शुक्लोत्तरयुगीन मुख्य आलोचक - the main critic of post-Shukla era
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी
आचार्य शुक्ल की मान्यताओं का विरोध छायावादी कवियों के साथ पण्डित शान्तिप्रिय द्विवेदी ने भी किया था, लेकिन उनके पास ऐसा काव्य-विवेक और तर्क शक्ति नहीं थी जो शुक्ल जी की मान्यताओं को निरस्त कर सके। शुक्ल जी ने अपने अथक प्रयासों से हिन्दी आलोचना को जिस तरह व्यवस्थित किया था एवं उसे जो प्रौढ़ता प्रदान की थी, उससे उनका आलोचकीय व्यक्तित्व बहुत समृद्ध और विराट् हो चुका था। उनसे बहुत कठिन कार्य था । आलोचना के स्तर पर उनसे सीधे-सीधे टकराने का साहस सर्वप्रथम आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने किया।
उन्होंने शुक्ल जी की आलोचना की अनेक त्रुटियों की ओर संकेत किया। रहस्यवाद को कनकौआ कहे जाने जैसी आचार्य शुक्ल की मान्यताओं को चुनौती देते हुए सन् 1931 में अपने निबन्ध 'श्री रामचन्द्र शुक्ल' में उन्होंने लिखा कि "स्थूल व्यवहारवाद को निस्सीम बतलाकर और रहस्यवाद की कनकौए से तुलना कर विद्वान शुक्ल जी ने नवीन कविता के साथ अन्याय किया है।" शुक्ल जी के सिद्धान्तों और प्रतिमानों की कमियों का सैद्धान्तिक स्तर पर प्रतिवाद करते हुए उन्होंने निष्कर्ष दिया कि "स्पष्ट है कि काव्य के ऊपर नीति का स्थूल शासन शुक्ल जी नहीं छोड़ सके और भारतीय काव्य-शास्त्रियों के रस तत्त्व की ऊँचाई को नहीं छू सके।"
सन् 1940 में शुक्ल जी पर एक अन्य निबन्ध में शुक्ल जी के काव्य-विवेचन की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा कि "उनका काव्य-विवेचन भी प्रबन्ध-कथानक और जीवन-सौन्दर्य के व्यक्त रूपों का आग्रह करने के कारण सर्वांगीण और तटस्थ नहीं कहा सकता। नवीन युग की सामाजिक और सांस्कृतिक जटिलताओं का विवेचन और उनसे होकर बहने वाली काव्यधारा का आकलन हम शुक्ल जी में नहीं पाते।" आचार्य शुक्ल के जीवनकाल में, जब उनका आलोचकीय व्यक्तित्व पूर्ण निखार पर था, आचार्य द्विवेदी ने उनसे असहमत होकर आलोचना को नयी दिशा की ओर मोड़ने का प्रयास किया। यह स्वच्छन्दतावादी आलोचना के विकास की दिशा थी।
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने छायावादी काव्यधारा के साहित्य को अपना व्यापक समर्थन दिया और 'प्रसाद', 'पंत' और 'निराला' के काव्य-सौन्दर्य को पूर्ण मनोयोग से उद्घाटित कर हिन्दी जगत् के सामने रखा। उन्होंने 'पंत' और 'निराला' को साहित्य के इतिहास में नवीन क्रान्ति और प्रवर्तन का कार्य करने का श्रेय दिया । 'प्रसाद' को कविता विषय का सबसे प्रथम विस्तार करने तथा कल्पना और सौन्दर्य के नये स्पर्श अनुभव करवाने वाला कवि बतलाया । उन्होंने छायावादी कवियों का समर्थन करते हुए साहित्य की स्वायत्त सत्ता को स्वीकार किया और लिखा कि "काव्य का महत्त्व तो काव्य के अन्तर्गत ही है, किसी भी बाहरी वस्तु में नहीं। सभी बाहरी के वस्तुएँ काव्य- निर्माण के अनुकूल या प्रतिकूल प्रस्थितियों का निर्माण कर सकती हैं; वे रचयिता के व्यक्तित्व पर विभिन्न प्रकार के प्रभाव डाल सकती हैं और डालती भी हैं;
