नागार्जुन - Nagarjuna

नागार्जुन एक ऐसे रचनाकार के रूप में चर्चित हैं, जिन्होंने साहित्य के माध्यम से गणतन्त्र के असली सपने को सदैव साकार करने का प्रयास किया क्योंकि उनके साहित्य में वास्तविक जनतन्त्र की चिन्ता सदैव व्यक्त हुई है। नागार्जुन की रचनाओं को भारतीय समाज के सूक्ष्म अवलोकन के लिए याद किया जाता है एवं कुत्सित भारतीय राजनीति के विरुद्ध प्रबल हस्तक्षेप के रूप में भी जाना जाता है। हिन्दी साहित्य के ज्ञात स्रोतों पर विचार किया जाए तो बहुत कम रचनाकार ऐसे हैं, जिन्होंने भारतीय समाज के बहुजन को अपनी रचनाओं के माध्यम से सम्बोधित किया है । नागार्जुन की काव्य-चेतना उनके जीवन के संघर्षों के बीच से निर्मित हुई है और उनका रचनात्मक कौशल भारतीय किसान-मजदू जीवन के समान ही अनगढ़ है। नागार्जुन की काव्य-चेतना को उनकी कविताओं के विषय चयन से जोड़कर समझा जा सकता है। उन्होंने खुद लिखा भी है कि -

लेखनी ही है हमारा फार


धरा है पट, सिंधु है मसिपात्र


तुच्छ से अति तुच्छ जन की जीवनी हम लिखा करते, कहानी, काव्य, रूपक, गीत क्योंकि हमको स्वयं भी तो तुच्छता का भेद है मालूम।


- (युगधारा, पृष्ठ 65)


अपनी वेशभूषा और काया से बेहद सामान्य दिखने वाले नागार्जुन की कविताएँ विषय की दृष्टि से वैविध्यपूर्ण,

सारगर्भित और अपने भाषिक विन्यास में बहुरंगी है। गरीब लोगों की जीवन-दशाओं और शोषक एवं अमानवीय व्यवस्थाओं को निर्मूल कर देने वाली कविताओं के साथ-साथ नागार्जुन ने कालिदास और विद्यापति के प्रेम काव्यों का सरस अनुवाद भी प्रस्तुत किया। उन्हें एक रचनाकार के रूप में इस बात की कभी चिन्ता ही नहीं रही कि क्रान्ति-चेतना के वाहक और व्यवस्था विरोध का नायक कवि, जब शृंगारपूर्ण वृत्तान्तों का मनोयोगपूर्वक वर्णन करेगा तो आलोचक क्या कहेंगे ? अतः नागार्जुन के पक्ष या विपक्ष में लिखने वाले आलोचकों की एक लम्बी सूची बनाई जा सकती है। नागार्जुन उन गिने-चुने रचनाकारों में हैं जिन्हें लेखन के साथ-साथ मंचों पर भी लोगों ने बहुत पसंद किया ।

अपने जीवनकाल में लोगों के बीच बाबा बन जाना नागार्जुन के लिए इतना आसान नहीं था। इसके लिए उन्हें निरन्तर अपनी रचनात्मकता का बाबाई प्रमाण भी देना पड़ा। शायद इसी कारण कई आधुनिक आलोचकों ने उन्हें 'आधुनिक कबीर' माना है। वे कबीर की तरह प्रतिरोध को अपना हथियार समझते थे और प्रतिरोध को अपनी कविताओं का 'महाभाव' भी मानते थे। वस्तुतः उनका यह प्रतिरोध उन व्यक्तियों, वर्गों और व्यवस्थाओं के विरुद्ध है, जो सामान्य और अनपढ़ जनता का शोषण करते हैं। हो सकता है कि समाज और सामान्य जीवन से अलग अपनी ही दुनिया में रहकर लिखने वाले लेखकों पर यह बात लागू न हों, किन्तु नागार्जुन पर चर्चा करते समय इन बातों की पड़ताल करना जरूरी हो जाता है, क्योंकि नागार्जुन किसान-मजदू और देश की राजनीति जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर सीधी प्रतिक्रिया देने वाले रचनाकार माने जाते हैं। वे सामान्य जन के प्रति पक्षधरता के लिए लेखकों को प्रेरित भी करते हैं-


