प्रमुख ग़ज़लकार - leading ghazals
विगत पचास वर्षों में हिन्दी ग़ज़ल अविश्वसनीय रीति से फलफूल चुकी है। उर्दू की प्रेम और शृंगार, हुस्न- ओ-शबाब, ख ओ ज़ुल्फ़ में गिरफ्त ग़ज़ल को हिन्दी में अत्यधिक विस्तार मिला है। हिन्दी ग़ज़ल अपने सौन्दर्य को किंचित भी घटाये बिना चिन्तन प्रधानता के साथ आगे बढ़ रही है। समाज, राजनीति, धर्म, अध्यात्म कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जिसमें हिन्दी ग़ज़ल ने सार्थक हस्तक्षेप नहीं किया। हिन्दी ग़ज़ल को इस ऊँचाई तक पहुँचाने का श्रेय निःसन्देह हिन्दी के उन श्रेष्ठ गजलकारों को जाता है जिनकी लेखनी पारम्परिक विषयों के दायरों को तोड़कर जनाभिमुख लेखन में विश्वास करती है। हिन्दी ग़ज़ल को पूरी तरह समझने के लिए इन ग़ज़लकारों का परिचय पाना अत्यावश्यक है।
दुष्यन्त कुमार
आधुनिक हिन्दी गजल के प्रमुख ग़ज़लकारों की चर्चा करते समय पहला नाम अनिवार्यतः दुष्यन्त कुमार का आता है। दुष्यन्त ने 'साये में धूप' से हिन्दी ग़ज़ल क्षेत्र में पदार्पण किया। शमशेर की परम्परा का अनुपालन करते वे ग़ज़लों में समकालीन समाज, राजनीति, धर्म-व्यवस्था, अर्थ-व्यवस्था को लेकर जगह-जगह हुए टिप्पणियाँ करते हैं। साथ ही, बेपनाह आत्माभिमान उनकी ग़ज़लों में पाया जाता है। प्रेम और समर्पण में डूबी उर्दू ग़जल की प्रवृत्तियों के ठीक विपरीत जाकर दुयन्त की ग़ज़लें अपने अस्तित्व के प्रति सजग नज़र आती हैं।
भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ,
आजकल दिल्ली में है जेरे बहस ये मुद्दआ
जैसी राजनैतिक टिप्पणी हो या
तुम को निहारता हूँ सुबह से ऋतं बरा अब शाम हो रही है मगर मन नहीं भरा
जैसी कोमल कहन हो, दुष्यन्त हर तरह से ग़ज़ब के शायर सिद्ध होते हैं। ग़ज़ल उनके लिए नैतिक दायित्व रहा-
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूँ हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
दुष्यन्त ने हिन्दी ग़ज़ल का रूपाकार बदल डाला। ग़ज़ल विधा हिन्दी में किस रंगरूप में हो, इसे कुयन्त की शायरी ने तय किया । ग़ज़ल विधा को लेकर दुष्यन्त के विचारों ने हिन्दी ग़ज़ल को कई मायने में दिग्दर्शन कराया। अपनी ग़ज़ल-भाषा को लेकर कुयन्त ने जो कहा, हिन्दी ग़ज़ल का संविधान बन गया "कुछ उर्दू-दाँ - दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज किया है। उनका कहना है कि शब्द 'शहर' नहीं 'शह' होता है, 'वजन' नहीं 'वज्रन' होता है... इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम न था कि 'शहर' की जगह 'नगर' लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ किन्तु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है,
जिस रूप में वे हिन्दी में घुलमिल गए हैं... उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज्यादा से ज्यादा करीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिसे मैं बोलता हूँ।"
आज हिन्दी ग़ज़ल जिस स्वरूप में लहलहाती नज़र आती है, उस स्वरूप को दुष्यन्त ने निर्धारित किया है, इसमें कोई दो राय नहीं।
बलवीर सिंह 'रंग'
आधुनिक हिन्दी ग़ज़ल की बात करें तो बलवीर सिंह 'रंग' एक महत्त्वपूर्ण नाम है जैसा कि शेरजंग गर्ग कहते हैं-
"आधुनिक युग में हिन्दी ग़ज़ल को सर्वाधिक लोकप्रियता प्रदान करने की शुरुआत की बलवीर सिंह 'रंग' ने।" सचमुच 'रंग' ने हिन्दी ग़ज़ल को नया रंग प्रदान किया। नया रंग प्रदान किया। उर्दू ग़ज़ल के पारम्परिक सौष्ठव को उन्होंने बखूबी निभाया -
आबोदाना रहे रहे, न रहे,
चहचहाना रहे रहे, न रहे, आशियाना रहे, रहे, न रहे
