वाम कविता - left verse
हिन्दी कविता के इतिहास के एक सशक्त दौर के रूप में प्रगतिशील कविता की ओर देखा जा सकता है। मार्क्स के विचारों के प्रति निष्ठावान् और समाजवादी व्यवस्था की स्थापना हेतु प्रयासरत दिग्गजतम कविगण इस कालखण्ड में लेखनी चलाते रहे। पश्चात् प्रयोगवाद, नयी कविता और समकालीन कविता के विविध आन्दोलनों के दौर में कविता अपना रूपबन्ध बदलती रही। उसकी संवेदनाओं में वैविध्य देखा गया।
इस दौरान भारत ने अनेक राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक परिवर्तन देखे। स्वाधीनता की लम्बी लड़ाई के पश्चात् मिली स्वाधीनता देखी और लम्बी लड़ाई के पश्चात् हुआ मोहभंग भी देखा।
नेहरू के रूप में समाजवादी व्यवस्था का समर्थक नेता जब तक जीवित था तब तक लोकमानस में एक सकारात्मकता थी भी किन्तु नेहरू की मृत्यु के बाद के कुछ घटनाक्रम (बल्कि इस घटनाक्रम का आरम्भ नेहरूजी के जीवित रहते ही हो चुका था ) ने भारतीय मानसिकता को अत्यधिक विचलित किया। नयी कविता की समाप्ति का दौर अर्थात् साठोत्तरी कविता के आगमन-काल में सन् 1962 में हुआ भारत-चीन संघर्ष, भारत की पराजय आदि घटनाओं ने भारत की अस्मिता को चोट पहुँचाई। भारत चीन युद्ध के कारण साम्यवादियों में गहरे मतभेद निर्माण हुए पश्चात् ताश्कंद में शास्त्रीजी की सन्देहास्पद मृत्यु और इन्दिरा गाँधी का सत्ता में पदार्पण जैसी घटनाओं ने भारतीय राजनीति में भारी उथल- पुथल मचा दी।
साथ ही, देश में बढ़ती राजनैतिक विसंगतियाँ, भ्रष्टाचार और राजनैतिक उठा-पटक ने मोहभंग को बढ़ावा दिया। दूसरी ओर समाज में व्याप्त स्वार्थवृत्तियाँ, भ्रष्टाचार, शोषण, विषमता, अव्यवस्था में निरन्तर वृद्धि होती रही। भारत जैसे कृषिप्रधान देश में खाद्यान्न समस्या व्युत्पन्न हुई। प्रकृति की मार झेलते किसान, मजबू श्रमजीवी, मध्यमवर्ग गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी में पिसने लगे। इस वातावरण में स्वाभाविक रूप में अनास्था, घुटन, निराशा, पराजय-बोध छाया हुआ था। वस्तुतः वाम कविता के रूप में कोई स्वतन्त्र काव्यान्दोलन नहीं छेड़ा गया बल्कि इस कालखण्ड में कवियों का एक वर्ग ऐसा था जिसका मुख्य लक्ष्य वर्ग संघर्ष का रूपायन करने की अपेक्षा देश के जनतन्त्र,
देश के जनवादी मूल्य और सामान्य-दलित, पीड़ित, शोषित, आदिवासी, अल्पसंख्यक लोगों के जनवादी अधिकारों के लिए संघर्ष करना था। ऐसे लोगों का रचना-कर्म, जो व्यवस्था के विरुद्ध जाकर जनसामान्य के जनवादी अधिकारों की रक्षा हेतु कटिबद्ध व संघर्षरत है वाम कविता कहलाया गया। एक तरह से वाम कविता सातवें दशक की प्रतिबद्ध धारा का विकास है। चंचल चौहान ने इसका नामकरण करने का प्रयास करते हुए इसे 'सत्तरोत्तरी वाम जनवादी प्रतिबद्ध कविता' कहा। इस लम्बे-चौड़े नाम का मजेदारपन नजरंदाज करें तो यही कोशिश उभरकर आती है कि वाम, जनवादी, प्रतिबद्ध अलग-अलग चीजें नहीं बल्कि एक ही विचारसरणी में बँधे नाम हैं।
