डॉ. रामविलास शर्मा का मार्क्सवाद और साहित्य - Marxism and Literature of Dr. Ram Vilas Sharma
डॉ. रामविलास शर्मा के साहित्य-चिन्तन का आधार मार्क्सवादी जीवन-दर्शन है। उन्होंने मार्क्सवाद को एक सजीव और विकासमान विज्ञान के रूप में देखा-समझा है। मार्क्सवाद की मुख्य मान्यता है कि समाज के भौतिक जीवन में उत्पादन की पद्धति के अनुसार ही सामाजिक, राजनैतिक और मानसिक जीवन का स्वरूप निर्धारित होता है। मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व का निर्माण नहीं करती, इसके विपरीत उसका सामाजिक अस्तित्व ही उसकी चेतना का निर्माण करता है। विकास की एक अवस्था तक पहुँच कर उत्पादन के सम्बन्धों में परिवर्तन होता है और भौतिक शक्तियों में संघर्ष होता है। समाज के आधार, आर्थिक आधार में परिवर्तन होता है ।
तब सामाजिक क्रान्ति का युग आरम्भ होता है और आर्थिक आधार के बदलने पर समाज का ऊपरी ढाँचा भी बदल जाता है।
डॉ. शर्मा मार्क्सवादी सामाजिक सिद्धान्त की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि मार्क्स की विश्लेषण-पद्धति पर ध्यान देने की आवश्यकता है, उनकी हर मान्यता को अपरिवर्तनशील मानकर चलना ज़रूरी नहीं है। यह सही है कि संस्कृति का विशाल महल समाज की आर्थिक व्यवस्था के आधार पर निर्मित होता है, लेकिन आर्थिक आधार का एकदम सीधा प्रतिबिम्ब समाज के ऊपरी ढाँचे अर्थात् साहित्य, कला, संस्कृति आदि पर नहीं पड़ता है।
समाज और साहित्य के पारस्परिक सम्बन्धों की द्वन्द्वात्मक व्याख्या करते हुए डॉ. शर्मा बताते हैं कि यद्यपि साहित्य आर्थिक परिस्थितियों से नियमित होता है लेकिन वह उनका सीधा प्रतिबिम्ब नहीं है। साहित्य की अपनी सापेक्ष स्वाधीनता है । सापेक्ष स्वाधीनता का सिद्धान्त मनुष्य के इन्द्रियबोध और उसकी सौन्दर्यवृत्ति की बहुत सही व्याख्या करता है। डॉ. शर्मा के अनुसार यह समझना कि समाज व्यवस्था बदलने के साथ मनुष्य का इन्द्रियबोध भी मूलतः बदल जाता है, एक निराधार कल्पना है। मनुष्य की चेतना में सबसे व्यापक स्तर उसके इन्द्रियबोध का है। मनुष्य के विचार और भाव बदल जाते हैं लेकिन उसका इन्द्रियबोध अपेक्षाकृत स्थायी रहता है।
मार्क्सवाद से प्रेरित साहित्य पर यह आक्षेप किया जाता है कि वह रचना के कलात्मक पक्ष की उपेक्षा करता है। डॉ० शर्मा साहित्य के सामाजिक पक्ष के साथ-साथ उसके कलात्मक पक्ष को भी महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार मार्क्सवाद उन लोगों का विरोध करता है जो कला को सामाजिक पक्ष से अलग करके देखते हैं। लेकिन "कलात्मक सौष्ठव के साथ-साथ उस साहित्य में व्यक्ति और समाज के विकास और प्रगति में सहायक होने की क्षमता होनी चाहिए। तभी वह अभिनन्दनीय हो सकता है।" (- 'प्रगति और परम्परा')
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