नन्ददुलारे वाजपेयी की युगजीवन और युगकाव्य - Life and poetry of Nanddulare Vajpayee
अपनी आलोचना के प्रतिमान के रूप में उन्होंने युगजीवन और युगकाव्य का एक विकासशील प्रतिमान ग्रहण करने की कोशिश की है। इस विकासशील प्रतिमान में पश्चिम की साम्राज्यवादी नीति और भारत की जनता का उसके विरुद्ध अदम्य विद्रोह, देश में सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों के लिए प्रयत्न, अपनी आध्यात्मिक परम्परा के आदर्शों को नये रूप में ग्रहण करना, व्यक्ति के असीम आध्यात्मिक मूल्य को स्वीकार करते हुए भी व्यक्तिवाद से दू रहना तथा सामाजिक अर्थनीति के क्षेत्र में समाजवादी व्यवस्था को स्वीकार करते हुए भी भौतिकवाद को नहीं अपनाना शामिल है।
वे विकास की अनिवार्यता के साथ आस्था की अनिवार्यता को एक अटल साहित्यिक नियम मानते हैं। उनके अनुसार साहित्य में उच्च कोटि की नैतिक चेतना का होना भी बहुत ज़रूरी है। यह नैतिक चेतना साहित्य में किसी नीतिवाद की सृष्टि नहीं करती है, बल्कि मानव सम्बन्धों को दृढ़ता और मानव महत्त्वाकांक्षाओं को परितृप्ति प्रदान करते हुए साहित्य की रसात्मक अनुभूति को प्रांजल और पूर्ण बनाती है। (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न)
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