पर इन स्वीकृतियों के साथ हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते कि काव्य और साहित्य की स्वतन्त्र सत्ता है, उसकी स्वतन्त्र प्रक्रिया और उसकी परीक्षा के स्वतन्त्र साधन हैं। " छायावाद को द्विवेदीयुगीन बौद्धिकता और नीतिमत्ता के विरुद्ध अनुभवप्रवण काव्यधारा घोषित करते हुए द्विवेदीजी उसमें अनुभूति, दर्शन और शैली का अद्भुत सामंजस्य दिखाते हैं और उसके आध्यात्मिक पक्ष को रेखांकित करते हैं । उन्होंने लिखा है कि छायावाद युग का उद्भव राष्ट्रीय इतिहास में कुछ स्पष्ट प्रेरणाओं से हुआ था और उसने राष्ट्र की ऐतिहासिक आवश्यकताओं को पूरा किया है।
आचार्य वाजपेयी द्वारा छायावाद के महत्त्व को स्थापित किए जाने से छायावाद सम्बन्धी अनेक भ्रमों और समस्याओं का समाधान हुआ और इस काव्यधारा के विभिन्न पक्षों का मूल्यांकन शुरू हुआ।
वाजपेयी जी ने 'हिन्दी साहित्यः बीसवीं शताब्दी', 'जयशंकर प्रसाद', 'प्रेमचंद', 'आधुनिक साहित्य', 'कवि निराला', 'नया साहित्यः नये प्रश्न' आदि आलोचना-ग्रन्थों की रचना की। इन ग्रन्थों में छायावाद, स्वछन्दतावाद और छायावादी कवियों और आधुनिक साहित्य का मूल्यांकन किया और अपने आलोचना- सिद्धान्त विकसित किए। वे साहित्य के मूल्यांकन में स्वच्छन्दता को उच्चतम मूल्य मानते थे इसलिए उनकी आलोचना को 'स्वच्छन्दतावादी आलोचना' कहा जाता है। उन्होंने कविता के इतर बाह्य मानों की तुलना में कविता के आन्तरिक तत्त्वों और 'काव्य-सौष्ठव' पर ही अधिक बल दिया है, इसलिए उनकी आलोचना को 'सौष्ठववादी आलोचना' भी कहा जाता है। अपने विचारों में भौतिकवाद और भाववाद का समन्वय करने के कारण कुछ आलोचकों ने इनकी आलोचना को 'समन्वयवादी आलोचना' भी कहा है।
वाजपेयी जी अपनी आलोचना में साहित्य के अलौकिक आधारों का खण्डन करते हुए रचना के सामाजिक आधारों का विवेचन करते हैं, लेकिन एक साथ ही बौद्धिकता, नैतिकता, उपयोगिता और कलावाद का विरोध करने लगते हैं। अनेक विचार सूत्रों को अपनी समीक्षा में सन्निहित करने के कारण साहित्य के सामाजिक आधारों का विवेचन फीका पड़ जाता है। वे किसी स्पष्ट साहित्य-दृष्टि का विकास करने में सफल नहीं हो पाते, बल्कि 'रूप या सौन्दर्य की सृष्टि द्वारा उच्च कोटि के अलौकिक आनन्द' की खोज में व्यस्त हो जाते हैं। फिर भी छायावादी काव्य को समुचित युगसन्दर्भ प्रदान करने और उसके आस्वादन को आसान बनाने में आचार्य वाजपेयी का योगदान असंदिग्ध है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना- दृष्टि और उनके आलोचकीय अवदान के सम्बन्ध में इस पाठ्यचर्या के खण्ड 2 की इकाई 2 में आप और अधिक जानकरी प्राप्त कर पाएँगे।
डॉ० नगेन्द्र
शुक्लोत्तर हिन्दी आलोचना में डॉ० नगेन्द्र का महत्त्वपूर्ण स्थान है। डॉ० नगेन्द्र ने 'सुमित्रानन्दन पंत और 'आधुनिक हिन्दी कविता की प्रवृत्तियाँ' नामक आलोचना पुस्तकों में छायावादी काव्य का जो मूल्यांकन किया है, उससे उन्हें छायावादी और स्वच्छन्दतावादी आलोचक के रूप में पहचान मिली है। 'सुमित्रानन्दन पंत' नामक पुस्तक में छायावाद की सामान्य विशेषताओं का विवेचन करने के बाद डॉ. नगेन्द्र ने पंत के काव्य की भावभूमि, विचारधारा, कला और भाषा आदि का सूक्ष्म विवेचन किया और पंत-काव्य पर पड़े बाह्य प्रभावों की व्याख्या भी की। इसी विवेचन से उन्हें अपनी आलोचना के मूल्य प्राप्त हुए और उन्हीं के आधार पर उन्होंने पंत की कविताओं का मूल्यांकन किया।