अजी आओ


इतर साधारण जनों से अलहदा होकर रहो मत, कलाकार या रचयिता होना नहीं पर्याप्त है। पक्षधर की भूमिका धारण करो..... विजयिनी जनवाहिनी का पक्षधर होना पड़ेगा अगर तुम निर्माण करना चाहते हो, शीर्ण संस्कृति को अगर सप्राण करना चाहते हो ।


- (युगधारा, पृष्ठ 74)


नागार्जुन की रचनात्मकता की सबसे बड़ी सच्चाई तो यह है कि वह अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से रचनाकार के प्रत्यक्ष जुड़ाव को प्रमाणित करती है। नागार्जुन की रचनात्मकता उनकी लोक-संस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान की द्योतक है।

उनके रचना कर्म के स्वरूप का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लगभग सभी महत्त्वपूर्ण विषयों पर लिखा और अपने जीवनकाल में मौजूद सभी साहित्यिक विधाओं को अपनाया। उनका रचना-संसार उनके जीवन की तरह ही विस्तृत और अनेकरूपा हैं। उसमें प्रकृति, प्रणय, भूख-गरीबी, बेरोजगारी बदहाली, विद्यार्थी-लेखक की चिन्ताएँ, देशी-विदेशी राजनीति आदि सभी कुछ शामिल है। उन्होंने अपने समय के कड़वे यथार्थ को स्वयं जीया और झेला है। अपने जीवन में कवि-कर्म को उन्होंने आधार बनाया, इसलिए उनकी कविता श्रमजीवी और जनवादी कविता है। लोगों से जुड़ाव के लिए वे जीवन भर 'यात्रा' करते हैं।

उनके लिए घुमक्कड़पन भारतीय मानस एवं विषय-वस्तु को समग्र और सच्चे रूप में समझने का साधन रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि नागार्जुन ने ज्यादातर रचनाएँ तात्कालिक सामाजिक और राजनैतिक परिदृश्य को लेकर लिखी हैं, लेकिन उन्होंने ऐसी कविताएँ भी पर्याप्त गम्भीरता से लिखी हैं, जिनमें निजी जिंदगी के हर्ष-विषाद, सघन संवेदनात्मक अनुभूति और रचनात्मक ऐन्द्रिकता बेहद सुघड़ता के साथ अभिव्यक्त हुए हैं। नागार्जुन की प्रेम और प्रकृति से जुड़ी कविताएँ एक ऐसा मानवीय संसार रचती हैं जो बाकी रचनाकारों से कई मायने में बिल्कुल अलग हैं। उनकी प्रेमसम्बन्धी कविताओं में अगर सघन संवेदनात्मक अनुभूति है,

तो प्रकृतिसम्बन्धी कविताओं में रचनात्मक परिप्रेक्ष्य भी मौजूद है। प्रकृति और प्रणय की अनुभूतियों से जुड़ी कविताओं के अलावा नागार्जुन ने कुछ ऐसी कविताएँ भी लिखी हैं, जिनमें उनका तरउनी गाँव और वहाँ के तालाब, मखाने, मछली, आम, तिलकोड़े आदि भी मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त गाँव के विभिन्न पहलुओं से अन्तरंग रिश्ते के कारण गाँव में दिखने वाली विपन्नता के बावजूद, वहाँ की हवा में तैरती मिट्टी की सोंधी खुशबू उनकी रचनाओं में स्वतः ही महकती है। वैसे भी जिस प्रकार "पूँजीवादी व्यवस्था श्रमिक जनता का आर्थिक रूप से ही शोषण नहीं करती, बल्कि वह उसके सौन्दर्यबोध को कुण्ठित करती है,

उसके जीवन को घृणित और कुरूप भी बनाती है।... . क्या भारत में और क्या यूरोप में, कहीं भी अब तक कोई बड़ा मानव-प्रेमी कवि नहीं हुआ, जो प्रकृति का प्रेमी न रहा हो।" (नयी कविता और अस्तित्ववाद, पृष्ठ-149) जाहिर है नागार्जुन जैसे रचनाकार प्रकृति से अलग रहकर अपनी रचनात्मकता का विकास भला कैसे करते ? वे प्रकृति के मानव निरपेक्ष सौन्दर्य का वर्णन नहीं करते, बल्कि प्रकृति का जो सबसे सुन्दर रूप है उसे वे मनुष्य से प्रकृति के रिश्ते के रूप में देखते हैं। उदाहरण के लिए 'मेरी भी आभा है इसमें' कविता की कुछ पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं-


