नन्ददुलारे वाजपेयी की साहित्य और राष्ट्रीय चेतना - Literature and national consciousness of Nanddulare Vajpayee

वाजपेयी जी भारतीय जनतन्त्र की नैतिक और भौतिक उन्नति को मुख्य लक्ष्य मानते हैं। उन्होंने भारतीय जन-समाज के विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए 'रचनात्मक और क्रियाशील जनतन्त्र' के निर्माण को साहित्य का अभीष्ट लक्ष्य बताया है। एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों को साम्राज्यशाही से मुक्त करने में सहायता देना तथा दुनिया को परमाणु - विध्वंस की विभीषिका से उबारना भी हिन्दी के साहित्यकारों का बहुत बड़ा दायित्व है । उन्होंने लिखा है कि "घर को संभाल कर ही बाहर की देख-भाल की जा सकती है, इसलिए हमारा पहला लक्ष्य रचनात्मक जनतन्त्र को अपने देश में ही कार्यान्वित करना है।" (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न') वाजपेयी जी की मान्यता है कि युग चेतना को अंगीकार करने से श्रेष्ठ साहित्य के सृजन की सम्भावना बढ़ जाती है।

यदि इस मूल चेतना को अंगीकार कर लिया गया है तो फिर साहित्यकार किसी भी विषयवस्तु या शैली को स्वीकार करके साहित्य-सृजन करे, वह उचित है और उससे साहित्य में जो अनेकरूपता आएगी उससे साहित्य की गुणवत्ता में वृद्धि होगी । करुण रस के काव्य और दुःखान्त रचनाओं में भी इसी रचनात्मक जीवन-चेतना से संवेदना का उत्कर्ष होता है और उन रचनाओं की महत्ता स्थापित होती है। उन्होंने जीवन-चेतना के आधार पर अपना काव्य विवेक जाग्रत करने के विचार को हिन्दी के नये साहित्य के लिए एक निकष के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका स्पष्ट अभिमत है कि "किसी काव्य या साहित्यिक कृति का श्रेष्ठत्व किसी संवेदन या रसविशेष में नहीं है, बल्कि उस संवेदन की मनोवैज्ञानिक प्रांजलता पुष्टता और गहराई में है।" (- 'नया साहित्य : नये प्रश्न )