इस समय ढेरों मात्रा में वामपंथी लघु पत्रिकाएँ निकल रही थीं और तत्कालीन युवा पीढ़ी प्रेम कविता लिखने के बजाय जनसामान्य की संघर्षगाथा को शब्दबद्ध कर रही थीं। इस कालखण्ड में रचना-कर्म में निरन्तर लीन वेणु गोपाल, आलोक धन्वा, कुमार विकल, डॉ. रणजीत, विष्णुचन्द्र शर्मा, अरुण कमल, श्रीराम तिवारी, ज्ञानेन्द्रपति और धूमिल जैसी काव्य-प्रतिभाओं का अविर्भाव हुआ। इनमें से लगभग सभी कवि वामपंथी संगठनों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए थे और इस बात में विश्वास करते थे कि कविता की योग्य समझ के लिए समाज के अन्तर्विरोधों और वस्तुगत परिस्थितियों को समझना आवश्यक है। इस समझ की प्राप्ति वे संघर्षरत सर्वहारा संगठन से जुड़ने के पश्चात् ही सम्भव मानते थे । सम्भवतः इसी उद्देश्य से 'जनवादी लेखक संघ',
'नवजनवादी लेखक संघ' जैसे संगठन आकार ग्रहण करने लगे थे। इन कवियों की वाणी में जन पक्षधरता और दमखम था । वेणु गोपाल जैसे कवि अध्यापक को पुलिस के अत्याचार केवल इस कारण सहने पड़े क्योंकि पुलिस और कुल व्यवस्था को उनकी कविताएँ खतरनाक लगीं। उनकी गिरफ्तारी पर नन्द चतुर्वेदी ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका 'बिन्दु' में लिखा "हर प्रजातन्त्र की मौत का सिलसिला पुलिसवालों के काव्य-पारखी होने से शुरू होता है । प्रजातन्त्र तब पूरी तरह गड़बड़ा जाता है जब प्रबुद्धों का काम पुलिस और पुलिस का काम प्रबुद्ध करने लगते हैं। मुझे हिन्दुस्तान की आबोहवा में प्रबुद्धों और पुलिस के बीच कामकाज की यह तब्दीली नज़र आने लगी है और इसलिए मुझे भय है कि कुछ ही दिनों में प्रजातन्त्र महज एक मुहावरे की तरह काम में आने लगेगा।" इस पृष्ठभूमि पर वेणु गोपाल की वाम लेखनी चलती रही -
नकाबों के खिलाफ
खड़ा हुआ हमारा इनकार
हमारे जिस्म से रिसते
खून की
आखिरी बूंद में भी रहेगा। 36
वाम कविता में सवाल उठाते धूमिल जैसे कवि हुए जिन्होंने 1972 में प्रतिबद्ध कविता की संकल्पना को विस्तार दिया । आक्रोश,
व्यंग्य, विद्रोह से कूटकर भरी यह कविताएँ वाम कविता मात्र की नहीं, समग्र हिन्दी कविता की अनमोल पूँजी बन गई -
... मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद माल गोदाम में लटकती हुई उन बाल्टियों की तरह है जिस पर 'आग' लिखा है, और उसमें बालू और पानी भरा है। "
धूमिल जैसे कवियों ने कविता को 'न भूतों' रूप में परिभाषित किया -
कविता क्या है ? कोई पहनावा ? कुर्ता पाजामा है ?
ना भाई ना,
कविता-
शब्दों की अदालत में
मुजरिम के कटघरे में खड़े बेकसूर आदमी का
हलफनामा है
कविता
भाषा में
आदमी होने की तमीज है।
एक ओर कविता और दूसरी ओर जनता के प्रति प्रतिबद्ध 'वाम कविता' को लेकर प्रदीप सक्सेना ने लिखा है - "आज कवि यह नहीं कह सकता कि अमुक रचना उसने पता नहीं किस मूड में लिखी थी और यह भी कि अर्थ तो आलोचक लगाए। आज वह पूरी सचेतना के साथ अवाम के बीचोंबीच खड़ा है। अवाम को नजरंदाज करके वह शुतुरमुर्ग रह सकता है, ऐसी चेतनाशील रचनाएँ इस दौर की विशेष उपलब्धि है जो जनता को उसके शत्रु-मित्र की पहचान कराती हैं।"3" वाम कविता की सक्षम अभिव्यक्तियों के बावजूद उसमें निहित आक्रामकता, दुस्साहस, स्त्री विषयक दृष्टिकोण, यौन शब्दावली की भरमार और सपाट गद्यात्मकता के कारण इस पर आक्षेप उठते रहे। बावजूद इसके, व्यक्तिवादिता की अपेक्षा जनता के हित के लिए प्रतिबद्ध 'वाम कविता' निर्विवाद रूप से हिन्दी कविता का महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।
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