भारतेन्दु-युग के प्रमुख आलोचक - Major critics of Bharatendu-era
भारतेन्दु युग में मुख्यतः पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक ही साहित्य के आलोचक के रूप में सामने आते हैं। इनमें स्वयं भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, पण्डित बालकृष्ण भट्ट और पण्डित बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' प्रमुख हैं।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को हुआ था । भारतेन्दु द्वारा सम्पादित पत्रिका 'कविवचनसुधा' का प्रकाशन सन् 1868 ई. में प्रारम्भ हुआ था। 'कविवचनसुधा' के प्रकाशन से ही भारतेन्दु युग का उदय माना जाता है। भारतेन्दु एक कवि, नाटककार, अभिनेता और पत्रकार थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में बदलते समय की सामाजिक और राष्ट्रीय आवश्यकताओं को अभिव्यक्त किया है।
अपने प्रसिद्ध निबन्ध 'नाटक या दृश्यकाव्य' (1883) में युगानुरूप नाट्य-लेखन का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए उन्होंने लिखा है- "जिस समय में जैसे सहृदय जन्म ग्रहण करें और देशीय रीति-नीति का प्रवाह जिस रूप से चलता रहे, उस समय में उक्त सहृदयगण के अन्तःकरण की वृत्ति और सामाजिक रीति-पद्धति इन दोनों की समीचीन समालोचना करके नाटकादि दृश्यकाव्य प्रणयन करना योग्य है। ... अब नाटकादि दृश्यकाव्य में अस्वाभाविक सामग्री परिपोषक काव्य सहृदय मण्डली को नितान्त अरुचिकर है, इसलिए स्वाभाविक रचना ही इस काल के सभ्यगण की हृदयग्राहिणी है, इससे अब अलौकिक विषय का आश्रय करके नाटकादि दृश्यकाव्य प्रणयन करना उचित नहीं है।"
इस निबन्ध में भारतेन्दु ने हिन्दी में किस प्रकार के नाटकों की आवश्यकता है तथा उनके लेखन में किन- किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए आदि विषयों का विस्तार से उल्लेख किया है। इस उद्देश्य से नाटक की परिभाषा एवं अर्थ, रंगमंच की साज-सज्जा, पात्रों की वेषभूषा, नाटक का इतिहास, नाटक रचना प्रणाली आदि के वर्णन के साथ-साथ वे नाटक के भेदों उपभेदों की चर्चा भी करते हैं। भारतेन्दु ने समसामयिक जनरुचि के अनुसार नाट्य लेखन करने की आवश्यकता बताते हुए प्राचीन नाट्यशास्त्र के महत्त्व को भी रेखांकित किया है। आलोचना का प्रथम प्रयास होते हुए भी इस निबन्ध में संस्कृत और भाषा (हिन्दी) के नाटकों के साथ-साथ यूरोपीय नाटकों
को भी भारतेन्दु ने अपने चिन्तन का विषय बनाया है तथा पारम्परिक और आधुनिक दृष्टियों के समन्वय का प्रयास किया है । भारतेन्दु अपने लेखन में आवश्यकता होने पर व्यंग्यपूर्ण भाषा-शैली भी अपनाते हैं। इसी निबन्ध में संस्कृत वाक्यों के हिन्दी अनुवाद की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं- "धन्य अनुवादकर्त्ता ! और धन्य गवर्नमेंट जिसने पढ़ने वालों की बुद्धि का सत्यानाश करने को अनेक द्रव्य का श्राद्ध करके इसको छापा !!!" डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि "इस तरह भारतेन्दु ने आलोचना में ऐतिहासिक दृष्टिकोण और सोद्देश्य साहित्य- रचना के सिद्धान्त ही प्रतिपादित नहीं किए, उन्होंने निर्भीक और व्यंग्यपूर्ण आलोचना की परिपाटी भी चलाई। "
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र युगीन आवश्यकताओं के अनुरूप ही साहित्य-सृजन की आवश्यकता पर बल देते थे। उन्होंने साहित्य के लिए समाज-निरपेक्ष दृष्टि के स्थान पर वास्तविक सामाजिक आवश्यकताओं को काव्य का विषय बनाने का आग्रह किया। स्वाभाविक रचना को समाज के लिए आवश्यक और महत्त्वपूर्ण मानने के कारण ही भारतेन्दु ने 'समाज संस्कार' और 'देशवत्सलता' को नाटकों का मुख्य उद्देश्य माना है और साहित्य तथा समाज के मध्य सम्बन्धों की अनिवार्यता पर बल दिया है।
