मिथक और साहित्य - myth and literature
काव्य में मिथक का उपयोग प्रारम्भ से हो रहा है। काव्य में जीवन एवं समाज की सहज, सरस एवं सार्थक अभिव्यक्ति होती है। मिथक जीवन के लिए अपरिहार्य हैं। आई. ए. रिचर्ड्स ने 'कॉलरिज ऑन इमेजिनेशन' में कहा है कि मिथक के बिना मनुष्य आत्मा रहित क्रूर पशु की तरह हो जाएगा। यदि मनुष्य द्वारा अर्जित इन मिथकीय परम्पराओं को एकाएक समाप्त कर दिया जाए, तब भी मानव नये-नये मिथक गढ़ लेगा। इसका प्रमुख कारण है- मिथक का मानवीय वृत्तियों से सम्बद्ध होना। मानव में सृजन की इच्छा सदैव बलवती रही है और उसकी इस अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम मिथक रहा है। काव्य भी मानव की अनुभूतियों एवं मानसिक वृत्तियों की अभिव्यक्ति का माध्यम है। अतः मिथक एवं काव्य का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध होना स्वाभाविक है।
डॉ. रमेश कुन्तल मेघ ने मिथक को मनुष्य का आदिम काव्य कहा है। (मिथक और स्वप्न, पृ. 176) भावात्मकता, कल्पनाशीलता, प्रतीकात्मकता, चित्रात्मकता, रहस्यानुभूति जैसे तत्त्व मिथक और साहित्य दोनों में विद्यमान होते हैं। इन तत्त्वों के उभयधर्मी होने पर भी मिथक और काव्य एक नहीं हैं। मिथक की सर्जना में सार्वकालिक सार्वभौमिक एवं निर्वैयक्तिक सामूहिक अवचेतन की क्रियाशीलता रहती है। यही कारण है कि इसमें बिम्ब एवं प्रतीक भाव-प्रतिमा से निर्मित होते हैं। इस प्रकार मिथक आर्केटाइप्स (आदिम प्रारूपों) का पुनरान्वेषण हैं। काव्य के बिम्ब एवं प्रतीक व्यक्तिगत अवचेतन एवं चेतना से सम्पन्न होते हैं। यह अलग बात है कि काव्य में प्रयुक्त ये बिम्ब एवं प्रतीक रूढ़ हो जाते हैं।
कवि अपने देश के मिथकों से विषयवस्तु ग्रहणकर रचना का विकास करता है, उसे अपनी पारम्परिक संस्कृति से सम्पृक्त करता है। लचीलापन होने के कारण एक ही मिथक प्रत्येक युग की वास्तविकता को अभिव्यक्त करने के लिए नवीन सन्दर्भ से जुड़ने में भी सक्षम रहा है। राम की कथा को काव्य का विषय बनाना इसी प्रकार का उदाहरण है। तुलसीदास ने राम की कथा को 'नानापुराणनिगमागमसम्मत' बनाया तो उसी मिथक को मैथिलीशरण गुप्त ने 'साकेत', सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' ने 'राम की शक्तिपूजा' एवं नरेश मेहता ने 'संशय की एक रात' में नवीन भावों एवं विचारों से विभूषित करके विस्तार दिया है। अतः इतना स्पष्ट है कि मिथकों की पुनरावृत्ति न होकर उसकी पुनर्रचना एवं पुनर्व्याख्या होती है।
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