डॉ. रामविलास शर्मा की आलोचना के मुख्य सरोकार - Main concerns of Dr. Ramvilas Sharma's criticism

डॉ. रामविलास शर्मा अंग्रेज़ी के अध्यापक थे, लेकिन उन्होंने रचना और आलोचना के लिए हिन्दी को अपनाया । उन्होंने अपने लेखन से हिन्दी भाषा और साहित्य की प्रगतिशील परम्परा का उद्घाटन किया और हिन्दी के सम्मान और गौरव की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष किया। उनकी आलोचना की मुख्य चिन्ता अपनी साहित्यिक परम्परा के प्रगतिशील तत्त्वों का विकास तथा मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा के साथ शोषणविहीन समाज का निर्माण करना है। अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए डॉ. शर्मा ने विभिन्न स्तरों पर वैचारिक संघर्ष किया और साहित्य और समाज की समस्याओं का समाधान किया है। डॉ. शर्मा की सैद्धान्तिक आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता साहित्य सम्बन्धी इतिहास दृष्टि की मौलिकता है।

साहित्य का विवेचन करते हुए उन्होंने जातीय भाषा और जातीय साहित्य के उद्भव और विकास को केन्द्र में रखा है। 'हिन्दी जाति' और 'हिन्दी नवजागरण' की अवधारणाएँ उनकी आलोचना दृष्टि के विशिष्ट आयाम हैं। आइए, अब हम उनकी आलोचकीय चिन्ता के विभिन्न आयामों पर विस्तार से विचार करते हैं।


जातीय भाषा और जातीय साहित्य


डॉ. शर्मा के विवेचन में 'जाति' एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा है। इसके आधार पर उन्होंने 'हिन्दी जाति' और 'हिन्दी प्रदेश' जैसी अपनी मौलिक अवधारणाओं का विकास किया है। यह प्रचलित भारतीय जाति- व्यवस्था के अन्तर्गत आने वाली 'जाति' से भिन्न और अर्थगर्भित अवधारणा है।

किसी भी समाज का इतिहास उसकी भाषा से जुड़ा हुआ होता है। भाषा के अध्ययन से हम जान सकते हैं कि उसका व्यवहार करने वाला समाज विकास के किस दौर से गुज़रा है या गुज़र रहा है। साहित्य का इतिहास भाषा के इतिहास का अभिन्न अंग होता है। अतः साहित्य के इतिहास की सही समझ के लिए आवश्यक है कि हमें उस भाषा और समाज के इतिहास का ज्ञान हो। डॉ. रामविलास शर्मा समाज, भाषा और इतिहास के अन्तस्सम्बन्धों की गहराई और जटिलता को पहचानते हुए साहित्य के मूल्यांकन के लिए समाजनिष्ठ ऐतिहासिक दृष्टि की आवश्यकता प्रतिपादित करते हैं। उन्होंने लिखा है कि "भाषा के बिना साहित्य का अस्तित्व असम्भव है।

इस मानव समाज के गठन के रूप बदलते रहते हैं। पूँजीवादी समाज, उससे पहले सामन्ती समाज और उससे भी पहले कबीलाई समाज इनमें सामाजिक - गठन के रूप अलग-अलग तरह के होते हैं।" (- 'भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएँ)


साहित्य के इतिहास में भाषा और समाज के आपसी सम्बन्धों की पहचान तो होती ही है, साथ ही इन सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तन का पता भी चलता है। हिन्दी भाषा और साहित्य के जातीय स्वरूप पर विचार करते समय डॉ. शर्मा ने 'हिन्दी जाति' के निर्माण की पृष्ठभूमि और प्रक्रिया को भी समझाया है।

वे 'जाति' को आर्थिक सम्बन्धों के अनुसार गठित समाज का एक रूप मानते हैं। इसका निर्माण सामाजिक विकास की प्रक्रिया में सामन्ती अवस्था के अन्तर्गत व्यापारिक पूँजीवाद के साथ विषम गति से लम्बे समय तक होता है। डॉ. शर्मा के अनुसार 'जाति' वह सामाजिक इकाई है जिसमें नवजागरण के कार्य सम्पन्न होते हैं। इसका निर्माण हमेशा सामन्ती व्यवस्था के किसी प्रदेश में स्थायी रूप से रहने वाले 'जनों' से मिलकर होता है। अनेक जनपदों के मेल से जातीय प्रदेश बनता है। आर्थिक सम्बन्धों के प्रसार की प्रक्रिया में जनपदीय भाषाओं के माध्यम से जनपदों में पारस्परिक सम्पर्क और संचार बढ़ता है।

इन्हीं जनपदीय भाषाओं में से कोई एक भाषा प्रायः अन्य जनपदीय भाषाओं के भाषा तत्त्वों को आत्मसात् करते हुए जातीय भाषा का स्वरूप ग्रहण का लेती है। जातीय भाषा के निर्माण में जनपदीय भाषाओं का आधारभूत योगदान होता है। साहित्य के जातीय स्वरूप को स्पष्ट करते हुए डॉ. शर्मा ने लिखा है कि "जैसे किसी भाषा के बोलने वालों के अस्तित्व के बिना उस भाषा के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती, वैसे ही उस भाषा के माध्यम से साहित्य रचने, उसे पढ़ने और सुनने वालों के समुदाय के बिना उस साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती। बांग्ला मराठी, तमिल आदि भाषाएँ बोलने वाले समुदाय आधुनिक जातियाँ हैं।

इन भाषाओं में रचा हुआ साहित्य इनका जातीय साहित्य है।" (- 'महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी डॉ. शर्मा हिन्दी के विकास में उनकी बोलियों का महत्त्वपूर्ण योगदान मानते हुए इनके साहित्य को भी जातीय साहित्य के अन्तर्गत स्वीकार करते हैं। उनके अनुसार यदि आर्थिक विकास की प्रक्रिया में पूँजीवादी विकास के साथ लघुभाषा या बोली का नजदीकी सम्बन्ध हो तो कोई भी लघुभाषा या बोली जातीय भाषा के रूप में विकसित हो सकती है। डॉ. शर्मा जातीय चेतना के निर्माण में उत्पादन केन्द्रों की तुलना में विनिमय केन्द्रों की भूमिका निर्णायक मानते हैं। उनकी दृष्टि में विनिमय के विस्तार के बिना औद्योगिक उत्पादन की कोई सार्थकता नहीं है। साहित्यिक विरासत नहीं होने के बावजूद 'खड़ी बोली' हिन्दी के जातीय भाषा के में विकसित होने का यही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य है।

डॉ. शर्मा किसी भी भाषा के साहित्य का विवेचन अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य में करने तथा विभिन्न भाषाओं के साहित्य के पारस्परिक सम्बन्धों को दृष्टिगत रखते हुए साहित्य के इतिहास-लेखन को आवश्यक मानते हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार राष्ट्रीयता और राष्ट्रीय एकता की समस्या भी भारतीय भाषाओं के पारस्परिक सम्बन्धों को पहचानकर सुलझाई जा सकती है। वे कहते हैं कि राष्ट्रीय एकता और भारतीय संस्कृति को व्यापक आधार तभी प्राप्त होगा जब अपनी भाषाओं के माध्यम से विभिन्न जातियों के लोग इस एकता की पुष्टि करें और पूरे राष्ट्र की संस्कृति को समृद्ध करें। जिस प्रकार अनेक राष्ट्रों का अस्तित्व मानवता का विरोधी नहीं है, उसी प्रकार अनेक भाषाओं और जातियों का अस्तित्व भी राष्ट्रीयता का विरोधी नहीं है।