नवगीत: उद्भव और विकास - Navgeet: Origin and Development

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। उद्भव के पश्चात् विकास सृष्टि का नियम है। संसार में जितने भी जीव-जन्तु जन्म लेते हैं समय की गति के साथ सभी विकसित होते हैं। माता के गर्भ से जन्मा शिशु निरन्तर विकास कर वयस्क हो जाता है। धरती की कोख में पड़ा बीज पहले अंकुरित होता है और शनैः शनैः विकसित हो विशाल वृक्ष बन जाता है। वैज्ञानिक औटो स्मिथ की परिकल्पना के अनुसार ब्रह्माण्ड में फैले धूल और गैस के सैकड़ों सूक्ष्म कण अपनी कक्षाओं में रहकर चक्रण एवं चक्रमण के कारण संघनित हो विशाल ग्रहों-उपग्रहों में तब्दील हो गए और सूर्य का परिभ्रमण करने लगे। कहने का तात्पर्य है कि समय एवं परिस्थितियों के साथ प्रत्येक वस्तु और पदार्थ तत्त्व में परिवर्तन होता है। मानवीय सभ्यता और संस्कृति में भी इसी प्रकार निरन्तर विकास हुआ है और लगातार परिवर्तन होते गए हैं।

मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है अतः अपनी सभ्यता और संस्कृति के परिवर्तन को उसने अपनी सुविधानुसार विकसित किया है। स्वभावतः मनुष्य सुविधाभोगी है अतः बदलते समय के साथ उसने अपनी जीवन शैली को लगातार सरलीकृत करने का प्रयत्न किया है। पहले जिन दूरियों को वह वर्षों एवं महीनों में तय कर पाता था उन्हें वह आज घण्टों में तय कर रहा है। नृत्य, गायन और संगीत मानवीय अन्तःकरण द्वारा स्वतः स्फूर्त कलाएँ हैं। समयानुकूल इन कलाओं में भी उत्तरोत्तर विकास होता गया है। कभी अपने विचारों को सम्प्रेषित करने के लिए तो कभी स्वान्तः सुखाय के लिए मानव मन गीत-संगीत की रचना करने लगा। मूलतः लोकहृदय से निःसृत गीत एक सुदीर्घकालीन विकास-यात्रा के पश्चात् गीतिकाव्य के रूप में हमारे सामने आते हैं।


लोकगीतों से गीतिकाव्य व गीत और गीत से 'नवगीत' का विकास हुआ। विद्वानों ने निराला के काव्य- संग्रह 'गीतिका' में संकलित 'वर दे वीणावादिनी वर दे !' गीत की अधोलिखित पंक्तियों को नवगीत बीज-रूप में देखा है-


नवगीत, नवलय, ताल छन्द नव नवलकन्थ, नव जलद-मन्द्र रव नव नभ के नव विहग-वृन्द को नव पर, नव स्वर दे !


निराला नये छन्द, नयी लय, नयी गति, नये कण्ठ के स्वागतोत्सुक हैं। यहाँ तक कि नये आकाश में नये पंछियों के नवगान की अभीप्सा करते हैं। वे पारम्परिक बन्धनों से मुक्ति चाहते हैं इसीलिए पुराने बन्धनों को तोड़ डालने के आग्रही हैं। अपने काव्य और जीवन में भी नवीनता की कामना करते हैं।


'नवगीत' के नामकरण के सम्बन्ध में एक प्रसंग उल्लेखनीय है। ठाकुर प्रसाद सिंह ने अपने लेख 'हिन्दी गीत कविता' में काशी में आयोजित गीत केन्द्रित 'नौका गोष्ठी' का जिक्र करते हुए लिखा है कि- "सन् 1951- 52 में काशी में हुए साहित्यिक संघ के अधिवेशन में हिन्दी के नये गीतों पर चर्चा हुई थी। चाँदनी रात में गंगा की धारा की धारा पर हुई नौका गोष्ठी में उस दिन धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, जगदीश गुप्त, रामदरश मिश्र, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शम्भुनाथ सिंह नामवर सिंह तथा अन्य कितने ही नये कवि उपस्थित थे लगभग सभी कवियों ने अपने सुकण्ठ से नये गीत गाए थे।" उस 'नौका गोष्ठी' के प्रत्यक्ष सहभागी रहे डॉ. शंभुनाथ सिंहसन् 1956 में इलाहाबाद में परिमल द्वारा आयोजित साहित्यकार सम्मेलन में शामिल हुए और आगे की घटना स्वयं लिखते हुए कहते हैं - "उस अवसर पर जो काव्य गोष्ठी आयोजित हुई थी उसमें मैंने 'पुरवैया धीरे बहो' शीर्षक गीत गाया था।

