आलोचना की आवश्यकता - need for criticism

पुस्तक समीक्षाओं से लेकर व्यवस्थित सैद्धान्तिक विवेचन तक के सभी कार्य आलोचना के अन्तर्गत आते हैं। पुस्तक समीक्षाओं के रूप में या लेखक विशेष पर केन्द्रित आलोचनाओं के आधार पर रचनाओं और लेखकों के मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया आरम्भ होती है। डॉ. रामविलास शर्मा ने अपने आलोचक बनने की परिस्थिति के सम्बन्ध में लिखा है कि यदि उनके प्रिय कवि निराला पर द्वेषपूर्ण आक्षेप न लगाए गए होते तो वे आलोचना के क्षेत्र में नहीं आते। आलोचना के क्षेत्र में आकार डॉ. रामविलास शर्मा ने न केवल साहित्य की परम्परा का मूल्यांकन किया, बल्कि साहित्य, विशेष रूप से हिन्दी साहित्य की हमारी समझ का भी परिवर्द्धन और परिष्कार किया।


कुछ आलोचक मानते हैं कि साहित्य को अन्य विषयों से अलग हटाकर उस पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन साहित्य एक मानवीय कर्म और उत्पादन है और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य के किसी भी कार्य को न केवल स्वयं उसके अन्य कार्यों से अलग करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि उसके वातावरण तथा दूसरों के कार्यों से भी अलगाकर नहीं देखा जा सकता । इसलिए साहित्य को भी मनुष्य-जीवन के अन्य ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक विषयों से अलग करना न सम्भव है और न ही उचित यह आश्चर्यजनक नहीं है कि महान् आलोचकों ने साहित्य और अन्य विषयों के बीच कोई सीमा रेखा नहीं मानी है।


साहित्यिक आलोचना के अध्ययन की सबसे अधिक आवश्यकता इसलिए है कि साहित्य और साहित्य- सृजन की परम्पराएँ जटिल होती हैं और उनकी व्याख्या के लिए नयी-नयी रणनीतियाँ विकसित होती रहती हैं। आलोचना किसी रचना के सम्बन्ध में पाठक की अभिरुचि जगाने, किसी विशेष रचना के बारे में उसके अभिमत को परिवर्तित करने तथा हमारे लिए उस रचना का महत्त्व बताने के लिए उसकी व्याख्या और मूल्यांकन करती है । आलोचना रचना के आर-पार देखती है और हर तरह के छल छद्म को फटकती हुई रचना का वास्तविक अर्थ पाठक के लिए खोलती है।