मिथक और नयी कविता - myth and literature
हिन्दी की कविता आदिकाल से ही मिथकों से प्रभावित होती रही है। यहाँ की जनता पौराणिक आख्यानों से प्रेरित-प्रभावित होती रही है। जहाँ एक ओर नयी कविता यथार्थवादी है, उसमें लघुमानव की प्रतिष्ठा है, भावाभिव्यक्ति में नये उपमानों एवं नवीन प्रतीकों को अपनाया गया है वहीं दूसरी ओर इन कवियों ने पौराणिक मिथकों को नये विचारों से समन्वित करके उन्हें अपने काव्य का विषय भी बनाया है। राम के मिथक को वाल्मीकि, तुलसीदास, मैथिलीशरण गुप्त, निराला, नरेश मेहता आदि कवियों ने आधार बनाया परन्तु सभी ने उस मिथक को युगानुरूप नयी अर्थवत्ता प्रदान की है।
नयी कविता में अनेक कृतियाँ हैं जिनकी कथा का स्रोत इतिहास एवं पुराण है। इन मिथकीय रचनाओं में प्रमुख हैं- अन्धा युग, कनुप्रिया (धर्मवीर भारती), संशय की एक रात (नरेश मेहता), महाप्रस्थान (देवराज), एक कण्ठ विषपायी (दुष्यन्त कुमार), शम्बूक (जगदीश गुप्त), सूर्यपुत्र (जगदीश चतुर्वेदी), एक पुरुष और (विनय ) आदि । इस प्रकार कहा जा सकता है कि नयी कविता मिथकीय चेतना की दृष्टि से समृद्ध है।
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