हमने गुलशन की खैर माँगी है,
यही फक्कड़पन 'रंग' के स्वभाव में भी था सो अपनी रचनाओं के प्रति जतन का भाव उन्होंने कभी न निभाया । अतः उनकी बहुत ही कम ग़ज़लें बचीं और प्रकाश में आ पायीं।
उर्दू ग़ज़ल से पायी प्रेम और समर्पण की विरासत उन्होंने हिन्दी लहजे में निभायी। उनकी ग़ज़लों ने हिन्दी ग़ज़ल को खूब सम्पन्न बनाया।
चन्द्रसेन 'विराट'
चन्द्रसेन 'विराट' हिन्दी ग़ज़ल के क्षितिज पर उभरे ऐसे सितारे थे जिन्होंने दुष्यन्त की ग़ज़ल-परम्परा को अधिक सार्थकता के साथ आगे बढ़ाया। उन्होंने ग़ज़लों से उर्दूपन को हटाकर अधिकाधिक शब्दों का प्रयोग करती हुई ग़ज़लें लिखीं। सामान्य मनुष्य जिन समस्याओं से दो हाथ करते हुए जीवन जीता है, उन समस्याओं का, उस जीवन शैली का चित्रण 'विराट' की ग़ज़लों का मुख्य कथ्य रहा। मानवीय सम्बन्धों में शामिल अविश्वास,
तनाव का उन्होंने अत्यधिक सटीक चित्रण किया। प्रेम, सौन्दर्य और शृंगार को उनकी ग़ज़लों में विशेष स्थान नहीं था।
चाँद को देखो तो, रोटी की याद जाग उठी। पेट की भूख से राहत मिले तो प्यार करूँ ।
अपनी विशाल ग़ज़ल सम्पदा पर 'विराट' को गर्व रहा। इसीलिए हिन्दी ग़ज़ल के सहृदय पाठकों को उन्होंने कह रखा - "हिन्दी ग़ज़ल की बात चली तो तुम्हें विराट उद्धृत करेंगे लोग, मिसालों के नाम पर।" विराट की ग़ज़लें हिन्दी ग़ज़लों में बड़ा अहम स्थान रखती हैं।
राजनीति का विडम्बनाएँ, मानवीय मूल्यों का क्षरण, इंसानियत का लुप्तप्राय हो जाना जैसी समस्याओं और इसके लिए उत्तरदायी सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक तत्त्वों की वे कड़ी पड़ताल करते हैं. -
धुंध का वातावरण है इन दिनों कैद कुहरे में किरण है इन दिनों कुर्सियों पर है सिफ़ारिश मूढतम और प्रतिभा को ग्रहण है इन दिनों एक भी मानक अखण्डित है नहीं मूल्यों पर आक्रमण है इन दिनों
महानगरीय बोध, आतंकवाद सभी में पाँव पसारती अवसरपरस्ती की जितनी सटीक चर्चा 'विराट' की ग़जलों में मिलती है,
उतनी ही सहजता वे आज नितान्त शारीरीय और भोगवादी बन चुके प्रेम की चर्चा भी करते हैं। यह 'विराट' की लेखनी का कमाल है कि उर्दू ग़ज़लों में छाया प्रेम अपने आदर्शात्मक प्रेम को त्यागकर वास्तविकता का दर्पण दिखाने लगा -
प्राण को प्राण कहाँ मिलता है स्नेह का दान कहाँ मिलता है हृदय मिल जाए बहुत संभव है हृदय में स्थान कहाँ मिलता है ओढ़ लेते हैं वासना तन पर प्रेम परिधान कहाँ मिलता है।
अपने परिवेश से असंतुष्ट 'विराट' ने बहुत ही उम्दा तरीके से समकालीन वातावरण चित्रित किया है और यह हिन्दी ग़ज़ल की महत्त्वपूर्ण पूँजी है।
गोपालदास सक्सेना 'नीरज'
गोपालदास सक्सेना 'नीरज' हिन्दी कविता के लोकप्रिय हस्ताक्षर हैं। उन्हें काव्य-लेखन की प्रेरणा हरिवंशराय बच्चन के 'निशा निमन्त्रण' से मिली। मूलरूप से नीरज एक गीतकार हैं किन्तु उन्होंने कुछ बेहतरीन ग़ज़लों का सृजन किया। ग़ज़लों को वे 'गीतिका' कहते हैं। उनकी ग़ज़लें अर्थात् गीतिकाएँ ग़ज़ल और गीत का खूबसूरत मिश्रण हैं। देश की आर्थिक विषमता, सर्वसामान्य जन के दुःख-दर्द, मानवीय संवेदनाएँ, प्रेम, सद्भाव नीरज की लेखनी के मुख्य विषय रहे।
साम्प्रदायिक सद्भाव उनकी ग़ज़लों में अत्यधिक सुन्दरता से व्यक्त हुआ -
काश ऐसी भी मोहब्बत हो कभी इस देश में मेरे घर उपवास हो जब तेरे घर रमजान हो मजहबी झगड़े ये अपने आप सब मिट जायेंगे और कुछ होकर न गर इन्सान बस इन्सान हो ।
जीवन की विषमताओं के साथ जीने का दर्द उनकी ग़ज़लों में खूब व्यक्त हुआ-
जिंदगी से निवाह करना पड़ा इसलिए ही गुनाह करना पड़ा वक्त ऐसा भी हम पे गुजरा जब आह भर भरके वाह करना पड़ा