गीत सुनाने से पूर्व मैंने कहा था कि अन्य साथियों ने नयी कविताएँ सुनाई हैं; मैं एक नवगीत सुनाने जा रहा हूँ। इस तरह बिना किसी विचार-विमर्श, प्रस्ताव अथवा घोषणा के नयी कविता के मंच पर ही पहले-पहल 'नवगीत' शब्द का प्रयोग सहज रूप से प्रयुक्त हो गया।" सुधी समाज में इस नयी विधा का स्वागत हुआ और इसका नवगीत नाम भी तभी से निर्विरोध सर्वमान्य हो गया। विगत छह दशक में नवगीत ने विकास के विभिन्न सोपानों को पार कर अपने आधुनिक स्वरूप को प्राप्त किया है।


वैसे तो आधुनिक युग के प्रारम्भ के साथ ही पारम्परिक गीतिकाव्य का नवीनीकरण होने लगा था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र एवं उनके मण्डल के कवियों यथा उपाध्याय बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, प्रतापनारायण मिश्र आदि ने पारम्परिक गीतिकाव्य को छोड़कर लोकगीतों की तर्ज पर होलीगीत, कजरी, बिरहा आदि की रचना की ।

इसी क्रम में श्रीधर पाठक आदि ने लोकगीतों के आधार पर देश-प्रेम एवं प्रकृति-चित्रण से सम्बन्धित गीत लिखे। परन्तु अधिकतर विद्वानों का मानना है कि 'नवगीत' के बीज-सूत्र तो छायावाद और उत्तर छायावाद से ही प्राप्त होते हैं। खासकर निराला के 'बान कूटता है', 'बहुत दिन बाद खुला आसमान', 'सहज चाल चलो उधर', 'स्नेह निर्झर बह गया हैं', 'बाँधो न नाव इस ठाँव, बन्धु' आदि गीत 'नवगीत' के बीज गीतों में परिगणित किए जाते हैं। सुमित्रानन्दन पन्त कृत 'ग्राम्या' नामक काव्य-संकलन में तथा चतुर्वेदीजी की कुछ कविताओं में भी 'नवगीत' की झलक दिखाई देती है। उनके 'आज बन्धु चार पाँव ही चलो' और 'समय के समर्थ अश्वमान लड़े' आदि गीत उस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। व्यक्तिवादी स्वछन्दतावादी कवियों में हरिवंश राय बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, रामविलास शर्मा,

केदारनाथ अग्रवाल, कुँवर चन्द्रप्रकाश आदि ने भी आंचलिकता से परिपूर्ण गीत लिखे। कहना गलत नहीं होगा कि इन गीतों में 'नवगीत' का प्रारम्भिक रूप विद्यमान है। प्रयोगवादी कवियों में से रामविलास शर्मा और गिरिजाकुमार माथुर के कुछ गीत 'नवगीत' जैसे लगते हैं। आजादी के बाद 'नयी कविता' एवं 'नवगीत' का प्रादुर्भाव प्रायः साथ-साथ हुआ। नयी कविता के कवियों में खासकर, गिरिजाकुमार माथुर, केदारनाथ अग्रवाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, नरेश मेहता, धर्मवीर भारती और अज्ञेय ने 'नवगीत' के विकास में अपना योगदान दिया। अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से नवगीत की विकास-यात्रा को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता प्रथम चरण (1950 से 1960), द्वितीय चरण (1961 से 1970) तथा तृतीय चरण (1971 से अद्यतन) । -


