मुक्तिबोध: जीवन परिचय और काव्य-परिचय - Muktibodh: Introduction to life and introduction to poetry

साहित्यकार का जीवन-बोध उसकी रचनाओं से अभिव्यक्त होता है। मुक्तिबोध की जीवनगाथा एक ऐसे साधारण भारतीय साहित्यकार की करुण गाथा है, जो इसलिए जीया कि वह दूसरों के जीने का निमित्त बन सके, दूसरों की वेदना में निमज्जित होकर उसे व्यापक रूप दे सके। उनका जीवन पूर्णतः एक समर्पित और प्रतिबद्ध साहित्यकार का जीवन था।


जीवन-परिचय


गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवम्बर 1917 को ग्वालियर राज्य के मुरैना जिले के श्योपुर कस्बे में हुआ था। इनके पिता माधव मुक्तिबोध एक ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर थे।

माता पार्वतीबाई एक भावुक और स्वाभिमानी स्त्री थीं। इनके तीन भाई थे शरच्चन्द्र मुक्तिबोध, बसन्त मुक्तिबोध और चन्द्रकान्त मुक्तिबोध । इनमें से शरच्चन्द्र मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकार माने जाते हैं। मुक्तिबोध के पिता का तबादला होते रहने के कारण उनकी शिक्षा का सिलसिला टूटता जुड़ता रहा। सन् 1935 में माधव कॉलेज उज्जैन से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के साथ ही इन्होंने नियमित रूप से साहित्य-सृजन आरम्भ कर दिया। आगे की शिक्षा के लिए वे इन्दौर चले गए और सन् 1938 में बी.ए. में सफलता प्राप्त की। इस समय इनकी रचनाएँ छायावादी भावना से युक्त थीं और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं।


इन्दौर में मुक्तिबोध का परिचय गरीब परिवार की शान्ताबाई से हुआ और यह परिचय घनिष्ठता में परिवर्तित होने पर इन्होंने जाति-कुल, सामाजिक वैषम्य के अवरोध के उपरान्त भी 1939 में उनसे प्रेम-विवाह कर लिया। पिता के सेवानिवृत्त होने पर पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन हेतु उन्होंने बड़नगर के मिडिल स्कूल में अध्यापन कार्य आरम्भ किया। बाद में उज्जैन, कलकत्ता, इन्दौर, बम्बई, बनारस, जबलपुर आदि स्थानों पर भिन्न-भिन्न नौकरियाँ की। उन्हीं के शब्दों में-


नौकरियाँ पकड़ता और छोड़ता रहा।


शिक्षक, पत्रकार, पुनः शिक्षक, सरकारी और गैर सरकारी नौकरियाँ, निम्न मध्यम वर्गीय जीवन, बाल-बच्चे, दवा-दारू, जन्म-मौत में उलझा रहा ।


अत्यधिक लाड़-प्यार में पले मुक्तिबोध का शेष जीवन अभाव, संघर्ष और आर्थिक संकट के कारण विपन्नता में व्यतीत हुआ। लेकिन उनकी अध्ययनशीलता में कमी नहीं आई। 1962 उन्होंने अपने साहित्य से जन-आन्दोलन को उभारने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया जिसके लिए उन्हें अत्यधिक मानसिक त्रास को भोगना पड़ा। परिणामस्वरूप उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और 17 फरवरी 1964 को उन्हें पक्षाघात हो गया। लगभग 8 महीने तक मृत्यु से जूझने के बाद 11 सितम्बर 1964 को उनका निधन हो गया।


साहित्य - परिचय


गजानन माधव मुक्तिबोध ने चौथी पाँचवी कक्षा से ही काव्य-लेखन आरम्भ कर दिया था। सन् 1935 में मुक्तिबोध ने नियमित रूप से काव्य-लेखन आरम्भ किया।

उनकी रचनाएँ समय-समय पर अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती थी जिनमें से प्रमुख हैं हंस, वीणा, कर्मवीर, राष्ट्र, वाणी, कल्पना, लहर, आगामी कल, विचार, सारथी, वसुधा, प्रतीक इत्यादि। उनके जीवनकाल में उनकी केवल एक ही पुस्तक प्रकाशित हुई थी - 'कामायनी : एक पुनर्विचार', जिसमें उन्होंने प्रसाद कृत 'कामायनी' की आलोचना नये रूप में प्रस्तुत की है। मुक्तिबोध की प्रकाशित पुस्तकें इस प्रकार हैं- (i) तारसप्तक, (ii) चाँद का मुँह टेढ़ा है (काव्य-संग्रह), (iii) कामायनी : एक पुनर्विचार, (iv) नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबन्ध, (v) भारत-इतिहास और संस्कृति (पाठ्य-पुस्तक जो मध्यप्रदेश सरकार द्वारा जब्त कर ली गई), (vi) एक साहित्यिक की डायरी, (vii) काठ का सपना (कहानी-संग्रह), (viii) विपात्र (उपन्यास), (ix) सतह से उठता आदमी (कहानी-संग्रह), (x) नये साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र (निबन्ध-संग्रह) (xi) भूरी-भूरी खाक धूल (काव्य-संग्रह) (xii) मुक्तिबोध रचनावली (इसके 6 अंकों में मुक्तिबोध की समस्त प्रकाशित रचनाएँ संगृहीत हैं)। इनके अतिरिक्त भी मुक्तिबोध का बहुत-सा साहित्य आज भी अप्रकाशित पड़ा है, जिसमें निबन्ध, कहानियाँ और अनेक कविताएँ हैं।