काव्य के प्रेरक उपकरण - motivational devices of poetry
काव्य के प्रेरक उपकरणों को लेकर परम्परागत चिन्तन के अन्तर्गत जो भी विमर्श सामने आए हैं, उनमें प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास को विशेष महत्त्व दिया गया है। परम्परागत काव्य- - चिन्तन में इनकी चर्चा काव्य हेतुओं के अन्तर्गत हुई हैं। अज्ञेय के काव्य-चिन्तन में परम्परागत चिन्तन की रूढ़ियों के प्रति गहरी प्रतिक्रिया का भाव सहज ही अनुभूत है। परम्परा के विषय में उनकी मूल धारणा यही रही है कि परम्परा का कवि के लिए कोई अर्थ नहीं है, जब तक वह उसे ठोक-बजाकर तोड़-मरोड़कर, देखकर आत्मसात् नहीं कर लेता। इस प्रकार अज्ञेय ने परम्परा के अन्धानुकरण का विरोध किया है; किन्तु वे परम्परा को अच्छी तरह से परीक्षण कर आत्मसात् करने के पक्ष में हैं।
अज्ञेय ने काव्य के प्रेरक उपादानों में सर्वाधिक महत्त्व व्युत्पत्ति को दिया है। 'त्रिशंकु' में वे लिखते हैं कि "कलाकार का मन एक भण्डार है जिसमें अनेक प्रकार की अनुभूतियाँ, शब्द और विचार चित्त में इकट्ठे होते रहते हैं, उस क्षण की प्रतीक्षा में, जबकि कवि प्रतिभा के ताप से एक नया रसायन, एक चामत्कारिक योग नहीं उत्पन्न हो जाएगा।" इस तरह अज्ञेय ने कवि प्रतिभा को पूरी तरह स्वीकार किया है। 'त्रिशंकु' के ही एक विशिष्ट लेख 'कला का स्वभाव और उद्देश्य' में अज्ञेय ने कला की मूल प्रेरणा सामाजिक अनुपयोगिता की अनुभूति के विरूद्ध अपने को प्रमाणित करने के प्रयत्न अर्थात् अपर्याप्तता के विरूद्ध विद्रोह में मानी है।
यहाँ अज्ञेय मुख्यतः प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एडलर से प्रभावित प्रतीत होते हैं जिसने व्यक्ति के मन की हीन भावना को अपनी इस भावना की क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में कला का कारण माना है।
अज्ञेय इस मान्यता का दृढतापूर्वक प्रतिपादन करते हैं कि प्रत्येक कला चेष्टा की जड़ में एक अपर्याप्तता की भावना काम कर रही होती है। इस सन्दर्भ में वे प्रतिभा को एक महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं, क्योंकि प्रतिभा के अभाव में उनके द्वारा कल्पित कमजोर प्राणी अपर्याप्तता की अनुभूति तथा अपने विद्रोह को कला का रूप नहीं दे पाता। अज्ञेय की इस कल्पना में प्रतिभा को अपर्याप्तता की अनुभूति के साथ जोड़ा गया है। हालांकि, इसे एक सर्वमान्य तथ्य नहीं माना जा सकता।
अज्ञेय व्युत्पत्ति की विस्तृत चर्चा करते हैं। वे काव्य या कला की सामग्री को सीमाबद्ध करने के पक्ष में नहीं हैं। वे समूचे बाह्य जगत से प्रेरणा ग्रहण करने पर बल देते हैं ऐसे सभी विषयों को वे काव्य का विषय मानते हैं जिनके साथ कवि का रागात्मक सम्बन्ध स्थापित हो सके। अज्ञेय ने पूर्ववर्ती कृतियों के अध्ययन की आवश्यकता भी जतायी है। 'त्रिशंकु' में 'रूढ़ि और मौलिकता' नामक निबन्ध में उन्होंने लिखा है कि "रूदि की साधना साहित्य के लिए वांछनीय ही नहीं, साहित्यिक प्रौढ़ता प्राप्त करने के लिए अनिवार्य भी है।" एक अन्य प्रसंग वे कहते हैं कि "जब मैं साहित्य पढ़ता हूँ तो उससे प्रेरणा भी मिलती ही हैं। जब हम किसी कलाकार की प्रतिभा के सामने झुकते हैं तो उसमें से स्वयं भी कला के प्रति निष्ठावान होने के कर्त्तव्य से प्रेरणा पाते हैं।"
किन्तु अज्ञेय अध्ययन की अपेक्षा लोकदर्शन के उपरान्त पाए गए स्वयं के अनुभवों पर अधिक बल देते हैं।
अभ्यास के महत्त्व को अज्ञेय प्रसंगवश स्वीकार करते हैं। 'शरणार्थी' कहानी-संग्रह की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि "लेखन - शिल्प का उसके लायक अभ्यास और अध्ययन मैंने किया है, किन्तु साहित्य-शिल्प में आस्था रखते हुए भी यान्त्रिक सफलता का उपासक मैं नहीं हुआ, न कभी होना चाहूँगा'। अज्ञेय की इस उक्ति में यान्त्रिकता का विरोध सहज ही परिलक्षित होता है। हालाँकि, उन्होंने उचित अभ्यास का विरोध नहीं किया है।
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