कुँवर नारायण की मिथकीय चेतना - Mythical Consciousness of Kunwar Narayan
प्रसिद्ध कवि, कथाकार और आलोचक कुँवर नारायण का समकालीन साहित्य में विशिष्ट स्थान है। उन्होंने वर्तमान को जाँचने-परखने एवं देखने के लिए मिथक का अधिक उपयोग किया है। मिथक के उपयोग और प्रभाव के विषय में वे स्वयं कहते हैं 'रामायण और महाभारत इस हद तक भारतीय जनमानस में रचे-बसे हैं कि - लगता है आज भी अगर उस जनमानस तक कोई सन्देश पहुँचाना है तो वह इन दोनों महाकाव्यों के माध्यम से भी पहुँचाया जा सकता है। चाहे वह सन्देश आधुनिक हो या प्राचीन, ये दोनों स्रोत उसके लिए एक सहज जनमार्ग की तरह हैं, जो कभी भी पुराने नहीं पड़े उन पर लगातार आवाजाही और चहल-पहल रही है।
वाल्मीकि के राम से - लेकर गाँधी के राम तक एक अटूट परम्परा है। रामायण के राम और महाभारत के कृष्ण मिलकर भारतीय मानस की वह बृहत् भावभूमि बनाते हैं जिनके पीछे हजारों साल का मिथकीय इतिहास है जिसे घटनात्मक इतिहास से - अलग करके समझना जरूरी है। इतिहास मरता है पर मिथक कभी नहीं मरता। मिथक बार-बार जन्मता है और हर बार पहले से कहीं अधिक सशक्त और प्रभावी होकर हमारे समय में उपस्थित रहता है।" (शब्द और देश काल, -65)
इस प्रकार मिथकों के सम्बन्ध में कुँवर नारायण की दृष्टि एकदम स्पष्ट है। वे अपने भावों, संवेदनाओं, विचारों को जनमानस में प्रभावशाली एवं स्थायी रूप से सम्प्रेषित करने के लिए मिथकों का प्रयोग करते हैं।
कविता में एक साथ कई सन्दर्भ निहित होते हैं, जिन्हें कवि पाठक तक पहुंचाना चाहता है। कुँवर नारायण ने इसीलिए उपनिषदों या अन्य क्लासिक महाकाव्यों (रामायण, महाभारत आदि) के मिथकों से अपने कथ्य एवं शिल्प को समृद्ध किया है।
कुँवर नारायण के प्रबन्ध काव्यों में मिथकीय चेतना
साठोत्तरी कविता में, जिन रचनाकारों ने प्रबन्धात्मक काव्य की रचनाएँ की हैं, उनमें कुँवर नारायण का नाम प्रमुख है। 'आत्मजयी' एवं 'वाजश्रवा के बहाने' इनके प्रमुख खण्डकाव्य हैं जिनका प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ से क्रमशः 1965 एवं 2008 में हुआ है।
मिथकीय चेतना की दृष्टि से इन दोनों रचनाओं पर विचार किया जाए-
आत्मजयी
कुँवर नारायण औपनिषदिक परम्परा के प्रतिष्ठित कवि हैं। 'आत्मजयी' (1965) रचना की विषय-वस्तु 'कठोपनिषद्' पर आधारित है। इस खण्डकाव्य की कथा 28 शीर्षकों में विभक्त है जिसमें कवि ने मृत्यु के प्रति अपनी दृष्टि उजागर की है। नचिकेता के माध्यम से कवि ने आधुनिक विचारशील मानव की समस्या को उठाने का प्रयास किया है। 'आत्मजयी' की भूमिका में कवि ने कहा है 'आत्मजयी' में उठायी गई समस्या मुख्यतः एक - विचारशील की समस्या है। कथानक का नायक नचिकेता मात्र सुखों को अस्वीकार करता है: तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति भर ही उसके लिए पर्याप्त नहीं है। उसके अन्दर वह बृहत्तर जिज्ञासा है जिसके लिए केवल सुखी जीना काफी नहीं है,
सार्थक जीना ज़रूरी है। यह जिज्ञासा ही उसे उन मनुष्यों की कोटि में रखती है जिन्होंने सत्य की खोज में अपने हित को गौण माना, और ऐन्द्रिय सुखों के आधार पर ही जीवन से समझौता नहीं किया, बल्कि उस चरम लक्ष्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया जो उन्हें पाने के योग्य लगा।" ('आत्मजयी' - भूमिका, पृ. 5)
नयी कविता में निराशा, विसंगतियों, घुटन एवं बोझिल स्थितियों का चित्रण होता है परन्तु 'आत्मजयी' में इनके विरुद्ध मानवीय बोध की संघर्ष चेतना की अभिव्यक्ति हुई है। प्रायः अस्तित्ववाद को पश्चिमी विचारक सार्व से जोड़कर देखा जाता है परन्तु भारतीय दर्शन एवं भारतीय चिन्तन में सदैव जीवन और मृत्यु, अस्तित्व और अनस्तित्व सम्बन्धी चिन्ता विद्यमान रही है।
