-मूल्य- अजय तिवारी, पृष्ठ 239)
चूँकि साहित्य की भाषा पर एक तरफ तो समाज का ऐतिहासिक दबाव होता है, वहीं दूसरी तरह कथ्य की अनिवार्यता का दबाव भी होता है। इस कारण भाव और भाषा के अन्तरसम्बन्ध को लेकर एक गहरी चुनौती का सामना रचनाकार को करना पड़ता है। भाव और भाषा के सामंजस्य की इस दोहरी चुनौती को स्वीकार करते हुए प्रगतिशील कवियों ने अपनी काव्य-भाषा के द्वारा उसके जन-चरित्र को सृजनात्मक स्वरूप प्रदान किया, ताकि
कविता की शक्ति और पाठक से उसका जुड़ाव दोनों सुरक्षित रह सके। "कविता में कथ्य महत्त्वपूर्ण हैं, परन्तु कथन-पद्धत्ति कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
यदि तीव्र आवेग कभी-कभी मुक्त छन्द में आएगा तो हम उसे रोकेंगे नहीं, किन्तु छन्द, लय आदि बहुत ज़रूरी हैं और उसे पकड़ने के लिए हमें जनता के बीच जाना पड़ेगा, सब वहीं से लेने होंगे। मुक्त छन्द की कविता भी अगर नाटकीय ढंग से सम्पन्न हो तो लोगों की जुबान पर चढ़ जाएगी।" (- मेरे साक्षात्कार नागार्जुन, पृष्ठ 116) -
प्रगतिशील कविता की भाषा में भारत की सामान्य जनता की धड़कनों को आसानी से सुना जा सकता है। हर वर्ग के साथ उनका गहरा जुड़ाव है। बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, गृहस्थ, व्यवसायी, नौकरी-पेशा वाले सबके साथ उनका उठना-बैठना, खाना-पीना रहा है। इन्हीं लोगों के जीवन रस से इन कवियों - की सच्ची खरी कविता उपजी है।
जन साधारण से इस जुड़ाव के कारण इनकी कविता में एक नितान्त भिन्न जीवन्त कलात्मक सौन्दर्य सृजित हुआ है, जो जीवन के स्पन्दनों के समान ही वास्तविक और तेजस्वी है। इन कवियों की भाषा की सबसे खास विशेषता यह है कि वह शास्त्रीय अथवा पुराने मानदण्डों के अनुरूप नहीं है, बल्कि इसके लिए जन कविता के प्रतिमान तलाशने पड़ेंगे जिसमें भारतीय गरीब जनता का सुख-दुःख, उसकी पीड़ा और उसका अनवरत संघर्ष मूलाधार है। उदाहरण के लिए केदारनाथ अग्रवाल की एक छोटी-सी कविता विचारणीय है-
देह में देशी / देश में विदेशी है, शहर में आया / गाँव में गणेशी है।
इस कविता का बहुत सामान्य अर्थ है गाँव का गणेशी अपने देशी वेश-भूषा के कारण अपने ही देश के - शहर में परदेशी या विदेशी बन जाता है। लेकिन इस कविता के माध्यम से कवि गाँव और शहर की विषमता को सहज ही स्पष्ट कर देता है। इस तरह के उदाहरण त्रिलोचन की कविता में भी मौजूद हैं-
कहा उन्होंने मैंने काशीवास किया है। -
काशी बड़ी भली नगरी है
वहाँ पवित्र लोग रहते हैं
फेरु भी सुनाता रहता है।
गाँव की ठकुराइन फेरु कहार के साथ एक वर्ष कलकत्ता बिताकर आयी है, लेकिन गाँव वालों से वह काशीवास की बात कर रही है। प्रगतिशील कविता में सीधे-सीधे कहने की अद्भुत ताकत है और इसी के बल पर जनता के बीच खड़े होकर वह अपनी बात बिना किसी झिझक के रखते हैं-
जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊँ ! जनकवि हूँ मैं साफ कहूँगा, क्यों हकलाउँ !