प्रथम चरण 1950 से 1960


प्रथम चरण में 'नवगीत' अपनी परम्पराओं से भिन्न नवीन रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इस कालखण्ड में भी नवगीत दो रूपों में विभक्त दिखाई देता है। जिसमें प्रथम प्रयोगवादी कवियों द्वारा विकसित नवगीत तथा द्वितीय पारम्परिक गीत-धारा से विकसित नवगीत प्रयोगवादी कवियों द्वारा विकसित नवगीतकारों में अज्ञेय, शंभुनाथ सिंह एवं त्रिलोचन शास्त्री ने गीतिकाव्य को नवीन दिशा में मोड़ने का प्रयत्न किया। प्रयोगवादी कवि अज्ञेय के कुछ ऐसे गीत उनके काव्य-संकलन 'इत्यलम्' और 'हरी घास पर क्षण भर' में संगृहीत हैं। अज्ञेय ने अन्य प्रयोगवादी कवियों के गीतों को नयी कविता का गीत मानकर ही उन्हें तारसप्तकों में स्थान दिया है। इन गीतों में कुछ गीत आंचलिक बोध से प्रभावित हैं जबकि कुछ प्रयोगधर्मी हैं। तारसप्तक नवगीतकारों में वे नवगीतकार आते हैं जिन्होंने पारम्परिक गीत-धारा को ही नयी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया है। इन कवियों में डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, शिवबहादुर सिंह भदौरिया एवं रामचन्द्र 'चन्द्रभूषण' प्रमुख हैं ।


इन नवगीतकारों ने नवगीतों में अब तक अछूते आंचलिकता - बोध एवं आत्मानुभूति को नये बिम्बों, नये प्रतीकों एवं नये कथ्यों के माध्यम से उद्घाटित करने का प्रयत्न किया।


डॉ. शम्भुनाथ सिंह के काव्य-संग्रहों 'दिवालोक' और 'माध्यम मैं' के अन्तर्गत लोक धुनों पर आधारित गीतों की पर्याप्त संख्या है। ठाकुर प्रसाद सिंह के काव्य-संकलन 'वंशी और बादल' के गीत भी इसी कालावधि में लिख गए थे। इस प्रकार नवगीत अपने प्रथम चरण में नयी भाषा, नये बिम्ब-विधान, नये प्रतीक और नये कथ्य की ताज़गी से परिपूर्ण हुआ।


द्वितीय चरण 1961 से 1970


द्वितीय चरण के 'नवगीत' में आधुनिकता बोध की अभिव्यक्ति व्यापकता में होने लगी। इस कालखण्ड में विरचित नवगीतों में आधुनिक जीवन की समस्याओं यथा उत्पीड़न,

निराशा, आकांक्षा, हताशा, पीड़ा, क्लेश, हर्ष-विषाद इत्यादि का चित्रण नवीन ढंग से अभिव्यक्त हुआ ।


सत्तर के दशक में नयी कविता में बिखराव आने लगा था। इसके कई भेद हुए यथा विद्रोही पीढ़ी, अ-कविता, बीट पीढ़ी, भूखी पीढ़ी की कविता, कबीर पीढ़ी की कविता, अति कविता, दिगम्बर कविता, युयुत्सावादी कविता, श्मशानी कविता, वाम कविता, सहज कविता, विचार कविता इत्यादि । इन समस्त खेमे के कवि प्रायः गीत-विधा के विरोधी थे और वे गीति काव्य को कविता की मुख्य धारा से उखाड़ फेंकना चाहते थे। प्रायः ये सभी कवि अलग-अलग शहरों से भिन्न-भिन्न पत्रिकाएँ निकलते थे, जिसमें छोटी-बड़ी गद्यात्मक रचनाएँ प्रकशित करते थे परन्तु सारे अवरोधों के बावजूद धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, ज्ञानोदय, वासंती, कल्पना आदि पत्र-पत्रिकाओं में 'नवगीत' भी प्रकाशित होते रहे।


द्वितीय चरण के नवगीतों में धर्मवीर भारती का 'फागुन की शाम', 'डोले का गीत', 'वेला महका', 'बोवाई का गीत', केदार सिंह की 'दुपहरियीं फागुन का गीत', 'पात नये आ गए', 'धानों का गीत और रात' आदि उल्लेखनीय हैं। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना के 'सुहागिन के गीत', 'बंजारे का गीत', 'सावन का गीत', 'झूले का गीत', 'चरवाहों का युगल गान', 'आँधी पानी आया' आदि गीतों में लोकतत्त्व की प्रधानता है।


