चिन्तामणि के रसाभिव्यक्ति के साधन - Means of expression of Chintamani

चिन्तामणि के अनुसार सामाजिक के अन्तःकरण में वासनारूप में स्थित मनोविकार को भाव कहते हैं। ये भाव काव्य और नाटकों में वर्णित मूलनायक (रामादि) के सुख-दुख आदि के द्वारा अनुभवयोग्य बन जाते हैं। स्थायीभाव और संचारी भावों के आधारभूत मूल तत्त्व यही मनोविकार (भाव) ही हैं। आचार्य विद्यानाथ से अभिप्रेरित होकर चिन्तामणि ने रसाभिव्यक्ति के मूलतत्त्वों को स्पष्ट करते हुए 'कविकुलकल्पतरु' में लिखा है-


मन विकार कहि भाव सो करन वासना रूप। विविध ग्रन्थ करता कहत ताको रूप अनूप ॥ काव्योदित रामादि सुख दुःखाद्यनुभव जात। मन विकार संचारि जति यह थाई थिरबात ||


स्थायी भाव की विवेचना करते हुए उन्होंने यह स्वीकार किया है कि स्थायी भाव कभी नष्ट अथवा तिरस्कृत नहीं होते हैं। वे न केवल रस की स्थिति पर्यन्त वर्तमान रहते हैं, अपितु सहृदय को आनन्द भी प्रदान करते रहते हैं। उनके अनुसार स्थायी भाव की संख्या नौ है। उनके द्वारा स्थायी भाव का निरूपण इस प्रकार हुआ है-


जो नहिं जात विजाति सो होइ तिरस्कृत रूप । जब लग रसु तब लग सुथिर थाई भाव अनूप ॥

भावै ल्यावै अपने रूपहि और अखेद । जो विरुद्ध ह भावननि रहि विच्छेदक भेद हू सो थाई है समुद्र सो जब लगि रस आस्वाद । तब लगि यह वह रहत है जो थाई अविवाद |


संचारी भाव का निरूपण करते हुए चिन्तामणि का मत है कि संचारी भावों का कोई पृथक् अस्तित्व नहीं होता। संचारी भाव स्थायी भावों में ही उद्भूत और विलीन होते रहते हैं। इस प्रकार उनकी स्थिति स्थायी भावों के अनुकूल बनी रहती है संचारी भाव के स्वरूप निर्धारण में उन्होंने आचार्य विश्वनाथ और आचार्य धनंजय से सहायता ली है। आचार्य धनंजय के विचारों से अभिप्रेरित होकर वे संचारी भाव का सरल आख्यान निम्नलिखित शब्दों में प्रस्तुत करते हैं-


जे विशेष ते थाइ को अभिमुख रहै बनाइ । ते संचारि वर्णिये कहत बड़े कविराइ ॥ रहत सदा थिरभाव मै प्रगट होत इहि भाँति । ज्यों कल्लोल समुद्र में यौं संचारी जाति ॥


ग्लानि, अमर्ष, निद्रा और मोह के स्वरूप निर्धारण में चिन्तामणि पर आचार्य धनंजय का प्रभाव परिलक्षित होता है। स्मृति, लज्जा और मति के स्वरूप निर्धारण में वे आचार्य विश्वनाथ का अनुकरण करते हैं। हालाँकि, मरण, मदादि कुछेक संचारी भावों की परिभाषा में उन्होंने मौलिकता का परिचय दिया है।


विभाव और अनुभाव के स्वरूप निर्धारण में चिन्तामणि पर आचार्य विद्यानाथ और कुमारस्वामी का प्रभाव दिखाई देता है। उनके अनुसार लोक में स्थायी भाव के कारण (रामादि), काव्य-नाटक में वर्णित किए जाने पर विभाव कहलाते हैं।

कटाक्षादि रूप मधुरांग प्रदर्शन कार्यों को अनुभाव कहा जाता है। इनमें स्थायीभावों को अनायास ही प्रकट कर देने की अद्भुत क्षमता होती है। विभाव और अनुभाव को स्पष्ट करते हुए उन्होंने 'कविकुलकल्पतरु' में लिखा है-


थाइ हेतु जग मध्य जो कवित्तु मध्य सुविभाव ।


इति कारज अनुभाव गनि ए कटाक्ष है आदि । मधुर अंग ईहां कहै, सहृदय सुखद अनादि । जे पुनि थाइ भाव को प्रकट करै अनयास । ताहि कहत अनुभाव है, सब कवि बुद्धि विलास ॥


चिन्तामणि के अनुसार विभाव के दो प्रकार हैं-आलम्बन और उद्दीपन । आलम्बन विभाव के अन्तर्ग उन्होंने आचार्य विश्वनाथ के समान नायक-नायिका भेद का विवेचन प्रस्तुत किया है। हालाँकि, उद्दीपन विभाव के सन्दर्भ में उन्होंने निरूपित किया है कि- 


जे तटस्थ उन कहै है चंद बागइन आदि ।


ते उद्दीपन कहि सके है यह बात अनादि ॥


चिन्तामणि ने स्तम्भ, स्वेद आदि आठ सात्त्विक भावों की गणना की है। हालाँकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया है कि सात्त्विक भावों को अनुभाव के अन्तर्गत मानना चाहिए अथवा नहीं।