प्रगतिशील कविता में बोलचाल की भाषा इस प्रकार घुली हुई है, जैसे कि शर्बत में चीनी इससे उनकी कविता में मिठास तो पैदा होती ही है, साथ ही वह सहज ही ग्राह्य हो जाती है। यथा -
घुन खाए शहतीरों पर की, बाराखड़ी विधाता बाँचे, फटी भीत है, छत चुती है आले पर बिसतुइया नाचे बरसाकर बेबस बच्चों पर, मिनट मिनट में पाँच तमाचे दुखरन मास्टर गढ़ते हैं, किसी तरह आदम के साँचे ।
कविता की प्रत्येक पंक्ति मानों पाठकों को पहले से ही पता है, कवि सिर्फ़ उनको अन्विति भर प्रदान कर रहा है। वैसे भी प्रत्येक व्यक्ति को अपने दुःख-दर्द का अहसास तो पहले से होता ही है, किन्तु यदि कोई उसके दर्द में भागीदार हो जाए तो बात ही कुछ और हो जाती है।
इसी भागीदारी के कारण प्रगतिशील कविता सामान्य जनों के दुखों का थाह लेती प्रतीत होती है। सच कहा जाए तो यह सपाटबयानी इन कवियों की कविता की अद्भुत शक्ति है, जिसमें शोषित पीड़ित जनता का चित्र काँपता-कौंधता है। वे जनपक्षधरता को अपनी रचनाओं का मूल उत्स स्वीकार करते हैं। यही कारण है कि प्रगतिशील कवि समाज और राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रत्येक रूप को हिकारत की नज़र से देखते हैं और अपनी तात्कालिक प्रतिक्रियाओं के कारण प्रतिपक्ष की भूमिका निभाते हैं।
प्रगतिशील कविता की भाषा को समझने का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष है उनकी कविता में विद्यमान गहरी स्थानीयता की भावना ।
यह स्थानीयता की भावना बहुत कुछ लोककाव्य में पायी जाने वाली 'स्थानीयता' की तरह है, जिसके दृश्य और रंग सम्प्रेष्य भाव को एक आकार देकर और विश्वसनीयता प्रदान करके चुपचाप तिरोहित हो जाते हैं।
प्रगतिशील कवियों को तीखे धारदार व्यंग्य के लिए भी याद किया जाता है, क्योंकि व्यंग्य के माध्यम से वे सामाजिक-राजनैतिक विसंगतियों और विद्रूपताओं पर जोरदार हमला करते हैं। इस व्यंग्य में क्रोध अधिक सजग और लक्ष्यबद्ध होता है। भूदान के असली स्वरूप को प्रकट करते नागार्जुन कड़वी बात करते हैं-
बाँझ गाय बाभन को दान हरगंगे मन ही मन खुश हैं जजमान हरगंगे ऊसर बंजर और श्मशान हरगंगे सन्त विनोबा पावैं दान हरणंगे।
- (हरगंगे, नागार्जुन रचनावली, भाग-1, पृष्ठ 227)
इस कविता को ध्यान से देखने पर यह विदित हो जाता है कि ऊपर से तथ्यात्मक विवरण सी लगने वाली पक्तियों के अन्दर व्यंग्य का मजबूत अन्तःसूत्र विद्यमान है, जो उनकी कविता को कोरा नारेबाज़ी होने से बचा लेता है । साथ की कार्यपद्धत्ति में निहित स्वप्न और वास्तविकता का अन्तर्विरोध भी पूरी तरह उजागर हो जाता है। व्यंग्य के सहारे बात कहने वाले नागार्जुन की यह सबसे बड़ी खासियत है कि वे यह खतरा बार-बार उठाते हैं,
जिसमें कविता मात्र प्रतिक्रिया न बनकर रह जाए। जाहिर है इस प्रकार की व्यंग्य-कविताओं में निष्क्रिय क्षोभ नहीं है, बल्कि करुणा से पैदा हुआ आक्रोश है, जिसे आक्रामक क्षोभ कहा जाता है।
प्रगतिशील कवियों में ज्यादातर जनकवि हैं और उनके पास वह ठेठ निगाह है जो ताड़ने में अचूक है। समाज की कौन-सी नस, और कैसे फड़क रही है ? वे इस बात को भली-भाँति जानते हैं। समाज में व्याप्त विसंगतियों के समानान्तर स्थानीय नेताओं के राजनैतिक चालों की कलई वे बड़ी सतर्कता से खोलते हैं-
