आलोचना के मुख्य भेद - Main differences of criticism
आलोचना मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है सैद्धान्तिक आलोचना और व्यावहारिक आलोचना । पाश्चात्य साहित्यिक चिन्तन में आलोचना के मुख्यतः दो भेद किए जाते हैं आभ्यन्तरिक (Intrinsic) आलोचना और बाह्य (Extrinsic) आलोचना ।
सैद्धान्तिक आलोचना
सैद्धान्तिक आलोचना में युगीन साहित्य और परिस्थितियों के आधार पर साहित्य सम्बन्धी सामान्य सिद्धान्तों की स्थापना की जाती है। इसमें साहित्यिक मूल्य निर्धारित किए जाते हैं और साहित्य की विभिन्न विधाओं के स्वरूप का विवेचन भी किया जाता है।
सैद्धान्तिक आलोचना में किसी रचना की पहचान और विश्लेषण के लिए लागू किए जाने वाले सामान्य नियम और विशेष शब्दावली के साथ-साथ मानक या प्रतिमान भी होते हैं जिनके आधार पर किसी रचना का मूल्यांकन किया जाता है।
व्यावहारिक आलोचना
साहित्यिक रचनाओं के विश्लेषण और मूल्यांकन के वास्तविक कार्य को व्यावहारिक आलोचना कहा जाता है। इस प्रकार की आलोचना में प्रायः निर्धारित सिद्धान्तों के आधार पर साहित्य की समीक्षा की जाती है। और कभी-कभी समीक्षा-प्रक्रिया में ही सिद्धान्तों की उपलब्धि हो जाती है।
व्यावहारिक आलोचना विशेष रचनाओं और लेखकों से सम्बन्धित होती है। इसके अन्तर्गत रचना या रचनाकर के विश्लेषण, व्याख्या और मूल्यांकन की विधि को नियन्त्रित करने वाले सैद्धान्तिक नियम या निकष प्रायः अव्यक्त रहते हैं या उनका ज़िक्र तभी होता है जब ऐसा करना रचना और रचनाकार को समझने की दृष्टि से आवश्यक हो ।
आभ्यन्तरिक (Intrinsic) आलोचना
आभ्यन्तरिक आलोचना के अन्तर्गत साहित्य के आन्तरिक नियमों के आधार पर उसका विश्लेषण और मूल्यांकन किया जाता है। इसमें कृति के रूप और संरचना की विवेचना की जाती है।
रचना की भाषा और शैली पर विशेष ध्यान दिया जाता है। संरचनावादी, रूपवादी और शैलीवैज्ञानिक आदि आलोचना पद्धतियाँ 'आभ्यन्तरिक आलोचना' के अन्तर्गत आती हैं।
बाह्य (Extrinsic) आलोचना
बाह्य आलोचना साहित्येतर उपकरणों और ज्ञान पर आधारित होती है। इसमें विषयवस्तु, जीवन-दृष्टि और विचारों पर ध्यान केन्द्रित रहता है। मनोविश्लेषणवादी, स्वच्छन्दतावादी, मार्क्सवादी और अस्तित्ववादी आदि आलोचना पद्धतियाँ 'बाह्य आलोचना' की श्रेणी में आती हैं।
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