मार्क्सवादी आलोचना - marxist criticism

मार्क्सवाद के सिद्धान्तों को आधार बनाकर साहित्य का विश्लेषण और मूल्यांकन करने की पद्धति मार्क्सवादी आलोचना पद्धति कहलाती है। मार्क्सवाद के अनुसार साहित्य और कलाओं की उत्पत्ति, विकास और उसके रूपों का मनुष्य के भौतिक एवं सामाजिक अस्तित्व से गहरा सम्बन्ध है। वर्ग विभाजित समाज में सामाजिक और भौतिक स्थितियों में परिवर्तन होता रहता है जिसका उन सामाजिक स्थितियों पर भी प्रभाव पड़ता है। साहित्य और कला की विषय-वस्तु, रूप और शिल्प इस अन्योन्यक्रिया के साथ परिवर्तित होते हैं। इस प्रकार परिघटनाओं के सार तक पहुँचने की दृष्टि से कला और साहित्य में यथार्थवादी चित्रण मार्क्सवादी आलोचना का मुख्य लक्ष्य है। इसमें रचना का मूल्यांकन सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में किया जाता है।


जिस समय आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेन्द्र और शान्तिप्रिय द्विवेदी आदि आलोचक छायावाद की प्रतिष्ठा में लगे हुए थे, उस समय पंत जैसे छायावादी कवि यथार्थ की ओर प्रस्थान कर रहे थे। हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना का आरम्भ 'प्रगतिशील लेखक संघ' की स्थापना के साथ हुआ। इसके पहले अधिवेशन (1936 ई.) में अध्यक्ष पद से बोलते हुए प्रेमचंद ने साहित्य के नये उद्देश्यों और प्रतिमानों की आवश्यकता पर बल दिया। शिवदानसिंह चौहान ने 'विशाल भारत' (1937 ई.) में 'भारत में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता' शीर्षक से प्रकाशित अपने लेख में 'प्रगतिशील लेखक संघ के लंदन घोषणा-पत्र के मुख्य बिन्दुओं को प्रस्तुत करते हुए हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचना की रूपरेखा प्रस्तुत की।

आरम्भिक दौर में शिवदानसिंह चौहान, प्रकाशचन्द्र गुप्त, रांगेय राघव, अमृत राय आदि ने मार्क्सवाद के सिद्धान्तों को आलोचना के मुख्य प्रतिमानों के रूप में प्रस्तुत करने और इन्हीं के आधार पर साहित्यिक रचनाओं के मूल्यांकन का प्रयास किया। इस प्रयास में कहीं- कहीं सिद्धान्त प्रदर्शन की प्रमुखता और मार्क्सवाद को यान्त्रिक रूप से साहित्यिक रचनाओं पर लागू करने के कारण मौलिक चिन्तन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा सका। आगे चलकर डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह, रमेशकुंतल मेघ, डॉ. शिवकुमार मिश्र, मैनेजर पाण्डेय आदि के आलोचनात्मक लेखन में इस आलोचना पद्धति का पूर्ण विकास हुआ।


शुक्लोत्तर युग में उपर्युक्त आलोचना पद्धतियों के अतिरिक्त शास्त्रीय समीक्षा, अनुसंधानपरक आलोचना, नयी समीक्षा, शैली वैज्ञानिक आलोचना, संरचनावादी आलोचना और समाजशास्त्रीय आलोचना आदि कई पद्धतियाँ भी हिन्दी में आई और अपनी-अपनी सैद्धान्तिक मान्यताओं के आधार पर हिन्दी साहित्य का विश्लेषण और मूल्यांकन किया।


आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जीवन परिचय


रामचन्द्र शुक्ल का जन्म संवत् 1941 की आश्विन पूर्णिमा, तदनुसार 04 अक्टूबर सन् 1884 को बस्ती ज़िले (उत्तरप्रदेश) के अगौना गाँव में हुआ था।

सन् 1888 में वे अपने पिता पण्डित चन्द्रबली शुक्ल के साथ जिला हमीरपुर के राठ नामक स्थान पर आ गए और वहीं अपनी पढ़ाई शुरू की। सन् 1892 में अपने पिता के साथ वे मिर्ज़ापुर आ गए। सन् 1901 में उन्होंने मिशन स्कूल से स्कूल फाइनल की परीक्षा उत्तीर्ण की। यहाँ उनका सम्पर्क पण्डित केदारनाथ पाठक और बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' से हुआ। यहाँ पर उन्होंने हिन्दी, उर्दू, अंग्रेज़ी और संस्कृत का गहन अध्ययन किया। उन्होंने कुछ समय के लिए मिर्ज़ापुर में नायब तहसीलदार की नौकरी भी की। यह नौकरी उन्हें पसंद नहीं आई और वे इसे छोड़कर कुछ समय के लिए मिर्ज़ापुर के मिशन स्कूल में ड्राइंग के अध्यापक बन गए।

सन् 1909-10 के लगभग वे 'हिन्दी शब्दसागर' के सम्पादन में वैतनिक सहायक नियुक्त हुए और नागरी प्रचारिणी सभा, काशी आ गए। उन्होंने कुछ समय के लिए 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का सम्पादन भी किया। कोश का कार्य पूर्ण होने पर सन् 1919 में वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक नियुक्त हुए। सन् 1937 में वे यहीं हिन्दी के विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए और इसी पद पर रहते हुए 02 फरवरी सन् 1941 को हृदयगति रुकने से उनकी मृत्यु हो गई।