नागार्जुन के संवेदना के रूप - Nagarjuna's Forms of Sensation
निश्चय ही नागार्जुन एक समसामयिक सामाजिक-राजनैतिक चेतना के कवि हैं किन्तु उनकी व्यष्टि चेतना बिल्कुल ही सुषुप्त नहीं है। इससे मनोहर रूप में सम्बन्ध अनेक काव्य-सन्दर्भ उनकी हिन्दी कविताओं में प्राप्त होते हैं। हाँ ! इतना अवश्य है कि उनकी काव्य-विकास-प्रक्रिया में यह व्यष्टिमूलासंवेदनशीलता उनके यहाँ मन्द पड़ने लगती है। यदि हम मैथिली में लिखी उनकी कविताओं को देखें, विशेषतः उनकी साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत 'पत्रहीन नग्न गाछ""" को, उस संकलन की अधिकांश कविताओं में रोमान का सूत्र फड़फड़ाता दिख पड़ेगा और 'उनकी व्यष्टि चेतना से विकसित उनके रोमान भरे सन्दर्भ उनके यहाँ मिल जायेंगे रोमांस को केवल नारी सौन्दर्य के उद्दाम आकर्षण में देखना सही नहीं हैं।
वस्तुतः "सच्चा रोमांस अतीत के प्रति विकास स्मरण में भी उजागर होता है। वह भावविह्वल उद्गारों के प्रस्फुटन में भी झाँकता है और गहरे रागात्मक सम्बन्ध के अभाव को तिलमिला देने वाली व्यथा से भी उद्भूत होता है। रोमान ही अमूर्त भावों को मूर्त्तता प्रदान करने का साधन भी बनता है।"18
'सिन्दूर तिलकित भाल'"" कविता में कवि प्रवास के दिनों में प्रिया के सिन्दूर-तिलकित भाल की याद करता है। घोर निर्जन में अपनी प्रिया की यह स्मृति कवि की उस व्यष्टि चेतना को सम्यक् रूप से प्रतिबिम्बित करती है,
जिससे काव्य-विषय के चयन के सिलसिले में या संवेदना के आग्रहण और उन्मेषीकरण के सिलसिले में कवि दाम्पत्य सन्दर्भ को उठाता है। कविता में नागार्जुन ने प्रेम को व्यक्त करने वाली 'ऋतु- सन्धि' कविता भी लिखी है, जिसमें प्रकृति उद्दीपन बनकर आती है और कवि के मन में पत्नी प्रिया की स्मृति को जाग्रत कर जाती है। नागार्जुन की 'तन गई रीढ़' भी इस सन्दर्भ की महत्त्वपूर्ण कविता है। इस कविता में प्रेमिका को महत्त्वपूर्ण प्रेरक शक्ति के रूप में निरूपित किया गया है। 'पातकी' नागार्जुन की प्रेमी-प्रेमिका सन्दर्भपरक की एक विशिष्ट कविता है। इस कविता में स्वाति नक्षत्र के बादल के प्रति पातकी की ओर से अनन्यासक्ति प्रदर्शित की गई है।
नागार्जुन की 'कालिदास सच सच बतलाना 20 कविता भी प्रेमी-प्रेमिका प्रेमपरक सन्दर्भ को ही निरूपित करने वाली कविता है। इस कविता में 'अज' और 'इन्दुमती' के प्रेम, रति और कामदेव के प्रेम, यक्षिणी और यक्ष के प्रेम में उपस्थित विरह संवेदना की घनीभूतता और उससे समानुभूतिक संवेदन प्राप्त करने वाले कवि का कालिदास के प्रेम-विह्वल चित्त की करुणा को रेखांकित किया गया है।
"गुलाबी चूड़ियाँ' ?" शीर्षक कविता पिता-पुत्री प्रेमपरक सन्दर्भ को अगाध स्नेयमयतायुक्त वाणी प्रदान
करती है। कवि कहता है-
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ ।
वर्ना ये किसको नहीं भाएँगी