हिन्दी ग़ज़ल में नीरज का योगदान अल्प किन्तु अहम है।
रामवतार त्यागी
रामवतार त्यागी हिन्दी के महत्त्वपूर्ण ग़ज़लगो हैं। उन्होंने भी विराट् की भाँति समकालीन परिवेश के प्रति असन्तोष जताया है। वे पीड़ा को अपनी अभिव्यक्ति में विशेष महत्त्व देते हैं। आँखों की नमी के लिए कारणभूत तत्त्वों पर भी वे खूब लिखते हैं।
रोशनी तो चाहिए पर लौ ज़रा मद्धम रखो चाहिए मुझसे ग़ज़ल तो आँख मेरी नम रखो
बालस्वरूप राही
बालस्वरूप राही भी त्यागीजी की तरह लुप्तप्राय इंसानियत और मूल्य-क्षरण की चर्चा करते हैं।
वैज्ञानिक उन्नति ने हमें उच्चतम तकनीकी साधनों से सम्पन्न बना दिया लेकिन इन साधनों ने हमारी भावनाएँ संवेदनाएँ हमसे छीन ली हैं, इस पर गहरा दुःख राही की ग़ज़लों में व्यक्त हुआ है -
हर तरफ एक ही आवाज़ है मारो-मारो, ऐसा बेखौफ़ कोई कब से हुआ है यारो । जिसको पढ़कर ये लगे, लोग अभी ज़िंदा है कोई तो ऐसी खबर लाओ कभी अख़बारों डॉ. कुंअर बेचैन
हिन्दी ग़ज़ल के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर डॉ. कुँअर बेचैन के अब तक बारह से अधिक ग़ज़ल-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
प्रेम में बहाये जानेवाले आँसुओं की बजाय बेचैन की ग़ज़लें पेट की आग से उपजी बेबसी का अधिक जीवन्त वर्णन करती हैं। मनुष्यता को कलंकित करने वाली वर्तमान समस्याओं का चित्रण करना उनकी लेखनी ने अपना धर्म समझा । मूलतः कुँअर बेचैन नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उन्होंने जब ग़ज़ल विधा में अभिव्यक्त होना आरम्भ किया तो उर्दू ग़ज़ल की विशेषताओं को यथावत रखते हुए उसमें हिन्दी ग़ज़ल की अपनी विशेषताएँ मिलाकर एक अद्भुत आकर्षक ग़ज़ल समीकरण निर्मित किया। बदलते हुए समय में क्षरण होते मूल्य, स्वार्थपरकता, स्वार्थपूर्ति हेतु फिसलन भरी राह पर चल पड़ी मनुष्यता उनकी ग़ज़लों का मुख्य कथ्य रहा-
जब मेरे घर के पास में कोई नगर न था कुछ भी था, जंगलों की तरह का सफर न था जंगलों में मगर राह में लुटने का डर न था । जंगलों की तरह का सफर न था सूरत में आदमी की कोई जानवर न था
आर्थिक विषमता भारतीय समाज को त्रस्त करता भीषण रोग है। यहाँ एक वर्ग के पास सात पुश्तों के बाद भी बची रहेगी, इतनी सम्पत्ति है और एक वर्ग दो जून रोटी के लिए भी तड़प रहा है। इस दूसरे वर्ग की संघर्ष- गाथा को कुँअर बेचैन अभिव्यक्त करते हैं-
गर्दन है अगर हम तो वो आरी की तरह है सीने में अब तो दिल भी कटारी की तरह है ये रात और दिन तो सरीते की तरह है। इन्सान की औकात सुपारी की तरह है। यह हमको नचाता है, इशारों पे रात दिन यारों हमारा पेट मदारी की तरह है।
कुँअर बेचैन की ग़ज़लों को लेकर बशीर बद्र कहते हैं- "कुँअर बेचैन की ग़ज़लें हिन्दी ग़ज़ल में ही नहीं, बल्कि पूरे ग़ज़ल साहित्य में एक इज़ाफ़ा है।" बेचैन की प्रत्येक ग़ज़ल बशीर बद्र के कथन को सत्य प्रमाणित करती है।
शेरजंग गर्ग
शेरजंग गर्ग हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में प्रसिद्ध ग़ज़लकार,
ग़ज़ल समीक्षक और हिन्दी ग़ज़लकारों के संकलक के रूप में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। अधिकांश हिन्दी ग़ज़लकारों की भाँति शेरजंग गर्ग समकालीन राजनीति, राजनीति की विडम्बनाएँ, भ्रष्टाचार, रिश्तों में पैठता ठण्डापन जैसे कई मुद्दों को अपनी लेखनी का विषय बनाते हैं-
सज्जनों को सज़ा अब तो हद हो गई
भ्रष्टता में मज़ा अब तो हद हो गई
रो रही है वफ़ा अब तो हद हो गई लापता है हया अब तो हद हो गई
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