आज के भौतिकतावादी चकाचौंधयुक्त जीवन के अभ्यस्त मनुष्य के हृदय से उदात्त मानवीय भाव लुप्त हो रहे हैं। उसके चित्त में अनास्था, कुण्ठा, हताशा तथा मृत्यु का भय व्याप्त है। इसीलिए नचिकेता वाजश्रवा से सहिष्णुता, साहसिकता, शील, सत्य एवं जिजीविषा की सार्थकता की बात करता है-
असहमति को अवसर दो। सहिष्णुता को आचरण दो हरा हरा कर । उपेक्षा से खिन्न न हो जाए कहीं
कि बुद्धि सिर ऊँचा रख सके. "
उसे हताश मत करो काइयाँ स्वार्थों से
अविनय को स्थापित मत करो,
मनुष्य की साहसिकता ।
इस प्रकार कवि ने पीढ़ियों के संघर्ष के माध्यम से युगीन जीवन के सन्दर्भों के चित्रण हेतु सफल प्रयास किया है। कवि ने समकालीन सन्दर्भों को महत्त्व दिया है।
जीवन के पूर्णानुभव के लिए किसी ऐसे मूल्य के लिए जीना आवश्यक है जो जीवन की अनश्वरता का बोध कराए। यही मनुष्य को सान्त्वना दे सकता है कि मर्त्य होते हुए भी वह किसी अमर अर्थ में जी सके ।
मृत्यु मानव जीवन का सबसे बड़ा, निश्चित परन्तु समय में अनिश्चित ऐसा भय है जिसके कारण उसे सम्पूर्ण संसार अनर्थक लगने लगता है । इस मृत्यु के भय का अतिक्रमण मनुष्य की सृजनात्मक क्षमता ही कर सकती है। कवि कुँवर नारायण 'आत्मजयी' को मूलतः जीवन की सृजनात्मक सम्भावनाओं में आस्था के पुनर्लाभ की कहानी बताते हैं। कवि का मानना है-
अब यह जग पर्याप्त नहीं है।
यह प्रदत्त संसार
तुझे स्वीकार नहीं है। अपना कुछ विशेष
अब तुझको रचना होगा,
अपने ही भीतर उठते
इस महाप्रलय के
तुझमें अब कृतित्त्व का कारण -
अन्धनाश से बचना होगा। कारण को आकाश चाहिए उसको एक विकास चाहिए.
तुझमें स्रष्टा की व्याकुलता,
- (आत्मजयी, पू.-97)
'आत्मजयी' का हिन्दी साहित्य में एक प्रबन्धकाव्य के रूप में विशिष्ट स्थान है। इसका कथानक कठोपनिषद् के नचिकेता प्रसंग पर आधारित है। मरणशील होते हुए भी मनुष्य अमर अर्थ में जी सके इसी का सन्धान आत्मजयी का काव्य-विषय है। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी का विचार है. ""आत्मजयी' की समस्या युग- युग की समस्या है। इसी से किसी युग विशेष का सन्दर्भ उससे नहीं जुड़ता। अपने स्वरूप में वह वैसी ही बेलीस है जैसी कि कठोपनिषद् की कथा । कविता पर कहीं-कहीं दर्शन के छा जाने का यह एक और कारण है। सच तो यह है कि कविता कठोपनिषद् में जाकर भी कविता बनी रहती है, यह वैसा ही है जैसा यम के दरवाजे से नचिकेता का वापस आ जाना : 'आत्मजयी' यों अपने शीर्षक को प्रमाणित करता है।" (नयी कवितायें : एक साक्ष्य, पृ. 110)
वाजश्रवा के बहाने
हिन्दी के वरिष्ठ कवि कुँवर नारायण के काव्य 'वाजश्रवा के बहाने' का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा सन् 2008 में किया गया। इस काव्य के दो खण्ड हैं- (क) नचिकेता की वापसी, एवं (ख) वाजश्रवा के बहाने । 'आत्मजयी' की भाँति इस काव्य का उपजीव्य ग्रन्थ भी कठोपनिषद् है। वैसे वाजश्रवा का अर्थ है अन्नदानी के रूप में जाना जाने वाला व्यक्ति । परन्तु इस काव्य के वाजश्रवा वैदिककालीन कर्मकाण्ड, लौकिकता, लेन-देन एवं सांसारिक रीति-नीति में दक्ष पिता के रूप में चित्रित हुए हैं। यज्ञ की पूर्णाहुति के लिए दान देने के समय वाजश्रवा बूढ़ी गायों को दान में देते हैं। इसे देखकर नचिकेता को दुःख होता है, क्योंकि वह जानता है कि दान में स्वयं की प्रिय वस्तु को देना चाहिए।
