व्यक्तिवाद का अर्थ और इतिहास - Meaning and history of individualism
व्यक्तिवाद व्यक्ति की स्वतन्त्रता और व्यक्तिगत आत्मनिर्भरता पर बल देने वाली जीवन-दृष्टि है। इसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट है और उसकी विशिष्टता ही महत्त्वपूर्ण है। व्यक्ति की निजता, उसकी गरिमा और उसके अन्तर्भूत मूल्य को प्रत्येक स्थिति में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। राजनैतिक स्तर पर इसका आग्रह राज्य के अधिकार को सीमित रखने, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बल देने तथा व्यक्तिगत सम्पत्ति के अधिकार को मान्यता देने जैसे पूँजीवादी विचारों के विकास में हुआ है, जो व्यक्तिवादी मुक्त बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं के मुख्य आधार हैं। इस विचारधारा के अनुसार व्यक्ति आत्म-निर्भर और स्व- हित में रुचि लेने वाला प्राणी है।
वह अपनी क्षमताओं के बल पर मुक्त विनिमय के माध्यम से सम्पत्ति का उत्पादन करता है । उसकी क्षमताएँ समाज पर निर्भर नहीं हैं। एल. टी. हॉबहाउस और टी. एच. ग्रीन जैसे पाश्चात्य चिन्तकों ने व्यक्ति को सामाजिक रूप से उत्तरदायित्वसम्पन्न और अन्य मनुष्यों के साथ सहयोगी भावनाओं से परिपूर्ण माना है।
मानव-चिन्तन के इतिहास में वैयक्तिकता के विचार ने समय-समय पर दार्शनिकों और समाजशास्त्रियों के समक्ष कई प्रश्न उपस्थित किए हैं। क्या मनुष्य को समुदाय या समाज से पूर्णतः स्वतन्त्र या आत्मनिर्भर होना चाहिए ?
यदि ऐसा हो जाता है तो क्या सामाजिक एकता पर संकट नहीं आएगा? और, व्यक्ति अलगाव और असुरक्षा का शिकार नहीं हो जाएगा ? आधुनिक व्यक्तिवाद के उदय से पूर्व यूरोप में उसकी एक लम्बी पृष्ठभूमि रही है। प्रारम्भ में व्यक्ति की आत्म-निर्भरता को स्वाभाविक और नैसर्गिक माना गया। ग्रीक सोफ़िस्टों ने इसी आधार पर अपने व्यक्तिवाद की स्थापना की थी। उन्होंने व्यक्ति और राज्य की पृथकता सिद्ध की व्यक्ति को नैसर्गिक और राज्य को कृत्रिम बताया। उनके अनुसार राज्य की शक्ति व्यक्ति के नैसर्गिक स्वार्थी के विरुद्ध है। प्लेटो (428-348 ई.पू.) तक आते-आते व्यक्तिवाद के पारम्परिक दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ।
समाज को सत्य और यथार्थ मानते हुए व्यक्ति के स्वार्थों की पूर्ति के निमित्त उसकी उत्पत्ति मानी गई। आगे चलकर इपीक्यूरियस (341-270 ई.पू.) ने व्यक्तिवाद के दो तत्त्व बताए कि प्रत्येक मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य सुख है तथा समाज और राज्य आवश्यक दोष हैं। जॉन स्टुअर्ट मिल (1806-1873 ई.) ने अपनी रचना 'ऑन लिबर्टी' में वैयक्तिकता के सिद्धान्त को सूत्रबद्ध किया है जिसमें उसने मुक्त व्यापार को व्यक्ति के आत्म-विकास की दृष्टि से व्याख्यायित किया है। उसके अनुसार वैयक्तिकता मनुष्य के अस्तित्व की पूर्व शर्त है। व्यक्ति जब वैयक्तिक स्तर पर दूसरों से भिन्न होता है तभी उसका सामाजिक महत्त्व और उपयोगिता होती है। अपने विचारों के विकास में उसने राज्य का लक्ष्य 'अधिकतम लोगों का हित साधन' बताया और व्यक्तिवाद को उपयोगितावाद में बदल दिया। एंथनी गिडेंस ने व्यक्तिवाद की नयी परिभाषा देते हुए स्वायत्त व्यक्ति को पारस्परिक निर्भरता के तहत सक्रिय एक सामाजिक प्राणी माना है।
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