आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का साहित्य और लोकजीवन - Literature and public life of Acharya Ramchandra Shukla

आचार्य शुक्ल मानते हैं कि लोकमंगल की साधनावस्था वाला काव्य ही मनुष्य के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने लोकधर्म सम्बन्धी अपनी अवधारणा का अपने लेखन में कई बार उल्लेख किया है। अपनी पुस्तक 'गोस्वामी तुलसीदास' में इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है "संसार जैसा है वैसा मानकर उसके बीच से एक - एक कोने को स्पर्श करता हुआ जो धर्म निकलेगा वही लोकधर्म होगा। जीवन के किसी एक अंग मात्र को स्पर्श करने वाला धर्म लोकधर्म नहीं। जो धर्म उपदेश द्वारा न सुधरने वाले दुष्टों और अत्याचारियों को दुष्टता के लिए छोड़ दे, उनके लिए कोई व्यवस्था न करे, वह लोकधर्म नहीं, व्यक्तिगत साधना है। जनता की प्रवृत्तियों का ... औसत निकालने पर धर्म का जो मान निर्धारित होता है वही लोकधर्म होता है।"

शुक्ल जी का लोक वस्तुतः अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ समाज ही है और जिससे समाज चलता है, लोक की रक्षा होती है वही व्यापक धर्म है। और स्पष्ट शब्दों में "वह व्यवस्था या वृति, जिससे लोक में मंगल का विधान होता है, 'अभ्युदय' की सिद्धि होती है, धर्म है।" (- 'काव्य में लोक-मंगल की साधनावस्था', 'चिन्तामणि', पहला भाग)


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने वैज्ञानिक दृष्टि से जीवन और जगत् के क्रिया व्यापारों को समझाते हुए व्यक्ति- धर्म के स्थान पर लोक-धर्म को प्रतिष्ठापित किया। शुक्ल जी साहित्य की गति को सामाजिक गति से अलग नहीं मानते हैं।

उनका स्पष्ट मत हैं कि "मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है। उसका अपनी सत्ता का ज्ञान तक लोकबद्ध है। लोक के भीतर ही कविता क्या किसी कला का प्रयोजन और विकास होता है। " (- 'चिन्तामणि', दूसरा भाग)


शुक्ल जी जगत् 'को 'महाकाव्य' और 'विश्वकाव्य' कहते हैं। उनके अनुसार यह जगत् ही कविता का मूल स्रोत है। वे मानते हैं कि इस जगत् के प्रत्यक्ष और गूढ़ तथ्य ही मनुष्य की कल्पना और भावों का आधार है।

उन्होंने लिखा है कि "संसार सागर की रूप-तरंगों से ही मनुष्य की कल्पना का निर्माण और इसी रूप-गति से उसके भीतर विविध भावों या मनोविकारों का विधान हुआ है। सौन्दर्य, माधुर्य, विचित्रता, क्रूरता इत्यादि की भावनाएँ बाहरी रूपों और व्यापारों से ही निष्पन्न हुई हैं। हमारे प्रेम, भय, आश्चर्य, क्रोध, करुणा इत्यादि भावों की प्रतिष्ठा करने वाले मूल आलम्बन बाहर ही के हैं इसी चारों ओर फैले हुए रूपात्मक जगत् के ही हैं।" (- 'रसात्मक- बोध के विविध रूप', 'चिन्तामणि', पहला भाग) यह रूप-विधान केवल बाहरी नहीं है, हमारे मन में भी होता है। मानसिक रूप- विधान स्मृति और कल्पना के रूप में होता। ये दोनों रूप-विधान प्रत्यक्ष अनुभव किए हुए रूप- विधान पर आधारित होते हैं। प्रत्यक्ष रूप में सभी ज्ञानेन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान शामिल है। कल्पित रूप और प्रत्यक्ष रूप में मार्मिक साम्य का सूत्र होना आवश्यक है, अन्यथा 'कल्पना' कोरी कल्पना बन जाती है।