अतः नचिकेता अपने पिता से पूछता है कि मैं आपका सबसे प्रिय हूँ, मुझे आप किसे दान में देंगे? नचिकेता द्वारा बार-बार यह प्रश्न किए जाने पर वाजश्रवा क्रोध में कहते हैं कि "मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ ।" पिता के वचनों को शिरोधार्य कर नचिकेता यमलोक के द्वार पर पहुँचते हैं। यमराज बाहर गए हुए हैं। तीन दिन प्रतीक्षा करने के बाद यम आते हैं तथा बालक के साहस और सत्त्व को देखकर नचिकेता से तीन वर माँगने एवं घर लौट जाने को कहते हैं।
यमराज के बहुत प्रयास के बाद नचिकेता मानता है और तीन वरदान माँगता है- (i) घर वापसी तथा पिता के क्रोध का शमन, (ii) स्वर्गप्राप्ति की प्रविधि का ज्ञान,
एवं (iii) जीवन एवं मृत्यु के रहस्य का ज्ञान। यमराज नचिकेता को प्रलोभन देते हैं कि वह गूढ़ ज्ञान के बदले संसार की सारी सम्पदा माँग ले। परन्तु नचिकेता सारे प्रलोभन ठुकराता है। यमराज उसे गूढ़ ज्ञान देते हैं और नचिकेता आत्मज्ञानी बनकर पिता के पास वापस लौटता है ।
'आत्मजयी' और 'वाजश्रवा के बहाने' दोनों काव्यों के विषय जीवन, मृत्यु, प्रेम, शोक आदि हैं लेकिन दोनों काव्यों के कथ्य में थोड़ा अन्तर है। कवि के अनुसार, 'वाजश्रवा के बहाने' जीवन के इसी प्रबल आकर्षण के स्पर्धा की चेष्टा है। इस जिजीविषा के विभिन्न आयाम चाहे भौतिक हों या आत्मिक,
चाहे बौद्धिक (दार्शनिक) हों या भावनात्मक, तत्त्वतः वे हैं जैविक ही 'आत्मजयी' में यदि मृत्यु की ओर से जीवन को देखा गया है, तो 'वाजश्रवा के बहाने' में जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की कोशिश की गई है।
कुँवर नारायण का काव्य जीवन का काव्य है, जिजीविषा का काव्य है, शक्ति का काव्य है। शक्ति के दो रूप हैं- (i) उम्र एवं विस्फोटक तथा (ii) संयत, उदार एवं अनुशासित निरालाजी ने 'राम की शक्तिपूजा' में शक्ति के इन दोनों रूपों को चित्रित किया है। 'वाजश्रवा के बहाने में' शक्ति के संयत, उदार एवं अनुशासित स्वरूप का चित्रांकन है । कवि कुँवर नारायण की विशेषता यही है कि वे मिथकीय चरित्रों में नवीन अर्थ को योजित करते हैं।
वाजश्रवा के चरित्र में क्षमा-भाव, पश्चाताप एवं वात्सल्य आदि को दिखाया गया है जो कि लोकमानस की वाजश्रवा छवि से अलग हैं, उदाहरणार्थ-
उसका रुदन जैसे एक स्तवन से
गूँज उठा हो भुवन का कोना-कोना
वह छा गया है आक्षितिज
व्योम से परे तक
प्रदीप्त है
लोक परलोक ।
पिता और पुत्र के सम्बन्ध में प्रायः द्वन्द्व रहा करता है।
यह द्वन्द्व पीढ़ी अन्तराल के कारण पनपता है। यही पीढ़ी अन्तराल ही दुःख और तनाव का कारण बनता है। वाजश्रवा के माध्यम से कवि यही वास्तविकता पाठकों
के समक्ष रखता है-
जानता हूँ
दीमक लगी चौखटों की
बासी नक्काशियों को पार कर झिझकेगा एक नवागत पुत्र का भविष्य-बोध
भुतही हवेलियों में पाँव रखते
जीवन के विभिन्न कालों में मनुष्य के लिए जीवन का अर्थ भी बदलता रहता है।
जीने का वास्तविक लक्ष्य एवं अर्थ भी बदलता रहता है। जीवन का यह यथार्थ उसे बहुत बाद में समझ में आता है -
कठिन होता है समझ पाना जीने का अर्थ
आयु के चौथे पहर में
युद्ध और शान्ति के अर्थ
जब बदल जाते हैं तब हम केवल जीतने के लिए नहीं
केवल न हारने की लड़ाई लड़ते हैं। -
'वाजश्रवा के बहाने' में कवि ने शाश्वत प्रश्नों के साथ-साथ सामयिक प्रश्नों को उठाया है। इस काव्य की भाषा सहज, सरल और सरस है। भाषा एवं काव्य-शिल्प में वैविध्य है। इस रचना में जीवन के आलोक का रेखांकन है। जीवन का आनन्द समन्वय बनाये रखने में है और यह रचना दो पीढ़ियों के बीच समन्वय बनाये रखने के समझदार ढंग को रूपायित करती है।
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