समकालीन हिन्दी कविता का स्वरूप - Nature of contemporary Hindi poetry
समकालीन हिन्दी कविता के अनेक रूप-रंग और अनेक शैलियाँ है। कई पीढ़ियों के कवि और काव्यधाराओं से मिलकर समकालीन कविता का स्वरूप बनता है। कविता के इस संश्लिष्ट चित्र की वरिष्ठ पीढ़ी के कवियों में मुक्तिबोध, धूमिल, रघुवीर सहाय, कुँवरनारायण, केदारनाथ सिंह, चन्द्रकान्त देवातले, मलय, विजेन्द्र, विनोद कुमार शुक्ल, अशोक वाजपेयी, आलोक धन्वा, नरेश सक्सेना, ज्ञानेन्द्रपति, भगवत रावत, विष्णुचन्द्र शर्मा, ऋतुराज और विष्णु खरे का नाम शुमार किया जा सकता है। इसके बाद की पीढ़ी में वीरेन डंगवाल, उदय प्रकाश,
अरुण कमल, राजेश जोशी, लीलाधर जगूड़ी, मंगलेश डबराल, श्याम कश्यप, असद जैदी, विष्णु नागर, प्रयाग शुक्ल, बोधिसत्व, निलय उपाध्याय, दिनेश कुशवाह, मदन कश्यप, बद्रीनारायण, एकान्त श्रीवास्तव, दिनेश कुमार शुक्ल, जीतेन्द्र श्रीवास्तव, कुमार अम्बुज, देवी प्रसाद मिश्र, ओमप्रकाश वाल्मीकी, अनामिका, कात्यायनी, सविता सिंह, निर्मला पुतुल शामिल हैं। युवा पीढ़ी में मनोज कुमार झा, बसंत त्रिपाठी, राकेश रंजन, आशुतोष दुबे, शिरीष कुमार मौर्य, प्रेमरंजन अनिमेष, संतोष चतुर्वेदी अनुराधा सिंह, अरुणाभ सौरभ, ज्योति चावला, पंकज चतुर्वेदी, उमाशंकर चौधरी और अनुज लगुन नाम उल्लेखनीय है। दक्षिण भारत में ए. अरविन्दाक्षन् और सुरेश नारायण ने हिन्दी कविता का विस्तार किया है।
समकालीन कविता में सप्तकीय कवियों में मुक्तिबोध, कुँवर नारायण और केदारनाथ सिंह की कविता का प्रभाव परवर्ती काव्य पर रहा। यों मुक्तिबोध की कविताई का असर प्रगतिशील विचारधारा के कवियों पर अधिक रहा। समकालीन कविता की यह केन्द्रीय धारा है। अशोक वाजपेयी और नन्दकिशोर आचार्य सरीखे कवियों के यहाँ कला और व्यक्ति केन्द्रित भाव का विस्तार है। आपातकालीन परिदृश्य में उभरे कवियों में दुष्यन्त कुमार की गजलों ने हिन्दी कविता का रूप रंग बदला। इक्कीसवीं सदी में नये कवियों ने कविता की भाषा को नया मुहावरा दिया । कविता के इस भरे-पूरे संसार में जीवन के विविध रंग और ढंग के साथ समकालीन कविता की संस्कृति निर्मित हुई है।
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