व्यक्तिवादी आलोचना की मुख्य मान्यताएँ - Main Assumptions of Individualist Criticism
व्यक्तिवादी आलोचना के अर्थ और स्वरूप पर विचार करने से उसकी कुछ मान्यताएँ हमारे सामने स्पष्ट हो जाती हैं। इन्हें सार रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-
(1) लेखक के व्यक्तित्व और कृतित्त्व की समरसता से ही सार्थक रचना का सृजन होता है। रचना लेखक के आत्मानुभवों और कल्पनाओं की अभिव्यक्ति होती है, इसलिए लेखक के व्यक्तित्व को जानकर ही रचना के सही सन्दर्भ तक पहुँचा जा सकता है।
(ii) साहित्यिक रचना उसके लेखक के जीवन का परिचय प्राप्त करने का प्रामाणिक माध्यम है, क्योंकि रचना में लेखक का जीवन-संघर्ष अभिव्यक्त होता है।
(iii) रचना में अभिव्यक्त अनुभूतियों और विचारों के माध्यम से लेखक के व्यक्तित्व के भावनात्मक और वैचारिक पक्षों को समझा जा सकता है।
(iv) रचनाकार जिन जीवन-मूल्यों को जीता है या जीने की कल्पना करता है और उनके लिए जो संघर्ष करता है, रचना में उन जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति स्वतः हो जाती है। (v) रचनाकार और उसकी रचना को परस्पर सम्बद्ध करके नहीं देखने पर लेखक की रचनात्मक भावना और उसके साहित्यिक उद्देश्य को समझने में पूर्ण सफलता नहीं मिल सकती ।
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