उन्होंने पन्त के काव्य में ऐन्द्रियता को सौन्दर्योपासना का एक गुण माना है। यहीं से उन्होंने 'सौन्दर्य' को एक काव्य-मूल्य के रूप में अपनाया। बाद में उन्होंने रस- सिद्धान्त को अपने विवेचन का विषय बनाया और रस सिद्धान्त की पुष्टि के लिए फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धान्त को एक उपकरण के रूप में अपनाया।
डॉ० नगेन्द्र की साहित्य सम्बन्धी धारणाओं के मूल में अंग्रेज़ी साहित्य के कवियों और आलोचकों की साहित्यिक मान्यताओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है, क्योंकि वे अंग्रेज़ी साहित्य के सैद्धान्तिक और सृजनात्मक संस्कारों को आत्मसात् करके ही हिन्दी साहित्य में आए थे।
अपने इस ज्ञान का विद्वतापूर्ण उपयोग करते हुई उन्होंने हिन्दी साहित्य के अनुसंधान आधुनिक साहित्य के मूल्यांकन और साहित्यिक परम्परा के पुनराख्यान की दिशा में अभिनव प्रयोग किए और हिन्दी आलोचना को समृद्ध किया।
डॉ० नगेन्द्र मूलतः रसवादी आलोचक हैं, लेकिन उनका रसवाद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के रसवाद से भिन्न है। डॉ० नगेन्द्र ने रस की मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। आचार्य शुक्ल ने लोकहृदय में लीन होने की दशा को ही रसदशा माना था और रसानुभूति को प्रत्यक्ष अनुभूति से पृथक् किसी तरह की अन्तर्वृत्ति मानने से इन्कार किया था।
डॉ० नगेन्द्र के रस की गति लोक के व्यापक सन्दर्भ में न होकर आत्माभिव्यक्ति या सौन्दर्य- संवेदन मात्र में ही है। वे काव्य में रस को ही अन्तिम मूल्य मानते हैं। वे रस के अतिरिक्त अन्य सभी मानों को साहित्य के लिए अहितकर मानते हैं। उनके अनुसार रस से बाहर काव्य की कोई गति और सार्थकता नहीं है। अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'रस सिद्धान्त' में रस की गरिमा स्थापित करते हुए उन्होंने लिखा है कि "जीवन की भूमिका में जब तक मानवता से महत्तर सत्य का आविर्भाव नहीं होता और साहित्य की भूमिका में जब तक मानव संवेदना से अधिक रमणीय सत्य 'उद्भावना नहीं होती तब तक रस सिद्धान्त से अधिक प्रामाणिक सिद्धान्त की प्रकल्पना भी नहीं हो सकती।"
छायावाद के मूल्यांकनमें डॉ० नगेन्द्र ने छायावाद को भक्ति आन्दोलन के बाद हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा काव्यान्दोलन कहा है । छायावाद की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा है कि "स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह ही 'छायावाद' का आधार है। स्थूल शब्द बड़ा व्यापक है, इसकी परिधि में सब प्रकार के बाह्य रूप-रंग आदि सन्निहित हैं और इसके प्रति विद्रोह का अर्थ है उपयोगिता के प्रति भावुकता का विद्रोह, नैतिक रूढ़ियों के प्रति मानसिक का विद्रोह और काव्य के बन्धनों के प्रति स्वच्छन्द कल्पना और टेकनीक का विद्रोह।" इतना ही नहीं छायावाद को उन्होंने एक विशेष प्रकार की भाव-पद्धति और जीवन के प्रति एक विशेष भावात्मक दृष्टिकोण भी बताया है।
डॉ॰ नगेन्द्र ने भारतीय और पाश्चात्य काव्य सिद्धान्तों का समन्वय करते हुए कवि और सहृदय दोनों को केन्द्र में रखकर अपने काव्य-बोध का निर्माण किया है। उन पर पाश्चात्य अवधारणाओं का बहुत गहरा प्रभाव था, परन्तु उन्होंने इन अवधारणाओं को भारतीय जीवन-मूल्यों के आलोक में व्याख्यायित करके ही उनका अपनी आलोचना में उपयोग किया है।
