अज्ञेय की कविता में आधुनिक भावबोध - Modern feeling in the poem of Ajneya
आधुनिक भावबोध का अर्थ है आधुनिकता से पैदा हुई नयी जीवन स्थिति और नवीन मनःस्थिति तार्किकता, वैज्ञानिक चेतना, औद्योगीकरण और शहरीकरण आदि से मानव के जीवन में नयी सोच, नये विचार और नयी जीवन-शैली का आगमन हुआ। नयी जीवन स्थितियों ने मनुष्य के भावों की प्रणालियों और उनके आलम्बन को बदल दिया। इन नये विचारों, नयी मनःस्थितियों, जीवन स्थितियों और भावों की नयी प्रणालियों ने नयी अनुभूति और नये विचार को जन्म दिया। इस नयी अनुभूति और नये विचार को कविता में जगह देना ही काव्य में आधुनिक भावबोध का होना है। अज्ञेय उन विरले कवियों में हैं जिन्होंने हिन्दी कविता में आधुनिक भावबोध को लाने में नेतृत्वकारी भूमिका निभायी।
इन नयी जीवन स्थितियों को जानने-समझने और सम्प्रेषित करने के लिए उन्होंने कविता में प्रयोग करने पर बल दिया। इसके लिए आवश्यक था कि भाव और बुद्धि दोनों को कविता का आधार बनाया जाए। भाव के साथ बुद्धि को जोड़ने से नयी संवेदना का निर्माण हुआ । नयी संवेदना वाली कविता पहले से जाने हुए सत्य को व्यक्त नहीं करती है बल्कि वह कविता की सर्जना करते हुए ही सत्य का अन्वेषण करती है और इस तरह ज्ञान का एक प्रकार हो जाती है। और इसके लिए आवश्यक है कि पुरानी परिपाटी, लीक और रूढ़ियों को तोड़कर नया रास्ता बनाया जाए। उनकी कविता इस जरूरत को महसूस करती है -
एक मीन ही है जो अब नयी कहानी कह सकता है इसी एक घट में नवयुग की गंगा का जलरह सकता है संसृतियों की, संस्कृतियों की, तोड़ सभ्यता की चट्टानें नयी व्यंजना का सोता बस इसी राह से बह सकता है।
आधुनिकता ने व्यक्ति की संकल्पना को जन्म दिया। अज्ञेय इस व्यक्ति की स्वाधीनता के प्रबल पक्षधर थे। अज्ञेय की कविता में व्यक्ति की संकल्पना और व्यक्ति, समाज तथा परम्परा के आपसी रिश्ते पर खूब विचार हुआ है। वे व्यक्ति के उदय को अपने युग की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण चीज बताते हुए कहते हैं-
यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युग-संचय,
यह गोरस : जीवन कामधेनु का अमृत-पूत-पय, यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, यह प्राकृत, स्वयंभू ब्रह्म, अयुत: इसको भी शक्ति को दे दो। यह दीप, अकेला, स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।
यहाँ दीप व्यक्ति का प्रतीक है। अज्ञेय का यह व्यक्ति अकेला है, स्नेह और गर्व से भरा है तथा काल की मौना और जीवनरूपी कामधेनु का सबसे कीमती अवदान है। यद्यपि अज्ञेय का यह व्यक्ति स्वयंभू और प्राकृत है तथापि यह समाज का विरोधी नहीं है क्योंकि उसकी सार्थकता इसी बात में है कि वह समाज के लिए समर्पित हो जाये (इसको भी पंक्ति को दे दो)। अज्ञेय यह ज़रूर कहते हैं कि समाज के लिए समर्पित होने के बावजूद व्यक्ति की अपनी अद्वितीयता और अस्मिता का लोप नहीं होता है। अज्ञेय का यह व्यक्ति विद्रोही भी है। वह अपनी इयत्ता और सर्जनशीलता को अर्जित करने के क्रम में बाधा के रूप में आने वाली सामाजिक रूढ़ियों और वर्जनाओं के विरुद्ध शीतल बौद्धिक विद्रोह करता है। ध्यान रहे कि अज्ञेय के व्यक्ति का विद्रोह भावुकता से संचालित नहीं होता है।
इसीलिए उनका विद्रोह आवेग से रहित है और उसमें एक तरह का बौद्धिक संयम है। जैसे नैसर्गिक प्रेम के आग्रही अज्ञेय प्रेम में सामाजिक वर्जना के विरोधी हैं। वे मानव प्रेम पर लगे वर्जना का विरोध करते हुए किसी तरह की भावुकता नहीं दिखाते बल्कि बहुत संयम के साथ मानव के पाखण्ड का पर्दाफाश करते हैं-
खग युगल ! करो सम्पन्न प्रणय,
क्षण के जीवन में हो तन्मय । हो अखिल अवनि ही निभृत निलय । हाय तुम्हारी नैसर्गिकता ! मानव नियम निराला है - वह तो अपने ही से अपना प्रणय छिपाने वाला है !
