नन्ददुलारे वाजपेयी की जीवन प्रवाह और साहित्य की स्वायत्तता - Life flow of Nanddulare Vajpayee and autonomy of literature

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने साहित्य और जीवन का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध माना है। उनके अनुसार "साहित्य का मानव जीवन से चिरन्तन सम्बन्ध है। मानव जीवन ही साहित्य का उपादान और विषयवस्तु रहा है और रहेगा। मानव जीवन के महत्त्वपूर्ण या मार्मिक अंशों की अभिव्यक्ति, यही साहित्य की मोटी परिभाषा हो सकती है।" (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न)


वाजपेयी जी साहित्य की स्वतन्त्र सत्ता के पक्षधर तो हैं परन्तु वे उसे मानव-उन्नयन के गहन दायित्व से पूर्ण कार्य मानते हैं। मानव-जीवन ही उसका प्रस्थान बिन्दु और अनिवार्य परिणति है।

हर युग में साहित्य अनेक दबावों से होकर गुजरता है, परन्तु साहित्य को उस दबाव का विरोध करना चाहिए, यही साहित्य की स्वतन्त्र सत्ता या स्वायत्तता है। विरोध का अर्थ अन्ध-विरोध या अराजकता नहीं है, उसमें सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्वबोध और मानवीयता की पक्षधरता होनी चाहिए। उन्होंने लिखा है "साहित्य एक अन्तरंग प्रक्रिया है, जो जन-मन का - संस्कार करती है, बौद्धिक विकास में योग देती है और समस्त मनुष्यों की समानता का उद्घोष करती है। साहित्यकार यह मानकर चलता है कि मनुष्य मात्र में समान हृदय,

समान बुद्धि और समान विवेक की सम्भावना है और समानता का अधिकार मनुष्य मात्र को है।" (- 'राष्ट्रीय साहित्य') वाजपेयी जी जीवन और साहित्य का घनिष्ठ सम्बन्ध मानते हैं। साहित्य की स्वायत्त सत्ता है लेकिन यह सत्ता जीवन सापेक्ष है। उनका विचार है कि "साहित्य में मनुष्य का जीवन ही नहीं, जीवन की वे कामनाएँ जो अनन्त जीवन में भी पूरी नहीं हो सकती, निहित रहती है। जीवन यदि मनुष्यता की अभिव्यक्ति है तो साहित्य में उस अभिव्यक्ति की आशा उत्कण्ठा भी सम्मिलित हैं। जीवन यदि सम्पूर्णता से रहित है तो साहित्य उसके सहित है तभी तो उसका नाम साहित्य है।" (- 'आधुनिक साहित्य)