कविता के नये प्रतिमान - new paradigm of poetry
1936 ई. में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के साथ ही हिन्दी आलोचना में मार्क्सवाद का आगमन होता है। मुक्तिबोध के काव्य-चिन्तन पर प्रगतिवाद और आधुनिकतावाद का गहरा प्रभाव पड़ा है। मुक्तिबोध के आलोचना कर्म की शुरूआत से पहले हिन्दी मार्क्सवादी आलोचना दृष्टि का एक रूप बन गया था। शिवदान सिंह चौहान, प्रकाशचन्द्र गुप्त, रांगेय राघव आदि का लेखन उनके समक्ष मौजूद रहा। इस दृष्टि के विरोध में अज्ञेय के नेतृत्व में प्रयोगवादियों ने आधुनिकतावादी दृष्टि सामने रखी। इन दोनों विचारधाराओं के समर्थकों में काफी संघर्ष हुआ जो आगे चलकर 'अबोला' में परिणत हो गया। मुक्तिबोध ने इस संघर्ष में भाग लिया। मुक्तिबोध के आलोचना कर्म की व्युत्पत्ति इसी संघर्ष से हुई। उन्होंने प्रगतिवादी आलोचना की कमियों की ओर संकेत करते हुए वस्तुनिष्ठ आलोचना पद्धति के विकास पर बल दिया।
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