पण्डित बालकृष्ण भट्ट
पण्डित बालकृष्ण भट्ट भारतेन्दु-युग के शीर्ष निबन्धकार थे। उन्होंने नाटककार, उपन्यासकार, सम्पादक और अनुवादक के रूप में भी हिन्दी की सेवा की और उसे समृद्ध बनाने में योगदान दिया ।
उन्होंने 'हिन्दी प्रदीप' नामक पत्र निकाला और उसमें अपने पाठकों को अन्धविश्वासों से दूर रहकर तार्किक ढंग से सोचने और व्यवहार करने के लिए प्रेरित किया। विभिन्न विषयों पर लिखे उनके लेख और टिप्पणियाँ आधुनिक चिन्तन और युग-बोध से परिपूर्ण हैं।
हिन्दी में कृति के सम्पूर्ण गुण-दोष विवेचन पर आधारित आलोचना की नींव भट्ट जी ने ही रखी। अपने निबन्ध 'साहित्य जन-समूह के हृदय का विकास है' ('हिन्दी प्रदीप', जुलाई 1881) में लिखा है कि "साहित्य जिस देश के जो मनुष्य हैं, उस जाति की मानवी सृष्टि के हृदय का आदर्श रूप है। जो जाति जिस समय जिस भाव से परिपूर्ण या परिलुप्त रहती है,
वह सब उनके भाव उस समय की साहित्य समालोचना से अच्छी तरह प्रकट हो सकते हैं।... किसी देश का इतिहास पढ़ने से केवल बाहरी हाल हम उस देश का जान सकते हैं, पर साहित्य के अनुशीलन से कौम के सब समय-समय के आभ्यन्तरिक भाव हमें परिस्फुट हो सकते है।" पण्डित बालकृष्ण भट्ट का यह कथन जनसामान्य और साहित्य के अन्तरसम्बन्धों को उद्घाटित करता है और आलोचक के लिए दिशा- निर्देश प्रस्तुत करता है ।
भट्ट जी उच्चवर्गीय काव्य-संस्कारों को कृत्रिम मानते थे और उनके स्थान पर मल्लाहों के गीत, कहारों का कहरवा, विरह और आल्हा जैसे ग्राम्य काव्य रूपों को सच्चा काव्य कहते थे ।
'हिन्दी प्रदीप' (अक्टूबर 1886) में लिखे 'सच्ची कविता' शीर्षक अपने निबन्ध में भट्ट जी ने ग्राम्य कविता पर टिप्पणी की है कि "... उनमें चित्त की एक सच्ची और वास्तविक भावना की तस्वीर खिची हुई पाई जाती है और आपकी क्लासिक उत्तम श्रेणी की भाषा कविता का जहर इसमें कहीं नहीं पाया जाता जो यहाँ तक कृत्रिमतापूर्ण रहती है कि उसके जोड़ की एक निराली दुनिया केवल कवि जी के मस्तिष्क मात्र में ही स्थान पाये हुए है।"
लाला श्रीनिवासदास द्वारा लिखित नाटक 'संयोगिता स्वयंवर की समीक्षा भट्ट जी ने अपने पत्र 'हिन्दी प्रदीप' में 'सच्ची समालोचना' शीर्षक से की थी।
इसमें पहले तो इस नाटक को लेखक द्वारा 'ऐतिहासिक' घोषित करने पर आपत्ति करते हुए भट्ट जी ने स्पष्ट किया कि यह ऐतिहासिक व्यक्तियों के नामों के आधार पर लिखा गया एक क़िस्सा है, कोई ऐतिहासिक नाटक नहीं। इसमें लेखक के इतिहास-बोध का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। अपनी आलोचना में भट्ट जी ने इस कृति की कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन आदि विभिन्न अंशों की समीक्षा की और उन पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। कथावस्तु को अनैतिहासिक बताने के बाद भट्ट जी ने दिखाया है कि उसके पात्रों का कोई चारित्रिक वैशिष्ट्य नाटक में सामने नहीं आ पाया है। कथोपकथन आलंकारिक और उपदेशात्मक होने के कारण अस्वाभाविक लगते हैं जिससे पात्रों की भाषा नीरस हो गई है।