नये गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है। यह विशाल भूखण्ड आज जो दमक रहा है। मेरी भी आभा है उसमें ।


यहाँ प्रकृति की सत्ता सर्वशक्तिमान् है, लेकिन मनुष्य सापेक्ष है । इस अन्तर्विरोध के पीछे मूलतः सहअस्तित्व का भाव है, जिसे कवि प्रकृति और मनुष्य के सम्बन्धों के माध्यम से घटित होते हुए देखना चाहता है। कई बार प्रकृति के अति सामान्य विषय को भी कवि अपनी काव्य प्रतिभा से नया अर्थ प्रदान कर देता है। यथा-


कैसे ये नीले उजास के / अच्छत छींट रहे जंगल में, लगता है ये ही जीतेंगे / शक्ति प्रदर्शन के दंगल में न-जुल कर दिप-दिप करते हैं / कौन कहेगा जल मरते हैं, मिल- जुगनू हैं ये स्वयंप्रकाशी/ पल-पल भास्वर, पल-पल नाशी इनकी विजय सुनिश्चित ही है । तिमिर तीर्थ वाले दंगल में, इन्हें न तुम बेचारे कहना / अजी यही तो जोति कीट हैं।


कवि यहाँ जुगनुओं को अन्धकार के विरुद्ध योद्धाओं की तरह लड़ते देखता है। "लगता है ये ही जीतेंगे ' के माध्यम से कवि अपनी इच्छा व्यक्त कर देता है कि आन्तरिक शक्ति से चमकने वाले तुच्छ किन्तु ये स्वाभिमानी जुगनू अन्धकार पर जीत अवश्य हासिल करेंगे।


प्रकृति के प्रति नागार्जुन में विशेष प्रकार का आकर्षण भाव भी है। प्रकृति उनकी प्रज्ञा को जगाती भी है। किसान कवि होने के कारण प्रकृति उनके लिए उत्तेजना का वाहक नहीं, बल्कि प्रकृति प्रेम उनकी रचनात्मक ऊर्जा में ताज़गी भी प्रदान करती है।

चूँकि जीवनभर उन्होंने उबड़-खाबड़, वन-बीहड़, पर्वत पठार, रेत चट्टान सभी के सौन्दर्य से आत्मीय सम्बन्ध बनाए रखा, इसलिए उनका प्रकृति प्रेम कृत्रिम नहीं है बल्कि सहज और नैसर्गिक है। वे रोम-रोम में प्रकृति की आभा को घुलते महसूस करते हैं-


यह कपूर धूप


शिशिर की यह सुनहरी, यह प्रकृति का उल्लास रोम रोम बुझा लेना ताज़गी की प्यास ।


अपने जनपद और देश की प्रकृति सौरभ से नागार्जुन की कविता सदैव नया अर्क ग्रहण करती है। ऋतुओं के राजा वसन्त को कवि ने विशेष ललक के साथ देखा है।

इसी तरह 'शरद पूर्णिमा', 'अब के इस मौसम में', 'झुक आए कजरारे मेघ' आदि कविताओं में नागार्जुन का सहज प्रकृति-चित्रण देखा जा सकता है। चाँद का एक चित्र देखिए, जिसमें कवि ने अपनी चिन्ताओं को चाँद की विवशता और धुंधलेपन के रूप में देखा है -


काली सप्तमी का चाँद / पावस की नमी का चाँद तिक्त स्मृतियों का विकृत विष वाष्प जैसे सूंघता है चाँद जागता था, विवश था अब धुंधला है चाँद ।


इसके अतिरिक्त नागार्जुन ने ग्रामीण परिवेश का एकदम सजीव और मनोरम चित्रण किया है।

ग्रामीण परिवेश के सौन्दर्य चित्रों को कवि ने जिस प्रकार नदी, तालाब, अमराई, खेत-खलिहान आदि के माध्यम से प्रस्तुत किया है, वे अपनी स्वाभाविक और गँवई छवि से पाठकों को सीधे भारतीय जनपदों के मूल रस- गन्ध से जोड़ते हैं। वर्षा ऋतु में उठती मिट्टी की सोंधी महक, कजरारे मेघों की घुमड़न, मोर- पपीहे की गूँजती स्वर लहरियों और रह- रह कर चमकती बिजली की आँख मिचौली आदि कई रूप-छवियाँ नागार्जुन के काव्य में दिखाई पड़ते हैं। प्रकृति का वर्णन करते हुए कभी-कभी वे इन वर्णनों में भावुक भी हो उठते हैं। इसे आत्मीयता भी कहा जा सकता है, जिसके तहत वे जन-जीवन में हरियाली भरने वाले पावस को बारम्बार प्रणाम भेजने लगते हैं-


