मुक्तिबोध का जीवन-दर्शन - Muktibodh's philosophy of life
दर्शन का शाब्दिक अर्थ है, 'देखना'। मनुष्य अपने जीवनकाल में जो कुछ भी देखता भोगता है, उसके प्रभावस्वरूप उसका एक विशिष्ट दृष्टिकोण निर्मित होता है और यह दृष्टिकोण ही उसका जीवन-दर्शन कहलाता है। मुक्तिबोध का जीवन अभाव, संघर्ष और आर्थिक संकट में व्यतीत हुआ अतः अत्यधिक मानसिक त्रास भोगते हुए उनके जीवन-दर्शन का निर्माण हुआ। जीवन-दर्शन के सम्बन्ध में उनका कथन है कि- "किसी न किसी रूप में हमारे पास व्यापक जीवन-दर्शन आवश्यक है। इसमें अगर कुछ भी ना हो तब भी वे बुनियादी बातें तो हों, जिन्हें साधारण जन अपने हृदय में अनुभव करते हैं, जैसे अन्याय का प्रतिकार, मानव सभ्यता की स्थापना के प्रयत्न, विकृत स्वार्थवाद और भ्रष्टाचार का विरोध, समझौतापरस्ती के खिलाफ लड़ाई और साधारण भारतीय जनमत के प्रति भक्ति और अनुराग । "
मुक्तिबोध के काव्य का प्रारम्भ छायावादी काव्य-प्रवृतियों के आधार पर ही हुआ, किन्तु बाद में जीवन में
प्राप्त कठोर परिस्थितियों ने उन्हें एक नयी काव्य-दृष्टि प्रदान की और उनका काव्य समग्र रूप से जन सामान्य की संवेदना से स्पन्दित हो गया। समसामयिकता, अनुभव की व्यापकता, अनुभूति की सत्यता, विराट् काल्पनिकता और विचारों का अपार भण्डार उनके काव्य के अनिवार्य उपादान के रूप में दिखाई पड़ते हैं। उनके जीवन-दर्शन
को निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर समझा जा सकता है मार्क्सवाद, पूँजीवाद और शोषण- तन्त्र, सर्वहारा - वर्ग, क्रान्ति चेतना, मानवतावाद, समाजवाद ।
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