'बहुत दिनों के बाद' शीर्षक कविता कवि नागार्जुन की संवेदनशीलता को गहरे स्तर पर उपस्थित करने वाली कविता है। यह कवि की प्रगाढ़ आत्मीयता को व्यक्त करने वाली कविता है । कवि को बहुत दिनों तक ऐसी काम्य ऐन्द्रीय संवेदनशीलता का अभाव खटकता रहा, जो उसे बहुत-बहुत प्रिय है।
आज बहुत दिनों के बाद इसी अभाव की पूर्ति हुई है, जो कवि के मानस को अनन्य ढंग से परितृप्त कर गई है। कवि का मन अलग-अलग वस्तुओं में रुचि रखता है। उसकी रुचि पकी सुनहली फसलों की मुस्कान को देखने में है, धान कूटती किशोरियों की कोकिल कण्ठी तान सुनने में है, मौलसिरी के ताजे टहके फूलों के सूँघने में है, गाँव की पगडंडी चंदनवर्णी धूलों के स्पर्श में है, तालमखाना खाने में हैं और गन्ने का रस जी भर चूसने में है। यहाँ वह चाक्षुष, श्रोत, प्राण, त्वक और आस्वाद संवेदनशीलता की क्रुद्ध सार्थकता को व्यक्त करता है।
समष्टिपरक संवेदना
समष्टिपरक संवेदना को निरूपित करने वाली नागार्जुन की कविता संख्या में प्रभूत्व हैं।
नागार्जुन समाज के विभिन्न सन्दर्भों को देखते हैं और अपनी कविता में उसका प्रलेखीकरण (डॉक्यूमेंटाइजेशन) कर देते हैं। उनकी कविताएँ सामाजिक दस्तावेज बन जाती हैं। उनकी काव्य-रचना के प्रथम और द्वितीय चरण में सामाजिक सन्दर्भ को निरूपित करने वाली कविताओं की प्रचुरता है। यहाँ वे द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद की चेतना से युक्त होकर समाज के वर्ग वैषम्य को देखते हैं और वृत्ति, वस्त्र, शिक्षा, आवास, चिकित्सा आदि के सन्दर्भ की विषमता को उजागर करने हेतु अपना स्वर मुखर करते हैं। यहाँ वे सामाजिक कुरीतियों और रूढ़ियों के आलोचक के रूप में उपस्थित होते हैं तथा सामाजिक भ्रष्टाचार की कटु आलोचना करते हैं।
मूलतः वे समानता के आधार पर खुशहाल समाज के स्वरूप के समर्थक हैं। इसीलिए जो भी आड़ी-तिरछी क्रियात्मक रेखाएँ इस स्वरूप को खण्डित-विखण्डित करती हैं, नागार्जुन उनकी कटु आलोचना करते हैं। पर उनकी ऐसी रचनाओं की नाभि केन्द्रीयता, अर्थ (पूँजी) की ही है जहाँ यथार्थ और वास्तव से हमारा साक्षात्कार होता है। अपनी ऐसी रचनात्मकता में नागार्जुन दो बड़े काम करते हैं - एक ओर ये स्थितियों की समझ को उजागर करते हैं, दूसरी ओर वे सामाजिक विसंगतियों का रेखांकन करते हुए धारदार व्यंग्य करते हैं। उनकी ऐसी कविताएँ कला की दृष्टि से बहुत सपाट भी हो जाती हैं। पर सशक्त और दृढ़ वैचारिकता के कारण अधिक स्थलों पर उनका महत्त्व बना रहता है।
यहाँ नागार्जुन के लिए रोजमर्रे की हर घटना कविता का विषय बन जाती है।
कहना पड़ेगा कि ऐसी कविताएँ भले ही एक व्यापक और गहन अनुभव से हमारा साक्षात्कार न करा पाएँ परन्तु उद्वेलित तथ्यांकन से हमें परिचित अवश्य करा पाती हैं। पर जहाँ कहीं नागार्जुन ने कला में कसाव लाने की कोशिश की हैं, वहीं उनकी कविता 'डाक्यूमेंटेशन' न होकर 'मोनूमेंट' बन गई हैं। ऐसी कविताओं में नागार्जुन आवृत्ति, उभार और समान्तरता के कलात्मक कौशल को प्रयुक्त करते दीख पड़ते हैं।
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