काव्य में रहस्यवाद - mysticism in poetry
कवि आलोचक जयशंकर प्रसाद के अनुसार काव्य में आत्मा की संकल्पनात्मक मूल अनुभूति की मुख्य
धारा रहस्यवाद है । भारतीय विचारधारा में रहस्यवाद को स्थान न मिलने की वजह बताते हुए वे यह स्वीकार करते हैं कि "ऐसे आलोचकों के मन में एक तरह की झुंझलाहट है। रहस्यवाद के आनन्द पथ को उनके कल्पित भारतीयोचित विवेक में सम्मिलित कर लेने से आदर्शवाद का ढाँचा ढीला पड़ जाता है।... आनन्दभावना, प्रिय कल्पना और प्रमोद हमारी व्यवहार्य वस्तु थी। आज की जातिगत निर्वीयता के कारण उसे ग्रहण न कर सकने पर यह सेमेटिक है, कहकर सन्तोष कर लिया जाता है।"
कालान्तर में उन्होंने वेदों, उपनिषदों, आगमवादियों, सिद्धों और भक्तकवयित्री मीराँबाई आदि हिन्दी कवियों के उद्धरण देकर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि "वर्तमान हिन्दी में इस अद्वैत रहस्यवाद की सौन्दर्यमयी व्यंजना होने लगी है, वह साहित्य में रहस्यवाद का स्वाभाविक विकास है... वर्तमान रहस्यवाद की धारा भारत की निजी सम्पत्ति है, इसमें सन्देह नहीं। "
हिन्दी काव्य में रहस्यवादी चेतना व उसके विकास को लेकर जयशंकर प्रसाद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का प्रबल विरोध करते हैं।
उल्लेखनीय है कि आचार्य शुक्ल काव्य में साम्प्रदायिक रहस्यवाद को आयातित स्वीकार करते हैं जबकि जयशंकर प्रसाद ने उसे विशुद्ध भारतीय स्वीकार किया है। कबीर और जायसी का उदाहरण देकर प्रसाद यह सत्यापित करने की कोशिश करते हैं कि "कबीर और सूफी यदि रहस्यवादी कवि थे तो रहस्यवादी कविता अभारतीय कैसे हुई।" प्रसाद का काव्य-विवेचन व उनकी स्थापनाएँ भारतीय परम्परा, भारत की भौगोलिक परिवेश एवं अभिरुचियों से प्रभावित होकर विकसित होती हैं। वे अपने चिन्तन में वर्तमान हिन्दी आलोचना के परिदृश्य पर विचार करते हुए पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्तों को भारतीय परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं 1
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