यद्यपि उन्होंने व्यावहारिक आलोचना के ग्रन्थ भी लिखे हैं, लेकिन उनकी आलोचना की मुख्य दिशा सैद्धान्तिक विवेचन की ही थी। उनकी व्यावहारिक आलोचना में भी पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तों और भारतीय काव्यशास्त्र, विशेष रूप से रस- सिद्धान्त की व्याख्या पुनर्व्याख्या उनके विवेचन में व्याप्त रहीं है ।
सैद्धान्तिक समीक्षा के क्षेत्र में उन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की है जो पारम्परिक और शास्त्रीय साहित्य-सिद्धान्तों को समझने और उनके आलोक में आधुनिक रचनाशीलता को परखने की दृष्टि से हिन्दी साहित्य के आधारभूत ग्रन्थ हैं। इनमें 'रीतिकाव्य की भूमिका', 'भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका', 'रस सिद्धान्त' और 'भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका' आदि बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। डॉ० नगेन्द्र संस्कृत के आचार्यों में भट्टनायक और अभिनवगुप्त और हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से विशेष रूप से प्रभावित हुए।
पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों के प्रस्तोता और व्याख्याता के रूप में भी डॉ० नगेन्द्र का योगदान विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने न केवल पाश्चात्य चिन्तकों के विचारों को हिन्दी में प्रस्तुत किया,
बल्कि अपने विवेचन में उनका भरपूर उपयोग किया है। 'शैली विज्ञान', पाश्चात्य समीक्षाशास्त्र सिद्धान्त और परिदृश्य' तथा 'नयी समीक्षा, नये सन्दर्भ' आदि ग्रन्थों के माध्यम से उन्होंने हिन्दी के पाठकों और आलोचकों को ऐसे अनेक प्रतिमानों और साहित्यिक उपकरणों से परिचित करवाया जो हिन्दी की रचनाशीलता को व्यापक दृष्टि से परखने और समझने में सहायक हुए हैं। पाश्चात्य चिन्तकों में आई. ए. रिचर्डस, सिग्मंड फ्रायड और बेनेडिटो क्रोचे ने उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया। डॉ० नगेन्द्र अपने समकालीन साहित्य-सिद्धान्तों और साहित्यिक प्रवृत्तियों के प्रति जागरूक रहते थे और अपनी आलोचना में उनका उपयोग करने में भी संकोच नहीं करते थे। उनकी आलोचना में सौन्दर्यशास्त्र, शैली विज्ञान और मनोविज्ञान के सिद्धान्तों से बहुत सहायता ली गई है।
डॉ० नगेन्द्र की आलोचना में उनका व्यक्तिवादी दृष्टिकोण सदैव विद्यमान रहा है। उन्होंने आत्माभिव्यक्ति को कविता के लिए महत्त्वपूर्ण माना है - "आत्माभिव्यक्ति ही वह मूल तत्त्व है जिसके कारण कोई व्यक्ति साहित्यकार और उसकी कृति साहित्य बन पाती है।" उनमें सामाजिक सन्दर्भों और साहित्येतर मानदण्डों के प्रति कोई आग्रह या रुचि नहीं दिखाई देती है। सौन्दर्य और आनन्द को श्रेष्ठ काव्य-मूल्य मानते हुए उन्होंने रीतिकाव्य की प्रतिष्ठा स्थापित की। रीतिकाव्य की दुर्बलताओं को जानते हुए भी उन्होंने लिखा है कि "रीतिकाव्य सामाजिक चेतना की दृष्टि से कमज़ोर है, उसकी काव्यवस्तु भी एक सीमित क्षेत्र से बाहर व्यापक संसार में किसी रुचि का प्रमाण नहीं देती लेकिन कवियों की निश्छल आत्माभिव्यक्ति द्वारा जिस परिष्कृत आनन्द की सृष्टि यह काव्य करता है उसकी उपेक्षा करना गलत है। नैतिक और सामाजिक मूल्य से अलग इस आनन्द का भी अपना एक मूल्य है।"