लौटे हैं दिल्ली से कल टिकट मार के खिले हैं दाँत ज्यों दाने अनार के आये दिन बहार के ।
(आये दिन बहार के नागार्जुन रचनावली, भाग-1, पृष्ठ 423) -
'टिकट मार के' जैसा प्रयोग कोई लोकवादी कवि ही कर सकता है। यहाँ दाँतों की तुलना अनार से की गई है। यद्यपि यह रूढ़ उपमान है, लेकिन 'खिले हैं दाँत' नेता के मुखमण्डल के काइयाँ रूप को दर्शाता है, जो अभद्र है। साथ ही अनियन्त्रित प्रकार से पान चबाने के बाद गन्दे दाँतों को जो कुरूप बिम्ब उभरता है, उसे कवि उजागर करना चाहता है। यह कवि के गहरे जीवन अनुभव को प्रकट करता है।
निष्कर्ष रूप में कहा जाए तो "पारम्परिक रूपों में, अपनी भाषा के ठेठ मुहावरे में, हिन्दी और उसकी बोलियों की लय में आधुनिक अन्तर्वस्तु कैसे व्यक्त की जा सकती है, यह प्रगतिशील कवियों से सीखा जा सकता है। ( परम्परा और प्रयोग, विश्वनाथ त्रिपाठी, आजकल, जून 1996, पृष्ठ 9) लोकधुनों को राजनैतिक कविता का माध्यम बना देना यह आसान काम नहीं है, किन्तु प्रगतिशील कवियों ने इसका भरपूर उपयोग किया है। 'चना जोर गरम, 'हरगंगे', 'ओं' आदि मूलतः लोकधुन ही हैं। यथा-
चना खाएँ कांग्रेसी लोग
कि जिनमें दुनियाभर के रोग
साधते सत्य-अहिंसा-योग लगाते फिर भी सब कुछ भोग ।
प्रगतिशील कविता में भिन्न प्रकार के उपमानों को लिया गया है जो सामान्य जन जीवन से ग्रहण किये गए
कोयल की खान की मजदू रिनी सी रात । बोझ ढोती तिमिर का विश्रान्त सी अवदात ॥
मशाल, जोंक, रक्त, ताण्डव, विप्लव, प्रलय आदि नये प्रतीक प्रगतिवादी साहित्य की अपनी सृष्टि हैं। प्रगतिशील कवि का कला सम्बन्धी दृष्टिकोण में कला को स्वान्तः सुखाय या कला कला के लिए नहीं, बल्कि जीवन के लिए, बहुजन के लिए अपनाया गया है।
छन्दों के क्षेत्र में भी प्रगतिशील कवियों की कविता में विविधता दिखती है। एक तरफ निराला के मुक्त छन्दों की परम्परा का चरमोत्कर्ष है तो दूसरी तरफ तुकान्त कविता का सफल उपयोग भी विद्यमान है।
लोक- जीवन और लोक-संस्कृति से जुड़े होने के कारण इस धारा की कवियों में लोक-गीतों और विशिष्ट ग्रामीण धुन की ओर सहज झुकाव रहा है। रामविलास शर्मा ने इस तरह के कई प्रयोग किए, जिनमें 'हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की', 'चोट पड़ी है फिर डंके पर', 'यारों फ़ौज होय तैयार', 'सत्यं शिवं सुन्वम्' आदि उल्लेखनीय हैं। केदारनाथ अग्रवाल ने 'माझी न बजाओ वंशी मेरा मन डोलता', 'नव मेरी पुरइन के पात की', 'हमको न मारो नजरिया', 'पंचों सुनौ खबरिया', 'खेतों के नर्तन उत्सव में आदि लोक आश्रित गीत हैं। इसी प्रकार के उदाहरण नरेन्द्र शर्मा, शंकर शैलेन्द्र, शिवमंगलसिंह 'सुमन' आदि कवियों में भी देखे जा सकते हैं। परम्परागत छन्दों में दोहा, सवैया, कुण्डलिया के अलावा ग़जल, सॉनेट, बैलेड, रुबाई भी इन कवियों ने रचे । कुल मिलाकर प्रगतिशील कवियों ने तुकान्त, अतुकान्त, मुक्त छन्द, लोकगीत आदि सभी स्वीकृत छन्दों की बिना किसी अतिरेक के अपनाया।
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