नन्ददुलारे वाजपेयी की समीक्षा-दृष्टि के सात सूत्र - Nanddulare Vajpayee's review-seven points of vision

आचार्य वाजपेयी की आलोचना- दृष्टि को समझने के लिए उनकी पुस्तकों की भूमिकाएँ, विशेष रूप से 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी' की 'विज्ञप्ति', 'नया साहित्य : नये प्रश्न' की भूमिका 'निकष' और 'आधुनिक साहित्य' की 'भूमिका' महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। वाजपेयी जी की पुस्तक 'हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी' की 'विज्ञप्ति' में प्रस्तुत उनकी समीक्षा-दृष्टि के स्वघोषित सात सूत्र उनके महत्त्व के क्रम में इस प्रकार हैं-


i. रचना में कवि की अन्तर्वृत्तियों अर्थात् मानसिक उत्कर्ष और अपकर्ष का अध्ययन ।


ii.रचना में कवि की मौलिकता, शक्तिमत्ता और सृजन की लघुता और विशालता अर्थात् कलात्मक सौष्ठव का अध्ययन ।


iii. रीतियों, शैलियों और रचना के बाह्यांगों अर्थात् रचना में प्रयुक्त प्रविधियों का अध्ययन। iv. समय और समाज तथा उनकी प्रेरणाओं का अध्ययन।


V. कवि की व्यक्तिगत जीवनी और रचना पर उसके प्रभाव का अध्ययन (मानस विश्लेषण) ।


vi. कवि के दार्शनिक, सामाजिक और राजनैतिक विचारों आदि का अध्ययन ।


vil. काव्य के जीवन सम्बन्धी सामंजस्य और सन्देश का अध्ययन।


वाजपेयी जी ने अपने उपर्युक्त सूत्रों में से 'रचना में कवि की अन्तर्वृत्तियों के अध्ययन' को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। 'काव्य के जीवन सम्बन्धी सामंजस्य और सन्देश के अध्ययन' को इस क्रम में अन्तिम स्थान देकर उन्होंने अपनी समीक्षा-दृष्टि की प्राथमिकताएँ स्पष्ट कर दी हैं।