भट्ट जी ने अपनी समीक्षा में यह दिखाने का प्रयास किया है कि नाटक में पात्रों का व्यक्तित्व जीवन्त और उनकी भाषा स्वाभाविक होनी चाहिए तथा इतिहास-बोध के अभाव में ऐतिहासिक कथानकों के आधार पर कोई नाटक या कृति नहीं लिखी जा सकती। भट्ट जी के इन विचारों में आलोचना की आधुनिक दृष्टि विद्यमान है। 'संयोगिता स्वयंवर' नाटक के अलावा भट्ट जी ने 'हिन्दी प्रदीप' में 'भारत दुर्दशा', 'नील देवी', 'रणधीर प्रेममोहिनी' आदि नाटकों की समीक्षाएँ भी लिखी थीं।
भट्ट जी ने नाटकों के साथ-साथ मौलिक और अनूदित उपन्यासों की समीक्षा भी 'हिन्दी प्रदीप' में की थी । उपन्यास के स्वरूप को विस्तार से समझाने के लिए उन्होंने 'उपन्यास' शीर्षक से एक निबन्ध भी लिखा था।
लाला श्रीनिवासदास के उपन्यास 'परीक्षागुरु' की समीक्षा करते हुए उन्होंने जहाँ इसके कथानक और भाषा की प्रशंसा की है वहीं उसकी उपदेशात्मकता की आलोचना भी की है। भट्ट जी ने रमेशचन्द्र दत्त लिखित बांग्ला उपन्यास के हिन्दी अनुवाद 'बंग विजेता (बाबू गदाधर सिंह द्वारा अनूदिते और गोपालराम गहमरी कृत उपन्यास 'देवरानी जेठानी' की समीक्षाएँ भी 'हिन्दी प्रदीप' में की थी।
उपाध्याय पण्डित बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'
भारतेन्दु-युग के प्रमुख साहित्यिक पत्रों में पुस्तकसमीक्षाएँ प्रकाशित होती थीं। इन पुस्तक-समीक्षाओं से ही हिन्दी आलोचना का आरम्भ हुआ था।
पण्डित बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने इन समीक्षाओं की उपयोगिता और आवश्यकता के सम्बन्ध में लिखा है कि "रिव्यू अर्थात् समालोचना का अर्थ है पक्षपात रहित होकर न्यायपूर्वक किसी पुस्तक के यथार्थ गुणदोष की विवेचना करना और उससे ग्रन्थकर्त्ता को विज्ञप्ति देना क्योंकि रचित ग्रन्थ के गुणों की प्रशंसा कर रचयिता के उत्साह को बढ़ाना एवम् दोषों को दिखलाकर उसके सुधार का यत्न बताना कुछ न्यून उपकार का विषय नहीं है।" 'प्रेमघन' के इस कथन से स्पष्ट है कि वे आलोचना के स्वरूप को लेकर बहुत गम्भीर थे।
सच्ची आलोचना की विशेषताएं बताते हुए उन्होंने लिखा है कि "सच्ची आलोचना एक स्वच्छ दर्पण तुल्य है कि जो शृंगार की सजावट को दिखाता, और उसके दोषों तथा साहित्य की दुष्टाकृति को बतलाता है। यह एक ऐसी कसौटी है कि जिस पर वर्ण सुवर्ण का खरा और खोटापन झलता है, यह वह दीपक है कि जिसकी सहायता से अँधेरी कोठरी में धरे अच्छे और निकृष्ट दोनों पदार्थ देख पड़ते अथवा वह उपनेत्र (चश्मा) है कि जिसके द्वारा अति सूक्ष्म पदार्थ हीन दृष्टिवाले जन को भी सहज में सुझाई पड़े।" यहाँ कृति के गुण-दोष विवेचन और मूल्यां कनकी पद्धति का स्पष्ट निर्देश है।
चौधरी 'प्रेमघन' ने भी बालकृष्ण भट्ट के बाद 'आनन्द कादम्बिनी' में लाला श्रीनिवासदास कृत नाटक 'संयोगिता स्वयंवर की समीक्षा लिखी थी।
'संयोगिता स्वयंवर नाटक' शीर्षक से लिखी गई इस समीक्षा में 'प्रेमघन' ने नाटक की कथावस्तु, रस और नाटक के प्रबन्ध के सम्बन्ध में अपने विचार अभिव्यक्त किए हैं। 'प्रेमघन' का ध्यान नाटक के कथोपकथन, छन्द-प्रयोग और दृश्य-विधान में आए दोषों के सूक्ष्म विवेचन पर रहा है और यथास्थान दोषों को सुधारने के तरीके भी बताए हैं। इसके साथ-साथ उन्होंने इस नाटक के सम्पूर्ण स्वरूप को भी ध्यान में रखकर उसका मूल्यांकन किया है। 'प्रेमघन' ने बाणभट्ट की कादम्बरी पर 'आनन्द कादम्बिनी' में एक लेख लिखा और उसकी प्रशंसा की। पण्डित बालकृष्ण भट्ट के उपन्यास 'नूतन ब्रह्मचारी' और बाबू गदाधर सिंह द्वारा रमेशचन्द्र दत्त लिखित बांग्ला उपन्यास के हिन्दी अनुवाद 'बंग विजेता' की समीक्षा 'प्रेमघन' ने अपने पत्र 'आनन्द कादम्बिनी' में की थी।
वार्तालाप में शामिल हों