नवरस


नवरस निरूपण के सन्दर्भ में चिन्तामणि आचार्य विश्वनाथ और आचार्य विद्यानाथ दोनों का अनुकरण करते प्रतीत होते हैं। शृंगार रस का स्थायी भाव 'रति' है। संयोग और विप्रलम्भ इसके दो प्रकार हैं। संयोग शृंगार निरूपण में चिन्तामणि ने आचार्य विद्यानाथ का अनुसरण किया है, जबकि विप्रलम्भ शृंगार निरूपण में वे आचार्य विश्वनाथ का अनुकरण करते हैं। आचार्य विश्वनाथ की तरह उन्होंने भी विप्रलम्भ शृंगार के चार भेद- पूर्वराग, मान, प्रवास और करुण स्वीकार किए हैं। इसके उपरान्त वे मम्मट सम्मत विप्रलम्भ के पाँच हेतुओं- अभिलाष, विरह, ईर्ष्या, प्रवास और शाप का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।


शृंगार रस के प्रकरण में कवि आचार्य चिन्तामणि ने हाव भाव आदि सत्वज अलंकारों का भी निरूपण किया है। इस सन्दर्भ में उन्होंने आचार्य विद्यानाथ निरूपित अट्ठारह सत्वज अलंकारों की सूची प्रस्तुत करने के उपरान्त आचार्य धनंजय निरूपित बीस अलंकारों की सूची भी प्रस्तुत की है। तदनन्तर वे आचार्य विश्वनाथ निरूपित आठ अलंकारों का भी उल्लेख करते हैं।


चिन्तामणि ने शृंगारेतर अन्य आठ रसों में से अधिकतर स्थायीभावों का स्वरूप आचार्य विद्यानाथ के अनुकरण पर निर्दिष्ट किया है, और शेष निरूपण आचार्य विश्वनाथ के अनुकरण पर किया है।

इसकी वजह यह है कि आचार्य विद्यानाथ ने रत्यादि सभी स्थायीभावों से लक्षण उदाहरण प्रस्तुत करते हुए भी शृंगारेतर अन्य आठ रसों का निरूपण नहीं किया है। हालाँकि, आचार्य विश्वनाथ के प्रपितामह के अनुकरण में आचार्य चिन्तामणि ने अद्भुत रस को 'रसराज' कहा है। उनके शृंगारेतर रसों के निरूपण सम्बन्धी कतिपय उदाहरण 'कविकुलकल्पतरु' से उद्धृत हैं-


वचनादिक वैकृत निरखि होत जु चित्त विकास ।


- (हास्यरस)


अरि विरचित अपराध ते चित्त प्रजलन क्रोध ।


- (रौद्र रस)


जो लोकोत्तरकाज में थिर प्रजंत उत्साह ।


- (वीर)

रौद्र शक्ति भव चित्त की विकलता भय जानि।


- (भयानक रस)


निरखि अलौकिक वस्तु जो होत चित्त विस्तार । सो विस्मै थाई जितै सो अदभुत रस सार ॥


- (अदभुत रस)


सम कहियत वैराग्य ते निर्विकार मन होइ ।


- ( शान्त रस )


भाव, रसाभास, भावाभासादि


आचार्य विश्वनाथ के अनुसार देव, पुत्र, गुरु आदि में रति भाव, निर्वेद आदि संचारी भावों की मुख्य रूप से अभिव्यक्ति और सामग्री के अभाव में उद्बुद्ध मात्र यानी रस को अप्राप्त रत्यादि स्थायी भाव ये तीनों भाव के विषय हैं।

परन्तु आचार्य चिन्तामणि ने भाव के लक्षण में आचार्य मम्मट के अनुसार पहले दो विषयों को ही स्थान प्रदान करते हैं तथा तीसरे भाव को छोड़ देते हैं। 'कविकुलकल्पतरु' में उन्होंने लिखा है-


देव-पुत्र गुर आदि जे तिन में जो रतिभाव ।


कै संचारी व्यक्ति सो शुद्ध भाव समझाव ॥


रस और भाव का अनौचित्य रूप से प्रवर्तन रसाभास और भावाभास का विषय है। जबकि भाव की शान्ति तथा नये भाव का उदय भावशान्ति और भावोदय के विषय माने जाते हैं।

भावों की सन्धि और भावों की शबलता को क्रमशः भावसन्धि और भावशबलता कहते हैं। यही वजह है कि आचार्य चिन्तामणि इन्हें 'लक्षण- नाम- प्रकाश' समझकर इनके लक्षण प्रस्तुत नहीं करते हैं।


सारांशतः रस विषयक विपुल सामग्री का संचयन तथा संकलन और उसका व्यवस्थित और शुद्ध सम्पादन कवि आचार्य चिन्तामणि के रस-निरूपण की प्रमुख विशिष्टताएँ मानी जा सकती हैं। इसके लिए उन्होंने किसी एक ग्रन्थ का सहारा न लेकर प्रतापरुद्रयशोभूषण, काव्यप्रकाश, साहित्यदर्पण तथा दशरूपक इन चार महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों का आधार ग्रहण किया है। वैसे तो उनका रस निरूपण कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों से संकलित सामग्री पर आधारित है, फिर भी कुछेक सन्दर्भों की प्रस्तुति व विवेचन में उनकी मौलिकता उनका प्रदाय है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने हाव, भावादि सत्वज अलंकारों को अनुभाव के अन्तर्गत समाहित किया है। रस को ध्वनि का अंग मानना तथा उसे व्यंग्याश्रित घोषित करना उनके प्रौढ़ व परिपक्व आचार्यत्व का परिचायक है।