द्विवेदीयुगीन आलोचना का स्वरूप - Nature of Dwivedi-era criticism

द्विवेदी युग में आलोचना की अलग-अलग धाराएँ प्रवाहित होती देखी जा सकती हैं। मुख्यधारा आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के लेखन सम्पादन की थी, जिसमें युग-बोध के साथ नवीनता का पोषण करने और साहित्य को समसामयिक जीवन यथार्थ से जोड़ने की प्रवृत्ति प्रमुख थी। दूसरी धारा में मिश्रबन्धु, पण्डित पद्मसिंह शर्मा और पण्डित कृष्णबिहारी मिश्र की आलोचना आती है। इस धारा की आलोचना रीतिकालीन काव्यशास्त्र पर आधारित थी और अधिकांश तुलनात्मक आलोचना के रूप में लिखी गई थी। इस युग में पाश्चात्य आलोचना के अनुवाद भी प्रकाशित हुए। पाश्चात्य आलोचना से परिचय हिन्दी आलोचना के एक स्वतन्त्र विधा के रूप में मान्य होने में सहायक हुआ ।

अध्यापकीय और अनुसंधानपरक समीक्षा का विकास भी इस युग में हुआ । बाबू श्यामसुन्दर दास, जगन्नाथ दास 'रत्नाकर', सुधाकर द्विवेदी आदि ने इस आलोचना को विकसित करने का प्रयास किया।


आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की आलोचना


डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के आलोचनात्मक कार्य को उनके व्यापक शिक्षा सम्बन्धी कार्य के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

द्विवेदी जी अपने युग के महान् शिक्षक थे, जो ज्ञान-विज्ञान के भिन्न-भिन्न अनुशासनों के विकास के द्वारा हिन्दी प्रदेश में सामाजिक चेतना का प्रसार करना चाहते थे। साहित्य उनके शिक्षा-प्रसार अभियान का एक अंग था। द्विवेदी जी साहित्य को 'ज्ञानराशि का संचित कोष मानते थे। हिन्दी साहित्य को 'ज्ञानराशि का संचित कोष' बनाने के लिए वे निरन्तर प्रयत्नरत रहे।


आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी का आलोचनात्मक लेखन संस्कृत के कवियों और उनकी रचनाओं की समीक्षाओं से हुआ था। ये समीक्षाएँ परिचयात्मक होती थीं और उनमें गुण-दोष कथन की प्रमुखता रहती थी।

द्विवेदी जी ने साहित्य को आम जनता से जोड़ने के उद्देश्य से खड़ी बोली को व्याकरण और व्यवहार की दृष्टि से व्यवस्थित और परिष्कृत करने का कार्य किया। उन्होंने भारतेन्दु-युग के साहित्य-चिन्तन की परम्परा को आत्मसात् करते हुए हिन्दी में आलोचना के एक नये युग का सूत्रपात किया । उन्होंने अपने लेखों, पुस्तक समीक्षाओं, सामाजिक विषयों पर की गई टिप्पणियों और स्वतन्त्र पुस्तकों में सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक आलोचना के अनेक सूत्र प्रस्तुत किए। उन्होंने समकालीन भारतीय लेखन और पाश्चात्य चिन्तन से हिन्दी के पाठकों को परिचित करवाया। प्राचीन भारतीय काव्य के अनुशीलन और युगीन परिस्थितियों के विश्लेषण से ही उनकी आलोचना- दृष्टि का निर्माण हुआ था।

देश-काल की परिस्थितियों के अनुकूल सिद्ध होने पर ही वे परम्परागत काव्य मूल्यों को स्वीकार करते थे। कृति के मूल्यांकनके समय उसकी रचना के परिवेश का गहन अध्ययन करने के बाद ही द्विवेदी जी उस पर अपना निर्णय देते थे। छन्द, अलंकार और व्याकरण आदि की भूलों को काव्य में गौण मानते हुए आलोचना के स्वरूप के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है कि "किसी पुस्तक या प्रबन्ध में क्या लिखा गया है, किस ढंग से लिखा गया है, वह विषय उपयोगी है या नहीं, उससे किसी का मनोरंजन हो सकता है या नहीं, उससे किसी को लाभ पहुँच सकता है या नहीं, लेखक ने कोई नयी बात लिखी है या नहीं, यदि नहीं तो उसने पुरानी ही बात को नये ढंग से लिखा है या नहीं यही विचारणीय विषय हैं।

समालोचक को प्रधानतः इन्हीं बातों पर विचार करना चाहिए।" हिन्दी आलोचना में साहित्य के अन्तरंग और बहिरंग के बारे में यह नितान्त नवीन दृष्टि थी। इसी दिशा में 'सरस्वती' पत्रिका में अपने लेखों और टिप्पणियों के माध्यम से द्विवेदी जी ने अपने आलोचना- सिद्धान्तों को विकसित करने का प्रयास किया।


रीतिकालीन काव्य की परम्परा में नायिका भेद आदि विषयों पर कविता करने वाले कवियों पर व्यंग्य- प्रहार करते हुए द्विवेदी जी ने अपने 'नायिका-भेद' शीर्षक निबन्ध में लिखा है कि "इस विस्तृत विश्व में ईश्वर ने इतने प्रकार के मनुष्य, पशु, पक्षी, वन, निर्झर, तड़ाग आदि निर्माण किए हैं कि सैकड़ों कालिदास उत्पन्न होकर अनन्तकाल तक उन सबका वर्णन करते रहे तो भी उनका अन्त न हो। फिर हम नहीं जानते, और (अन्य) विषयों को छोड़कर नायिका भेद-सदृश अनुचित वर्णन क्यों करना चाहिए? इस प्रकार की कविता करना वाणी की विगर्हणा है।"