कुँवर नारायण की मुक्तक कविताओं में मिथकीय चेतना - Mythical Consciousness in Kunwar Narayan's Muktak Poems

कुँवर नारायण के प्रमुख काव्य संग्रह हैं- चक्रव्यूह, परिवेश : हम-तुम, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों एवं हाशिए का गवाह । इन काव्य संग्रहों में छोटी-छोटी कविताएं हैं जिनमें विषय वैविध्य है। इन रचनाओं में प्रेम, सामाजिक यथार्थ, जन्म, मृत्यु, इतिहास एवं मिथक- सब समाहित है। उनके सभी काव्य-संग्रहों में मिथकीय चेतना देखी जा सकती है। वे कविता को मन की दुनिया कहते हैं और उनके मन में वेद उपनिषद, रामायण एवं महाभारत के प्रति गहरी निष्ठा है। कवि ने अपनी कविताओं में पौराणिक प्रतीकों को आधुनिक सन्दर्भों में प्रस्तुत किया है।


महाभारतकालीन अनेक घटनाओं को कवि ने अपनी कविता का विषय बनाया है। 'चक्रव्यूह' शीर्षक कविता में अभिमन्यु के प्रसंग को आधार बनाकर कवि ने आधुनिक मानव की अपरिचित ज़िंदगी का संघर्षपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया है-


मैं नवागत वह अजित अभिमन्यु हूँ


प्रारब्ध जिसका गर्भ से ही हो चुका निश्चित, अपरिचित ज़िंदगी के व्यूह में फेंका हुआ उन्माद, बाँधी पंक्तियों को तोड़ मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया, पिघलती आग सी संध्या, बदन पर एक फूटा कवच,


क्रमशः लक्ष्य तक बढ़ता हुआ जयनाद:


सारी देह क्षत-विक्षत, धरती खून में सनी ज्यों सभी लथपथ लाश, सिर पर गिद्ध सा मँडला रहा आकाश.....



अच्छाई का बुराई से संघर्ष अनवरत चलता रहता है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने 'कामायनी' में कहा है


कि-


देवों की विजय दानवों की हारों का होता युद्ध रहा संघर्ष सदा उर अन्तर में जीवित रह नित्य विरुद्ध रहा ।


कुँवर नारायण 'चक्रव्यूह' में लिखते हैं-


यह महासंग्राम,


युग-युग से चला आता रहा महाभारत,


हजारों बुद्ध उपदेशों, उपाख्यानों कथाओं में छिपा वह पृष्ठ मेरा है जहाँ सदियों पुराना व्यूह जो दुर्भेद्य था, टूटा


(चक्रव्यूह, पू.-136)


अन्धकार पर प्रकाश की विजय का मिथक कवि को बहुत प्रिय है।

ज्योति विनम्रता का प्रतीक है तो अन्धकार गर्व और घमण्ड का 'जन्मसिद्ध अधिकार' कविता में कवि ने उस मिथक का प्रयोग किया है जिसमें कृष्ण दूत बनकर दुर्योधन के पास पाँच गाँव माँगने के लिए जाते हैं। -


लपलपाता अन्धकार,


ज्योति का अन्धकार सविनय माँगता


कुछ भूमि;


"नहीं दूँगा नोक भर स्थान"


कहता अन्धकार :


पंच तत्त्वों की अपरिमिति शक्ति


छल से बद्ध,


कौरवों की सभा हारी,


द्रोपदी की शिखा सहमी


प्रार्थना की एक मुद्रा-ली


ज्योति ओढ़े खड़ी शंकित


चेतना के बीच सहसा


खींच ले कब तमस-दु शासन ।


- (चक्रव्यूह, पृ. 107)


उपर्युक्त मिथक कवि को बहुत प्रिय है। उसे लगता है कि जीवन का आनन्द समन्वय एवं सामंजस्य में है।


'अपठनीय' कविता में भी कवि ने इस मिथक का सार्थक प्रयोग किया है-


सूई की नोक बराबर धरती पर लिखा


भगवद्गीता का पाठ


इतना विराट्


कि अपठनीय


- इन दिनों पू.-14)


कवि ने भावों एवं विचारों के सम्प्रेषण के लिए मिथक का रमणीय प्रयोग किया है। प्रातः काल आकाश में किरणों के प्रसार के लिए बावनावतार के मिथक का प्रयोग किया गया है।

वामन विष्णु के पाँचवें तथा त्रेतायुग के पहले अवतार थे। वह विष्णु के ऐसे अवतार थे जो बौने ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। भागवत कथा के अनुसार विष्णु ने इन्द्रलोक पर पुनः अधिकार स्थापित करने के लिए यह अवतार धारण किया। राजा बलि ने देवलोक पर अधिकार स्थापित कर लिया था। वामन एक बौने ब्राह्मण के रूप में बलि के पास गए और अपने रहने के लिए तीन कदम के बराबर भूमि माँगी। वामन ने अपना आकार इतना इतना बढ़ा लिया कि पहले कदम में पूरा भूलोक और दूसरे कदम में पूरा देवलाक नाप लिया। तीसरे कदम के लिए कोई भूमि बची ही नहीं। तब बलि ने तीसरा कदम रखने के लिए अपना सिर प्रस्तुत कर दिया। प्रातः कालीन किरणों के प्रसार बावन (बौने) वामनावतार विष्णु के चरणों के फैलाव की तरह है-


