आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की साहित्य और भाषा - Literature and Language of Acharya Hazariprasad Dwivedi

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने साहित्य की कोई स्थिर परिभाषा नहीं दी है। लेकिन साहित्य के अर्थ, उद्देश्य और उसकी सामाजिक भूमिका पर उन्होंने अपने अनेक निबन्धों और पुस्तकों में विस्तार से विचार किया है। द्विवेदी जी साहित्य को मनुष्य के भौतिक और मानसिक जीवन के विकास का परिचायक मानते हैं। इसलिए साहित्य के प्रश्नों पर विचार करते समय वे मनुष्यता और मनुष्य की सांस्कृतिक आवश्यकताओं पर भी विचार करते हैं। साहित्य का उद्देश्य मनुष्य जीवन के यथार्थ की अभिव्यक्ति और उसके स्तर को ऊपर उठाना है - "साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य पढ़ने से हम जीवन के साथ ताजा और घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित करते हैं।

साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है। जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। जीवन के जो पहलू हमें नजदीक से और स्थायी रूप से प्रभावित करते हैं उनके विषय में मनुष्य के अनुभवों को समझने का एकमात्र साधन साहित्य है ।" (- 'साहित्य सहचर')


मनुष्य जीवन के प्रति सहानुभूति उत्पन्न करके मनुष्यता के वास्तविक लक्ष्य तक ले जाने का संकल्प और इस दिशा में दीर्घकाल तक मार्गदर्शन करने वाले चरित्रों की सृष्टि ही साहित्य का लक्ष्य है। इसलिए उपदेश या कुण्ठाओं की अभिव्यक्ति श्रेष्ठ साहित्य का विषय नहीं हो सकते।

उन्होंने लिखा है कि "यह सत्य है कि साहित्य नीतिशास्त्र की सूचियों का संग्रह नहीं होता, पर यह और भी सत्य है कि मनो-विज्ञान और प्राणी- विज्ञान की प्रयोगशालाओं से उधार लिए हुए प्राणियों का मेला भी नहीं होता। जो साहित्य अविस्मरणीय दृढचेता चरित्रों की सृष्टि नहीं कर सकता, जो मानव- व-चित्त को मथित और चलित करने वाली परिस्थितियों की उद्भावना नहीं कर सकता और मनुष्य के दुःख-सुख को पाठक के सामने हस्तामलक नहीं बना देता वह बड़ी सृष्टि नहीं कर सकता।" (- 'साहित्य सहचर')


द्विवेदी जी की मान्यता है कि भाषा सामाजिक सम्बन्धों का प्रतीक होती है। साहित्य पाठक के मन में सुख-दुःख की संवेदना उत्पन्न करता है। इस प्रकार वह मनुष्य और मनुष्य के बीच एकता स्थापित करता है।

इस प्रक्रिया में शब्द और उनका अर्थ साहित्य की सत्ता का निर्माण करते हैं। साहित्य में शब्दों के अभिधेय अर्थ से बढ़कर गहरा अर्थ भरने का प्रयास होता है। अपने निबन्ध 'साहित्य में व्यक्ति और समष्टि' में साहित्य और भाषा के स्वरूप पर विस्तार से चिन्तन किया है। द्विवेदी जी का विचार है कि मनुष्य का ज्ञान पारस्परिक आदान-प्रदान की अन्तर्वैयक्तिक प्रक्रिया की उपलब्धि होता है और भाषा वह माध्यम है जिससे हमें सामान्य अन्तर्वैयक्तिक उपलब्धियों की सूचना मिलती हैं। भाषा का विकास भाषा का व्यवहार करने वाले समाज के विकास की स्थिति को दर्शाता है। पिछड़े हुए समाज की भाषा में वैज्ञानिक तथ्यों को अभिव्यक्त करने की क्षमता नहीं होती है अर्थात् उस को बोलने वाले लोगों का विकास वैज्ञानिक तथ्यों को अभिव्यक्त करने की क्षमता वाली भाषा बोलने वाले लोगों की तुलना में कम हुआ है।


भाषा की विकास-यात्रा मनुष्य की विकास-यात्रा है। भाषा के रूपों में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। द्विवेदी जी ने लिखा है कि मनुष्य की भाषा सम्बन्धी "निरन्तर परिवर्तनशील और परिवर्धमान इन उपलब्धियों के लिखित रूप को ही 'सामान्य' रूप से साहित्य कहते हैं। विशेष रूप में साहित्य उपलब्धियों के उस रूप को कहते हैं, जो हमारी सामान्य मनुष्यता को प्रभावित करती है और भाव के आवेग से वेगवती होकर सामान्य मनुष्य के सुख-दुःख को विशेष मनुष्य श्रोता या पाठक के चित्त में संचारित कर देती है।" (- निबन्ध 'साहित्य में व्यक्ति और समष्टि', 'हिन्दी आलोचना के आधार स्तम्भ' में संकलित) द्विवेदी जी कहते हैं कि शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा शब्दों का निर्माण इस उद्देश्य से किया जाता है ताकि एक व्यक्ति की भावना को दूसरे व्यक्ति तक आसानी से पहुँचाया जा सके।

किसी विशेष अर्थ के लिए विशेष शब्द का चयन मनुष्य की अन्तर्वैयक्तिक सामान्य सत्ता के प्रति निष्ठा को दर्शाता है। मनुष्य का सामाजिक अस्तित्व इसी सामान्य सत्ता की मान्यता पर निर्भर होता है। इस प्रकार शब्दों द्वारा व्यक्त भाषा हमारे सामाजिक सम्बन्धों का प्रतीक होती है। चूँकि भाषा साहित्य का वाहन है, इसलिए द्विवेदी जी साहित्य को सामाजिक वस्तु मानते हैं। वह हमें मनुष्यता की उच्चतर भूमि पर ले जाने का माध्यम है। जो साहित्य या काव्य यह कार्य नहीं करता, द्विवेदी जी की दृष्टि में साहित्य नहीं है - "हमें दृढ़ता से केवल एक बात पर अटल रहना चाहिए, और वह हमें हमारी पशु सामान्य मनोवृत्तियों से ऊपर उठाकर समस्त जगत् के सुख-दुःख को समझने की सहानुभूतिमय दृष्टि देता है या नहीं।" (- निबन्ध 'साहित्य में व्यक्ति और समष्टि', 'हिन्दी आलोचना के आधार स्तम्भ' में संकलित )