यूँ तो अज्ञेय को रोमांटिक कवि माना जाता रहा है लेकिन उनकी कविता में शहरी जीवन और औद्योगिक सभ्यता की विसंगतियों से मुठभेड़ के भी अनेक चिह्न मौजूद हैं। वे अपनी एक कविता में साँप के माध्यम से शहरी जीवन की विसंगतियों और सभ्य लोगों की ईर्ष्या-द्वेष तथा परनिन्दा करने जैसी दुष्प्रवृत्तियों पर प्रहार करते हुए कहते हैं-
साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं-
नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया । एक बात पूछूं- (उत्तर दोगे ?) तब कैसे सीखा डँसना विष कहाँ पाया ?
अज्ञेय स्वयं भी शहर में रहने वाले इन 'साँपों' के विष के शिकार हुए थे लेकिन यहाँ वे सिर्फ़ अपना ही दुखड़ा रोने नहीं बैठे हैं बल्कि नयी सभ्यता की एक अनिवार्य बुराई की और ध्यान दिला रहे है।
इसे ही कहते हैं व्यक्ति सत्य को समष्टि सत्य में बदलना जो अज्ञेय के आधुनिक भाव बोध की एक विशेषता है। व्यक्ति की पीड़ा और अनुभूति के माध्यम से लोक कल्याण अथवा समष्टि के कल्याण की और बढ़ना अज्ञेय की कविता की खास विशेषता है।
भाषा और शिल्प
नयी जीवन स्थिति और नये वस्तुसत्य के सम्प्रेषण के लिए कविता को नयी भाषा और नये उपकरणों की आवश्यकता हुई। अज्ञेय इस ज़रूरत को समझते थे। इसीलिए उन्होंने कविता के लिए नयी भाषा, नये बिम्ब- प्रतीक और नये लय-विधान की खोज पर बल दिया।
वे अपनी एक कविता में नयी काव्यभाषा की माँग करते हुए कहते हैं-
अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता,
या शरद के भोर की नीहार - न्हायी कुई, टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या सूना है या कि मेरा प्यार मैला है।
बल्कि केवल यही ये उपमान मैले हो गए हैं। देवता इन प्रतीकों के कर गये हैं कूच ।
कविता की इस शर्त के अनुरूप अज्ञेय अपनी कविता में नये बिम्बों और प्रतीकों की खोज करते हैं। उनकी काव्यभाषा तत्सम और तद्भव के मेल से बनी है। उन्होंने दर्शन, इतिहास, पुरातत्त्व आदि अनुशासनों के अनेक शब्दों को काव्यात्मक संस्कार दिया। उनकी काव्यभाषा में कसाव और परिष्कार है। असाध्य वीणा की काव्यभाषा को भी इसके प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है। अज्ञेय की अनेक कविताएँ बोलचाल की लय से निर्मित हुई हैं। उस लय की गति धीमी है जो उनकी कविता के बौद्धिक होने और संयमित होने का प्रमाण है। लय की धीमी गति यह भी प्रमाण देती है कि उनकी कविता में एक तरह का धीरज है और वह कोरी भावुकता से बहुत छू है।
इसी संयमित लय पर अज्ञेय की कविता के शिल्प का स्थापत्य निर्मित हुआ है। अज्ञेय आधुनिक युग में कवि कर्म की कठिनता की ओर इशारा करते हुए पहली बार यह ध्यान दिलाया कि अब कविता श्रव्य से पट्य हो गई। यानी अब कविता सुनने की नहीं पढ़ने की चीज हो गई थी। और यह पहली बार हुआ कि कवि को अपने पाठक के बारे में कुछ भी पता नहीं था सम्प्रेषण की इस नयी चुनौती से निपटने के लिए कवियों ने विराम-चिह्नों का प्रयोग शुरू किया। अपनी नयी संवेदना के सम्प्रेषण के लिए नये कवि ने अंकों और आड़े-तिरछी लकीरों तथा अक्षरों के विविध आकारों का भी प्रयोग करना शुरू किया अज्ञेय की अनेक कविताएँ इस बात की प्रमाण हैं।
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