आलोचना का अर्थ - meaning of criticism
सामान्यतः आलोचना शब्द का अर्थ किसी व्यक्ति या वस्तु में दोष या कमी को देखना ही माना जाता है। किसी व्यक्ति, वस्तु, रचना, नीति, सिद्धान्त में जब केवल दोष ढूंढे जाएँ, केवल उनकी कमियाँ निकाली जाएँ, तो प्रायः उसे आलोचना करना कहा जाता है। किन्तु आलोचना का यह एक अत्यन्त संकुचित अर्थ है । हिन्दी में 'आलोचना' शब्द का व्यवहार अंग्रेजी के 'क्रिटिसिज्म' शब्द के समानार्थी रूप में भी होता है। कभी-कभी संस्कृत में प्रचलित 'टीका', 'व्याख्या' और 'काव्य-शास्त्र' आदि के लिए भी आलोचना शब्द का प्रयोग किया जाता है।
हिन्दी साहित्य में प्रयुक्त आलोचना शब्द संस्कृत की 'लोच्' धातु से बना है।
'लोच्' का अर्थ होता है- देखना, निरीक्षण करना, चिन्तन करना, विचार-विमर्श करना। अतः आलोचना का अर्थ देखना और सर्वेक्षण करना अर्थात् किसी की अच्छाइयों और बुराइयों दोनों को देखना और उनका विश्लेषण करना होता है। इसीलिए किसी वस्तु व्यक्ति या कृति की सम्यक् व्याख्या, उसका विश्लेषण और मूल्यांकन आदि करना ही 'आलोचना' है। समीक्षा और समालोचना शब्दों का भी यही अर्थ है। हिन्दी में 'समालोचना' शब्द का प्रयोग भारतेन्दु युग में हुआ। 'हरिश्चन्द्र चन्द्रिका' (1873) के मुखपृष्ठ पर '.. और समालोचना संभूषिता' अंकित है। भारतेन्दु के निबन्ध 'नाटक अथवा दृश्यकाव्य' (1883) में हिन्दी में भी इस शब्द का व्यवहार हुआ है-
"इन दोनों की समीचीन समालोचना करके नाटकादि दृश्यकाव्य प्रणयन करना योग्य है।" भारतेन्दु युग में ही तत्कालीन साहित्य और साहित्यिक समस्याओं से सम्बन्धित गंगाप्रसाद अग्निहोत्री की 'समालोचना' (1896) और अम्बिकादत्त व्यास की 'गद्य-काव्य मीमांसा' आदि पुस्तिकाएँ प्रकाशित हो चुकी थीं। हिन्दी में व्यावहारिक आलोचना की वास्तविक शुरूआत बालकृष्ण भट्ट से होती है। भट्ट जी ने समालोचना के समानार्थी शब्द आलोचना का प्रयोग भी किया है।
आलोचना करने का अर्थ होता है रचना का विश्लेषण करना और फिर उसका मूल्यांकन करना ।
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आलोचना, या विशेष रूप से साहित्यिक आलोचना, किसी साहित्यिक रचना की परिभाषा, वर्गीकरण, व्याख्या और मूल्यांकन से सम्बन्धित सम्पूर्ण अध्ययन के लिए प्रयुक्त व्यापक पद है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में " किसी वस्तु या विषय के सब अंशों पर अच्छी तरह विचार करने का नाम समालोचना है।"
सारतः यह कहा जा सकता है कि यदि साहित्य जीवन और जगत् को अर्थ प्रदान करने, उसे समझने का माध्यम है तो 'साहित्यिक आलोचना' साहित्य की व्याख्या और समझ की पद्धति है।
साहित्यिक आलोचना एक साहित्यिक रचना को पाठकों के लिए बोधगम्य बनाने और स्पष्ट करने का कार्य करती है। आलोचना हमें बताती है कि कोई रचना अपने रूप और कथ्य में कैसी है? अर्थात् उसका गठन और निर्माण किस प्रकार हुआ है, उसका अर्थ और मूल्य क्या है ? आलोचना अथवा साहित्यिक आलोचना साहित्य और साहित्यिक रचनाओं से सम्बन्धित परिभाषा, वर्गीकरण, विश्लेषण, व्याख्या और मूल्यांकन से सम्बन्धित सभी तरह के अध्ययन के लिए एक व्यापक और समावेशी शब्द है।
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