व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में 'सुमित्रानन्दन पंत', 'आधुनिक हिन्दी नाटक', 'साकेत एक अध्ययन', 'कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ', 'देव और उनकी कविता', 'आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ' आदि उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियाँ हैं। इसके अतिरिक्त डॉ० नगेन्द्र ने तुलसी, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, दिनकर, बच्चन तथा कुछ प्रगतिशील एवं प्रयोगवादी कवियों का विवेचन भी किया है। अपनी आलोचना के लिए उन्होंने या तो उन विषयों और कृतियों को चुना जो प्रतिष्ठित हो चुकी थीं या जिनमें स्वयं उन्हें साहित्य के स्थायी मूल्य दृष्टिगत हुए। साहित्यिक रचनाओं के शिल्प का विवेचन उन्होंने अपनी रसवादी दृष्टि के आलोक में कुशलतापूर्वक किया है।
यद्यपि डॉ० नगेन्द्र ने कुछ प्राचीन कवियों और कुछ आधुनिक गद्य विधाओं की कृतियों को भी अपनी आलोचना का विषय बनाया है, लेकिन मूल रूप से वे आधुनिक काव्य के आलोचक हैं। 'रस', 'सौन्दर्य' और 'आनन्द' की आत्मनिष्ठ उपलब्धि डॉ० नगेन्द्र की काव्य-दृष्टि का मुख्य लक्ष्य है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की साहित्य समीक्षा का आधार मानवतावाद है। वे मनुष्य को साहित्य का केन्द्र और अन्तिम लक्ष्य मानते हैं- "मनुष्य ही मुख्य है बाकी सब बातें गौण हैं।
अलंकार, छन्द, रस का अध्ययन इस मनुष्य को समझने का ही साधन है, ये अपने आप में कोई स्वतन्त्र चरम मान नहीं हैं। मनुष्य को - अर्थात् पशु- सुलभ वासनाओं से ऊपर उठाने के लिए प्रयत्नशील उस प्राणी को जो त्याग, प्रेम, संयम और श्रद्धा की छीना- झपटी, मारा-मारी, लोलुपता और घृणा द्वेष से बड़ा है उसके लक्ष्य की ओर ले जाना ही साहित्य का मुख्य उद्देश्य है।" अतः द्विवेदी जी के लिए मानव समाज और मानव-जीवन सत्य है और मानवीय मूल्य सर्वोपरि। वे साहित्य का सम्बन्ध मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से मानते हैं। उन्होंने साहित्य में जीवन की समग्र अभिव्यक्ति को आवश्यक बताते हुए लिखा है- "आज जनता की दुर्दशा को यदि आप सचमुच ही उखाड़ फेंकना चाहते हैं तो आप चाहे जो भी मार्ग लें,
राजनीति से अलग होकर नहीं रह सकते, अर्थनीति की उपेक्षा नहीं कर सकते और विज्ञान की नयी प्रवृत्तियों से अपरिचित रह कर कुछ नहीं कर सकते। साहित्य केवल बुद्धि-विलास नहीं है। वह जीवन की उपेक्षा करके जीवित नहीं रह सकता।" अपने मानवतावाद सम्बन्धी विचारों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है कि "सामाजिक मानवतावाद ही उत्तम समाधान है। मनुष्य को व्यक्ति मनुष्य को नहीं, बल्कि समष्टि मनुष्य को, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक शोषण से मुक्त करना होगा। "
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने मानवतावाद के साथ-साथ हिन्दी में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आलोचना की शुरूआत भी की।
