मिथक : अर्थ एवं स्वरूप तथा मिथक का काव्य से सम्बन्ध - Myth: Meaning and form and relation of myth to poetry
मिथकीय समीक्षा आधुनिक आलोचना की एक विशेष प्रणाली हैं। जैसे-जैसे आलोचकों का मिथक के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, वैसे-वैसे विद्वानों में मिथक की अवधारणा भी जटिल होती जा रही है। कुछ विद्वान् 'मिथक' शब्द की व्युत्पत्ति अंग्रेजी से मानते हैं तो कुछ संस्कृत से जिन विद्वानों ने मिथक की व्युत्पत्ति अंग्रेजी से मानी है उनमें डॉ० नगेन्द्र, डॉ. रमेश कुन्तल मेघ, डॉ. पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु एवं डॉ. पशुपति नाथ उपाध्याय सदृश विद्वान् हैं। डॉ० नगेन्द्र का विचार है "मिथक अंग्रेजी के 'मिथ' शब्द का हिन्दी पर्याय है
और अंग्रेजी 'मिथ' शब्द यूनानी भाषा के 'माइयस' से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है 'आप्तवचन' अथवा 'अतर्क्य कथन' । .... मिथक' संस्कृत का सिद्ध शब्द नहीं है। संस्कृत में इसके निकटवर्ती दो शब्द हैं- (i) 'मिथस्' या 'मिथ: जिसका अर्थ है परस्पर और (ii) मिथ्या, जो असत्य का वाचक है। यदि मिथक का सम्बन्ध 'मिथस्' से स्थापित किया जाए तो इसका अर्थ हो सकता है सत्य और कल्पना का परस्पर अभिन्न सम्बन्ध अथवा ऐकात्म्य । मिथ्या से सम्बन्ध जोड़ने पर 'मिथक' का अर्थ 'कपोल कथा' बन जाता है।' (मिथक और साहित्य, पृ. 6-7 ) -
डॉ. उषा पुरी वाचस्पति ने मिथक का सम्बन्ध संस्कृत से स्थापित किया है। उनका स्पष्ट कहना है- "भारतीय साहित्य में प्रयुक्त 'मिथक' शब्द पाश्चात्य मिथ अथवा माझ्थालॉजी का पर्याय नहीं है। मिथक के आविर्भाव के विषय में विद्वानों में मतभेद है तथापि यह निश्चित है कि इसके मूल में संस्कृत का 'मिथ' विद्यमान है • अंग्रेजी का नहीं। पाश्चात्य देशों में 'मिथ' अथवा 'माइथलॉजी' काल्पनिक कथाओं पर आधारित होती है - जबकि संस्कृत में 'मिथ' धातु का अभिप्राय प्रत्यक्ष दर्शन भी है तथा दो का मिलन भी मूलतः भौतिकता और आध्यात्मिकता का योग मिथकों का मूल आधार है। मिश्र धातु में कर्त्तवाचक 'क' जोड़कर मिथक शब्द का निर्माण हुआ है। (भारतीय मिथकों में प्रतीकात्मकता, पृ. 1)
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