इसी कालखण्ड में अज्ञेय के 'इन्द्रधनुष रौंदे हुए ये', 'हरी घास पर क्षण भर', 'बावरा अहेरी' आदि काव्य-संग्रहों में गिरिजा कुमार माथुर के 'नाश और निर्माण', 'धूप की धान', 'शीलापं ख चमकीले' आदि काव्य- संग्रहों में,

धर्मवीर भारती के 'ठण्डा लोहा', 'सात गीत वर्ष' आदि काव्य-संग्रहों में नरेश मेहता के 'वनपाखी सुनो' आदि काव्य-संग्रहों में, शम्भुनाथ सिंह के समय की शिला पर आदि काव्य-संग्रहों में, जगदीश गुप्त के 'नाव के पाऊँ', 'हिमदंश' आदि काव्य-संग्रहों में ठाकुर प्रसाद सिंह के 'वंशी और बादल' आदि काव्य-संग्रहों में, रामदरश मिश्र के 'बैरन बेनाम चिट्ठियाँ', 'पक गई है धूप' आदि काव्य-संग्रहों में केदारनाथ सिंह के 'अभी 'बिलकुल अभी' आदि काव्य-संग्रहों में, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के 'काठ की धन्तियों' आदि काव्य-संग्रहों में, रवीन्द्र भ्रमर के 'रवीन्द्र भ्रमर की गीत' आदि काव्य-संग्रहों में, वीरेन्द्र मिश्र के 'गीतम' आदि काव्य-संग्रहों में, भवानी प्रसाद मिश्र के 'गीत-फरोश' आदि काव्य-संग्रहों में और राजेन्द्र प्रसाद सिंह की 'आओ खुली बयार' आदि काव्य-संग्रहों में नवगीत अपने उत्कर्ष को प्राप्त हुआ।


तृतीय चरण: 1971 से अद्यतन


'नवगीत' की विकास-यात्रा के तृतीय चरण के दौर में जहाँ 'नयी कविता' के कवि अपनी सांस्कृतिक भूमि को त्यागकर आधुनिकता में ही लीन हो गए वहीं नवगीतकारों ने भारतीय परम्परा की आधारभूमि पर ही नवगीत को आधुनिकता की ओर अग्रसर किया। 'नवगीत' के इस तेवर को न अपना सकने के कारण कुछ कवि 'जनवादी कविता' आदि खेमों की ओर मुड़ गए, तो शेष कवि अपनी पूरी ताकत के साथ 'नवगीत' को एक नया आयाम देने में जुट गए।


नवगीत विकास के तृतीय चरण में कई नवगीतकारों के काव्य-संकलन प्रकशित हुए जिसमें ओम प्रभाकर- कृत 'पुष्प चरित', उमाकान्त मालवीय- कृत 'सुबह रक्त पलाश की',

डॉ० शंभुनाथ सिंह-कृत 'जहाँ दर्द नीला है', अनूप अशेष-कृत 'लौट आयेंगे सगुन पंछी', सुरेश श्रीवास्तव कृत 'रितु वृन्दावन' एवं नीम- कृत 'पथराई आँखें' ही सही अर्थों में नवगीतों के संकलन हैं।


नवें दशक के पूर्वार्द्ध में प्रकाशित महेश्वर तिवारी कृत 'हरशृंगार कोई तो हो', विनोद निगम-कृत 'जारी हैं। लेकिन यात्राएँ', कृष्ण तिवारी- कृत 'सन्नाटे की झील' उमाकान्त मालवीय- कृत 'एक चावल नेह रिधा' इत्यादि काव्य संकलन विशुद्ध नवगीत हैं।


अपने विकास क्रम के तीसरा चरण में नवगीत ने चरमोत्कर्ष प्राप्त किया। इस कालखण्ड के नवगीतकारों में शिवबहादुर सिंह भदौरिया, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र,