उनके अनुसार साहित्य में किसी कृति और कृतिकार के महत्त्व को निरूपित करने के लिए सामाजिक, सांकृतिक और जातीय परम्परा के प्रवाह को दृष्टिगत रखना आवश्यक होता है। इसलिए आवश्यक है कि साहित्य के आलोचक को अपनी सांस्कृतिक और जातीय परम्परा का ज्ञान और समझ हो । उन्होंने हिन्दी साहित्य के स्वरूप और विकास को भली-भाँति समझने के लिए संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश आदि भाषाओं के साहित्य का ज्ञान आवश्यक माना तथा उसी सन्दर्भ में हिन्दी साहित्य की व्याख्या करते हुए इस परम्परा से हिन्दी के सम्बन्ध को रेखांकित किया। 'हिन्दी साहित्य की भूमिका', हिन्दी साहित्य का आदिकाल', 'नाथ सम्प्रदाय', 'कालीदास की लालित्य योजना', मध्यकालीन बोध का स्वरूप' और 'कबीर' आदि ग्रन्थों में द्विवेदी जी का यह दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना के विभिन्न आयामों के बारे में आप इस पाठ्यचर्या के खण्ड 2 की इकाई 3 में अधिक विस्तार से पढ़ेंगे।
डॉ. देवराज
शुक्लोत्तर युग में जहाँ आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ० नगेन्द्र से किसी न किसी रूप में शुक्ल जी के विचारों से टकराते हुए, उनसे सहमत असहमत होते हुए साहित्य का मूल्यांकन और सिद्धान्त प्रतिपादन किया, वहीं डॉ. देवराज ने शुक्ल जी के छायावाद सम्बन्धी दृष्टिकोण को पुष्ट करते हुए 'छायावाद का पतन' नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उन्होंने छायावादी काव्य की कमियों का निदर्शन किया है । यद्यपि स्वयं छायावादी कवि इस पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही भावुकता और कल्पनाशीलता को त्याग चुके थे, ऐसे में चौकाने वाला शीर्षक होने के बाद भी यह पुस्तक हिन्दी आलोचना के विकास में कुछ विशेष नहीं जोड़ती।
यह शुक्ल जी के विचारों को याद करने जैसा ही प्रयास था। इतना अवश्य है कि छायावादी कविता के विवेचन के सम्बन्ध में 'केन्द्रापगामी प्रवृत्ति' और 'अर्धभुक्त मनोदशाएँ' जैसे पारिभाषिक शब्द उनके अपने हैं। उन्होंने शब्द-मोह, चित्र-मोह और कल्पना-मोह जैसी छायावादी काव्य की मुख्य विशेषताओं को ही उसकी कमियाँ और उस काव्यधारा के पतन का कारण बताकर अपने विवेचन की एकांगिकता तथा साहित्यिक विकास की मूल शक्तियों को न पहचान पाने का ही संकेत दिया है।
डॉ. देवराज का साहित्य-चिन्तन उनके व्यापक सांस्कृतिक चिन्तन का हिस्सा है। साहित्य को देखने- परखने में सांस्कृतिक आभिजात्य का आग्रह उनके विचारों में सदैव विद्यमान रहता है और 'क्लासिक्स' के प्रति उनके विशेष उत्साह का कारण भी उनका यही दृष्टिकोण है।
वे कट्टर सिद्धान्तवादिता से बचते हुए व्यक्तिवादी और समाजवादी चिन्तन पद्धतियों में सन्तुलन बनाकर चलते हैं।
हिन्दी आलोचना का स्तर ऊँचा उठाने की चिन्ता डॉ. देवराज में बराबर देखने को मिलती है, लेकिन स्वयं उनकी आलोचना में साहित्य को व्यापक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सन्दर्भों में देखने के उत्साह के बावजूद आलोचकीय चिन्तन की गहराई और मौलिक प्रतिभासम्पन्न दृष्टि नहीं मिलती है। वे मूलतः रस-संस्थान के आलोचक हैं और उनकी दृष्टि में आलोचक का मुख्य कार्य रसानुभूति की बौद्धिक व्याख्या करना है । उनकी परवर्ती आलोचना में उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बोध के साथ उनकी सहृदयता का उपयुक्त समन्वय दिखाई देता है । उन्होंने साहित्य में विषय-वस्तु और अर्थ सन्दर्भों के महत्त्व पर बल दिया है, इससे उनकी आलोचना सशक्त हुई है।
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