लोचन अंजन, मानस रंजन / पावस तुम्हें प्रणाम ऋतुओं के प्रतिपालक ऋतुवर/ पावस तुम्हें प्रणाम अतुल अमित अंकुरित बीजधर / पावस तुम्हें प्रणाम


कवि नागार्जुन प्रकृति को सहज रूप में देखते हैं। नागार्जुन की प्रकृति जनसाधारण के सुख-दुःख में अपनी भागीदारी निभाती है और यह तभी हो सकता है जब कवि का भी उसके साथ सहज और आत्मीय सम्बन्ध हो । यह आत्मीयता बाबा नागार्जुन की रचनात्मक चेतना में गहराई तक विद्यमान है।


नागार्जुन के जीवन का अधिकतर समय पत्नी-बच्चे से दूर प्रवास में ही बीता। फिर भी अपनी पत्नी के साथ उनका अगाध प्रेम था। कभी कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेयसी का बिछोह कवि के मन को व्याकुल कर देता है। 'सिन्दूर तिलकित भाल', 'वह तुम थी', 'तन गई रीढ़' और 'वह दंतुरित मुस्कान' जैसी कविताओं में उनका यह प्रेम और करुण-विछोह उभर कर स्पष्ट व्यक्त हुआ है-


झुकी पीठ को मिला/किसी हथेली का स्पर्श तन गई रीढ़ / महसूस हुई कन्धों को / पीछे से किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें कौंधी कहीं चितवन / रंग गए कहीं किसी के होठ निगाहों के ज़रिये जादू घुसा अन्दर / तन गई रीढ़ ।


पत्नी प्रेम से जुड़ी कविताओं में इस कविता की श्रेष्ठता इसी बात से सिद्ध हो जाती है कि यह कविता एक तरफ जहाँ 'झुकी पीठ' जैसे बिम्ब के माध्यम से एक-दूसरे की ज़रूरत की ओर संकेत करती है, वहीं रंग गए कहीं किसी के होठ' के माध्यम से सहज आकर्षण की अनुभूति को भी व्यक्त करती है। आधुनिक जीवन की भागम- भाग में पति-पत्नी को एक-दूसरे का सम्बल बनना कितना ज़रूरी है, यह कविता इस भाव को सहज ही प्रकट करती है। नागार्जुन का प्रणय-वर्णन सामाजिकता, शालीनता और गरिमा से युक्त है। यह प्रेम स्वस्थ प्रेम है, यह प्रेरणादायी है, जिसमें मांसलता की गन्ध ब्रू-दूर तक नहीं है। यह प्रेम पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।


यह बहुत हद तक खुद नागार्जुन के द्वारा भी घोषित तथ्य है कि उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से मूलतः जन-जीवन को वाणी देने का प्रयास किया है।

सन् 1965 ई. में देश और जनता के प्रति अपनी भूमिका को स्पष्ट करते हुए उन्होंने स्वयं कहा कि-


जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊँ? जनकवि हूँ, मैं साफ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ ?


- (हजार हजार बाहों वाली, पृष्ठ 142 )


जाहिर है नागार्जुन की वाणी में दूर-दूर तक खोजने पर भी हकलाहट नहीं मिलती। आधुनिक हिन्दी आलोचना के सभी आलोचक उन्हें जनकवि मानते हैं। लेकिन जनकवि होना इतना आसान नहीं है, जनता के प्रति जवाबदेही इसकी कसौटी है, नागार्जुन इस शर्त को जीवनभर निभाते हैं। वे किसी राजनैतिक दल के काम नहीं करते, इसलिए जब वे साफ ढंग से सच कहते हैं,

तो कई बार वामपंथी दलों के राजनैतिक और साहित्यिक नेताओं को भी नाराज करते हैं। "जो लोग राजनीति और साहित्य में सुविधा के सहारे जीते हैं वे दुविधा की भाषा बोलते हैं। नागार्जुन की दृष्टि में कोई दुविधा नहीं है..... यही कारण है कि खतरनाक सच साफ बोलने का वे खतरा उठाते हैं।" अपनी एक कविता 'प्रतिबद्ध हूँ' में उन्होंने दो टूक लहजे में अपनी दृष्टि को स्पष्ट किया है-


प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ -


बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त- संकुचित 'स्व' की आपाधापी के निषेधार्थ अविवेकी भीड़ की 'भेड़िया-धसान' के खिलाफ अन्ध-बधिर 'व्यक्तियों' को सही राह बतलाने के लिए अपने आप को भी 'व्यामोह' से बारम्बार उबारने की खातिर प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ !


उनकी कविताओं में प्रतिगामी मूल्यों के प्रति तिरस्कार भाव है। उनमें स्वभावतः शोषण के विरुद्ध आक्रोश, घृणा, मोहभंग तो है ही, साथ ही जीवट और जुझारूपन से उपजा आशावादी स्वर भी है, जिसके कारण दीन-हीन जनता से सहानुभूति रखते हैं और उन्हें सत्ताधारियों एवं शोषकों के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए आह्वान करते हैं। शोषक चाहे जिस वर्ग का हो, वे उसे नहीं माफ नहीं करते। इस प्रकार कबीर की तरह वे किसी प्रकार के भी अत्याचार पर करारी चोट करते हैं-


तुमसे क्या झगड़ा है / हमने तो रगड़ा है,


इनको भी, उनको भी !


- (हजार हजार बाहों वाली, पृष्ठ 189)


इस बात का प्रमाण उन्होंने जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आन्दोलन के समय भी प्रस्तुत किया। सभी महत्त्वपूर्ण लोगों की तरह उन्होंने भी इंदिरा गाँधी के अपातकाल की कड़ी भर्तस्ना की,

लेकिन जब उन्हें यह आभास हो गया कि इंदिरा शासन के विरुद्ध एक जुट हुई अधिकांश शक्तियों की नीयत ठीक नहीं है तो उन्होंने उन्होंने उन्हें भी नहीं छोड़ा। वस्तुतः जेल में रहते हुए उन्होंने देखा कि यहाँ समान नीति वाले दलों का मेल नहीं है, सिर्फ़ "इंदिरा हटाओ - सत्ता हथियाओ" के लिए की गई साठ-गाँठ है, जिसमें मार्क्सवादी भी हैं, जनसंघी भी हैं, समाजवादी भी हैं, दक्षिणपंथी भी हैं, जात बिरादरी पर आधारित दल भी हैं और सर्वोदयी भी हैं। इस साठ-गाँठ पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की-


मिला क्रान्ति में भ्रान्ति विलास


मिला भ्रान्ति में शान्ति विलास टूटे सींगों वाले सांड़ों का यह कैसा टक्कर था !


मिला शान्ति में क्रान्ति विलास ...


- (खिचड़ी विप्लव देखा हमने, पृष्ठ 29 )


जयप्रकाश आन्दोलन की विसंगतियों को चौराहे पर लाने के बाद वे कांग्रेसी शासन के समर्थक नहीं बन जाते । ये वही कवि हैं जिन्होंने कांग्रेस और इंदिरा गाँधी दोनों को सदैव अपने व्यंग्य बाणों का निशाना बनाए रखा-


जाने, तुम कैसी डायन हो ! ....


जय हो जय हो, हिटलर की नानी की जय हो ! .... किस चुड़ैल का मुँह फैला है !


देशी तानाशाही का पूर्णावतार है


संविधान का पोथा, देखो पूरा का पूरा ही लील रही है! .... लोकतन्त्र के मानचित्र को रौंद रही है, कील रही है


• महाकुबेरों की रखैल है ...


सत्तामद की बेहोशी में हाँफ रही है। आय-बॉय बकती है कैसे, देखो कैसे काँप रही है।


- (वही, पृष्ठ 28)


सचमुच नागार्जुन जनकवि हैं, वे किसी विशेष प्रकार की काव्य सिद्धि की अपेक्षा नहीं करते सीधे-सीधे शब्दों में जनता को सम्बोधित करते हैं। शासन की ताकत से वे बिल्कुल नहीं डरते और ललकारते भी हैं -



जनकवि हूँ, क्यों चाहूँगा मैं थूक तुम्हारी श्रमिकों पर क्यों चलने दूँ, बंदूक तुम्हारी


- (वही, पृष्ठ-83)