सोम ठाकुर, देवेन्द्र कुमार, ओम प्रभाकर, भगवान स्वरूप, कुमार रवीन्द्र, राजेन्द्र गौतम, डॉ० कुँवर 'बेचैन, योगेन्द्र शर्मा, बुद्धिनाथ मिश्र, वीरेन्द्र मिश्र, रमेश रंजक, कैलाश गौतम, रामनरेश पाठक, शलभ, देवेन्द्र आर्य और अवध बिहारी श्रीवास्तव इत्यादि का महत्त्वपूर्ण स्थान है।


प्रमुख नवगीतकार


नवगीत परम्परा के प्रमुख नवगीतकार और उनकी नवगीत-संग्रहों के नाम इस प्रकार हैं-


(i) धर्मवीर भारती


ठण्डा लोहा, सात गीत वर्ष


(ii) शंभुनाथ सिंह


(iii) नरेश मेहता


समय की शिला पर


वनपाखी सुनो


(iv) जगदीश गुप्त


नाव के पाऊँ, हिमदेश


(v) ठाकुर प्रसाद सिंह


 (vi) रामदरश मिश्र


वंशी और बादल


बैरंग बेनाम चिट्ठियाँ(vii)


रवीन्द्र भ्रमर


रवीन्द्र भ्रमर के गीत


(viii) राजेन्द्र प्रसाद सिंह


आओ खुली बयार, गीतांगिनी


इनके अतिरिक्त चन्द्रदेव सिंह द्वारा सम्पादित 'पंच जोड़ बांसुरीं नवगीत संग्रह भी महत्त्वपूर्ण कृति है । ठाकुर प्रसाद सिंह का 'वंशी और बादल' नवगीत के स्वरूप और विशेषताओं पर व्यापक प्रकाश डालने वाला एक महत्त्वपूर्ण गीत-संग्रह है। इसमें लोकजीवन और लोकभाषा का सहज संस्पर्श विद्यमान है। साथ ही साथ गीतकार द्वारा दृश्य के रागात्मक भावों का सहज स्फुरण भी दर्शनीय है। इसमें गर्मी अंचल के लोकजीवन से संवेदनशील जीवन-सन्दर्भ एवं सौन्दर्यपरक बिम्ब चुने गए हैं और सामाजिक विषमता का भाव भी कहीं-कहीं उभरा है किन्तु प्रायः रागतत्त्व के आधिक्य के कारण दब-सा गया है।


वस्तुतः 'नवगीत' राग को यथार्थ से अनुबन्धित कर जीवन को नये सिरे से समायोजित करने की एक चेष्टा है। पहले-पहल यह प्रयास धर्मवीर भारती के 'सात गीत वर्ष' में दिखता है। उन्होंने युगीन संक्रान्ति को व्यक्त करने के लिए मध्यमवर्ग की पीड़ा को अपना वर्ण्य विषय बनाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त युवा पीढ़ी निरर्थकता बोध से कुण्ठित हो जिस तनाव से जूझ रही थी और अपने अस्तित्व के प्रति संशयग्रस्त थी उस एकाकीपन, संत्रास, पीड़ा, छटपटाहट, उच्चाटन, द्विविधाग्रस्त मानसिकता और किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति का 'सात गीत वर्ष' में सफल चित्रण हुआ है। भाव और भाषा दोनों ही दृष्टि से इसमें युग-संक्रान्ति की झलक विद्यमान हैं।


उपर्युक्त नवगीतकारों के साथ ही डॉ० शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, रामदरश मिश्र, शिव बहादुर सिंह भदौरिया, रामचन्द्र चन्द्र भूषण, शिव बहादुर सिंह भदौरिया, गोपालदास सक्सेना 'नीरज', देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, सोम ठाकुर, देवेन्द्र कुमार, ओम प्रभाकर, भगवान स्वरूप, कुमार रवीन्द्र, राजेन्द्र गौतम, डॉ० कुँवर 'बेचैन, योगेन्द्र शर्मा, बुद्धिनाथ मिश्र, वीरेन्द्र मिश्र, रमेश रंजक, कैलाश गौतम, रामनरेश पाठक, शलभ, देवेन्द्र आर्य और अवध बिहारी श्रीवास्तव नवगीत परम्परा के प्रमुख नवगीतकार हैं।