काव्य की भाषा - language of poetry
कवि आलोचक के रूप में जयशंकर प्रसाद का अभ्युदय ऐसे समय में हुआ जब साहित्यिक व नैतिक मूल्यों को लेकर अनेक स्तरों पर काफी संघर्ष हो रहा था। लेकिन तत्युगीन वैयक्तिक अभिनिवेशों के बावजूद हिन्दी काव्य आलोचना विकसित एवं समृद्ध हो रही थी। जयशंकर प्रसाद आदि तत्युगीन कवि आलोचक इस बात पर सहमत रहे कि पहले से चली आती हुई आलोचना पद्धति से काव्य का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है। जयशंकर प्रसाद ने काव्य-भाषा की महत्ता एवं उपयोगिता को अपनी मूल चिन्तन में हमेशा बनाए रखा। वैसे तो काव्य की भाषा को लेकर उन्होंने अलग से कुछ नहीं लिखा है, लेकिन छायावादी काव्य की भाषा के रूप में उनकी यह टिप्पणी बहुत ही सारगर्भित है कि "शब्दों में भिन्न प्रयोग से एक स्वतन्त्र अर्थ उत्पन्न करने की शक्ति है।
समीप के शब्द भी उस शब्द विशेष का नवीन अर्थद्योतन करने में सहायक होते हैं। भाषा के निर्माण में शब्दों के इस व्यवहार का बहुत हाथ होता है। अर्थ बोध व्यवहार पर निर्भर करता है। शब्दशास्त्र में पर्यायवाची तथा अनेकार्थवाची शब्द इसके प्रमाण हैं।" यहाँ जयशंकर प्रसाद सुयोग्य भाषा वैज्ञानिक की तरह मत व्यक्त करते प्रतीत होते हैं। इसमें काव्य-भाषा विषयक उनकी दृष्टि के कई सार्थक निहितार्थ भी हैं। उनके अनुसार किसी भी कवि के कृतित्व को समझने के लिए भाषा के मर्म को समझना अत्यन्त आवश्यक है।
शब्दों का अर्थ एवं प्रयोजन समझे बिना भाव धारा को समझने का प्रयास सार्थक नहीं हो सकता। वस्तुतः भाषा एवं भाव परस्य इतने गुँथे होते हैं कि एक के बिना दूसरे की स्थिति सम्भव ही नहीं है।
प्रसाद इस बात पर भी जोर देते हैं कि काव्य में अर्थ केवल संकेत ग्रहण से ही नहीं होता है। यह बात विपुल हिन्दी काव्यों के आलोड़न से पूरी स्पष्ट हो जाती है। इसलिए काव्य में शब्दों की ध्वनि-योजना, उनका अघोषत्व, अल्पप्राणत्व, महाप्राणत्व, लय, छन्द आदि सब कुछ संश्लिष्ट तौर पर अर्थसम्पदा को समृद्ध और अनेकार्थी बनाते हैं। कवि अगर इस सत्य को उसके मूल रूप में अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बनाता है तभी वह प्रामाणिक लेखन माना जाता है।
वार्तालाप में शामिल हों