साहित्य और साहित्यकार का दायित्व - Literature and the responsibility of the writer

विजयदेवनारायण साही का काव्य-चिन्तन खुद से ही विमर्श की प्रक्रिया में जनित और विकसित है, इसलिए साहित्य और साहित्यकार के दायित्व पर विचार करने की प्रक्रिया में भी वे अपने ढंग से भक्त और रीतिवादी कवियों का उल्लेख करते हैं- "उस रचनात्मक दायित्व के प्रति उनकी अलग-अलग दृष्टियों और लक्ष्यों के बावजूद यह कहना सही नहीं है कि उनका कोई दायित्व नहीं या उन्हें अपने दायित्वों की कोई समझ नहीं।"


साहित्य और साहित्यिक दायित्व के कारकों को साही किसी एक स्थल या प्रारूप में संकेन्द्रित कर देने के पक्ष में नहीं हैं जिसे किसी शंकाविहीन ढंग से लेखक की सामाजिक या राजनैतिक चेतना कहने का अवकाश मिल सके।

इन कारकों में वे सामाजिक चेतना के साथ ही पारिवारिक चेतना, मानवीय चेतना से आगे बढ़कर कास्मिक चेतना तक की बात करने लगते हैं। पाश्चात्य कवि शेली का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि सामाजिक बन्धन से उत्पन्न चेतना कब और कैसे एक ब्रह्माण्डीय अनुभव में बदल जाती है। गोर्की, जायसी, सूर तुलसी आदि अनेक रचनाकारों के उदाहरण देकर वे इस मत को प्रतिपादित करते हैं कि "साहित्यकार का दायित्व कहीं भी, कभी भी परिवर्तन के विरूद्ध नहीं पड़ता। और साहित्यकार का दायित्व तो सही मायने में परिवर्तन को आवश्यक गम्भीरता देता है तथा समाज के अन्तिम लक्ष्यों के साथ निरन्तर हमारे परिवर्तन की गति को जोड़ता है, निरन्तरता प्रदान करता है।"


एक संगोष्ठी में पठित अपने प्रवर्तन लेख 'साहित्य क्यों ?' में विजयदेवनारायण साही साहित्य-सृजन के


विभिन्न विकल्पों का संकेत प्रस्तुत करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि वे केवल सन्दर्भ को उजागर मात्र करना चाहते हैं और यहाँ किसी सिद्धान्त या मतवाद का प्रतिपादन उनका लक्ष्य नहीं है। विभिन्न लक्ष्यों और विचार-सरणियों को प्रश्नांकित करना ही वे अपना घोषित उद्देश्य मानकर चलते हैं। किसी लक्ष्य तक पहुँचने की आत्ममुग्धता के बजाय अतल की ओर उन्मुख कर सकने के प्रयास में ही अपनी कृतकार्यता देखते हुए वे कहते हैं कि "आज की तमाम साहित्यिक चीख-पुकार,

आन्दोलन, टकराहट, गिरोह-बंदियों, घोषणापत्रों की सतह के नीचे अगर मैं किसी हद तक उस गहरे अतल की ओर आपको उन्मुख कर सका हूँ तो मैं अपने काम को पूरा समझँगा। मेरे लिए इतना ही काफी होगा यदि मैं आपके सम्मुख स्पष्ट कर सका हूँ कि जिन मान्यताओं के ऊपर हम खड़े हैं उन पर एक बार फिर प्रश्नवाचक दृष्टि डालने की जरूरत है।" अपने मत के समर्थन में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता की निम्नलिखित पंक्तियों का उल्लेख करते हैं-


पाँव रखते ही


बाँस का पुल चरमराता डोलता है। अतल खाई है।


कहीं नीचे बहुत गहरे