वन्दना के स्वर उभरते,


हर्ष के पंखी चहकते,


एक बावन किरण बढ़कर छा गई आक्षितिज


तीनों लोक पग से नापकर


कृष्ण और सुदामा की मैत्री का मिथक प्रसिद्ध है। इस मिथक को कवि ने आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार


प्रस्तुत किया है-


कैसी बाँसुरी ? कैसा नाच ? कौन गिरिधारी ?


जिस महल को तुम


भौंचक खड़े देख रहे


वह तो उसका है।


जिसकी कमर की लचकों में


हीरों की खान है।


बहुत भोले हो सुदामा


नहीं समझोगे इस कौतुक को......।


कुँवर नारायण की एक प्रसिद्ध कविता है 'अयोध्या, 1992' राम के मिथक को आधुनिकता से जोड़ते। - हुए कवि कहता है-


हे राम,


जीवन एक कटु यथार्थ है


तुम्हारे बस की नहीं


और तुम एक महाकाव्य ! उस अविवेक पर विजय अब लाखों सिर लाखों हाथ हैं,


जिसके दस-बीस नहीं


और विभीषण भी अब न जाने किसके साथ है।


कवि मानता है कि "ग्रीक माइथोलोजी में, मिथक इतिहास की तरह हैं लेकिन हमारे यहाँ वे आज भी जीवित हैं। कई बार लगता है यथार्थ से अधिक हमारे यहाँ मिथक जीवित हैं। और वे भावभूमि को ही नहीं, यथार्थ जीवन को प्रभावित करते हैं, कभी अच्छे के लिए, कभी बुरे के लिए। यह एक चैलेंज है कि मिथक, जो जीवित हैं उनका इस्तेमाल कैसे करें।" एक साक्षात्कार में लीलाधर मंडलोई द्वारा जब मिथक के कुरूपीकरण पर प्रश्न पूछा गया तो कवि का उत्तर था “हाँ, राम का मिथक ! जिस पर मैंने 'अयोध्या-92' कविता लिखी। मैंने इस मिथक के कुरूपीकरण के खिलाफ ही कविता में लिखा। क्योंकि यह मिथक एक सामाजिक खलल की तरह सामने पेश हुआ जो तकलीफदेह था ...।" (तट पर हूँ तटस्थ नहीं, पृ.-23)


इस प्रकार कुँवर नारायण के काव्य में आदि से लेकर अन्त तक मिथकीय सन्दर्भों को देखा जा सकता है। उन्होंने विदेशी मिथकों को भी अपनी रचनाओं में प्रयुक्त किया है। 'ट्यूनीशिया का कुआँ', 'शाहनामा', 'इब्ने बतूता', 'नीरो का संगीत प्रेम' जैसी कविताएँ इसका उदाहरण हैं। कवि के मिथकों की एक बड़ी विशेषता उनका आधुनिक सन्दर्भों में प्रयोग है। पुरुषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में कहा जा सकता है "मिथकों के प्रति गम्भीर संवेदनशीलता रखते हुए कुँवर नारायण उन्हें न तो जबरन इतिहास बनाते हैं, न उनमें अपने समकालीन राजनैतिक आग्रहों को ढूँसते हैं।

भाषा के प्रति संवेदनशील कवि जानता है कि मिथकों की वास्तविक सार्थकता उनकी बहुलार्थ सम्भाव्यता में ही है, सुज्ञात, सुपरिभाषित ऐतिहासिक तथ्य या व्यक्ति बन जाने में नहीं। कवि मिथक की पुनर्रचना करता है। इस पुनर्रचना में उसके अपने आग्रहों का आना स्वाभाविक, बल्कि निर्णायक हैं, लेकिन इस पुनर्रचना की विश्वसनीयता, कवि के अभिप्रेत को व्यंजित कर सकने की क्षमता पुनः भाषा के उसी नाजुक संतुलन पर निर्भर करती है। मिथक-वस्तु की रक्षा करते हुए ही अपने समय के सरोकारों से जोड़ने का यह प्रयत्न एक भी शब्द की लापरवाही से विफल हो सकता है। सन्दर्भ मिथकों, किंवदन्तियों या ऐतिहासिक व्यक्तियों का हो, चाहे आस-पास के पर्यवेक्षण का, कुँवर नारायण भाषा के संतुलन को हाथ से छूटने नहीं देते।" (प्रतिनिधि कविताएँ, पृ. 11)