नयी कविता : शिल्प एवं संवेदना पक्ष - New Poem: Craft and Sensational Side

नयी कविता की जिन प्रवृत्तियों का ऊपर उल्लेख किया गया है, उनमें कई स्थानों पर प्रयोगवाद की छाया अवश्य दिखाई देती है (क्यों न दिखे, आखिर 'प्रयोगवाद मर गया और मरते-मरते अपने प्राण नयी कविता को सौंप गया' जैसे वक्तव्य भी इसी बात को प्रमाणित करते हैं कि नयी कविता प्रयोगवाद की अगली कड़ी है) लेकिन इस बात को भी स्वीकारना होगा कि नयी कविता का अपना अलग अस्तित्व भी है। प्रयोगवाद मूलतः एक कलावादी आन्दोलन था । उसमें काव्य-भाषा, छन्द, बिम्बालंकार आदि शिल्प सम्बन्धी मुद्दों पर खूब विचार हुआ था । कला-पक्ष से सम्बन्धित प्रयोगवाद का नया संस्कारित रूप नयी कविता है अतः बहुत स्वाभाविक है कि नयी कविता का ध्यान काव्य-शिल्प पर अत्यधिक मात्रा में केन्द्रित रहा।

अभिव्यक्ति की प्रणाली को लेकर दुर्दम्य आग्रह न केवल 'फॉर्म' में बदलाव लाया बल्कि 'कंटेंट' में भी एक ताज़गी भर गया। नयी कविता में प्रवेश करने के साथ-साथ कविता का शिल्प और संवेदना-पक्ष दोनों में बदलाव देखा जा सकता है। नयी कविता ने, जैसा कि उसकी विशेषताओं से स्पष्ट होता है, सामान्य जनजीवन के प्रति 'कंसर्न' को महत्त्व दिया। इसी के चलते उसने अपने कथ्य में युगानुरूप विषयों को स्थान दिया। साथ ही, इन विषयों को अभिव्यक्त करने के लिए नयी-नयी अभिव्यक्ति शैलियों का प्रयोग किया। नयी कविता यह घोषित कर चुकी थी कि वह बौद्धिकता में विश्वास रखती है । वह तो यह तक मानती है कि सृजन के क्षण उतने विशिष्ट नहीं, जितने नयी कविता के आस्वादन के क्षण महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट होते हैं।

आस्वादन- पक्ष और उससे जुड़े पाठक से इस बौद्धिक कविता को कई उम्मीदें हैं। वह अपनी रचनाएँ एक ऐसे स्तरीय पाठक के लिए गढ़ती है जिसका कला बोध नये कवियों का-सा हो। इस सन्दर्भ में डॉ. जगदीश गुप्त का कथन विचारणीय है- "वह उन विवेकशील आस्वादकों को लक्षित करके लिखी जा रही है जिनकी मानसिकता अवस्था और बौद्धिक चेतना नये कवि के समान है अर्थात् जो उसके समानधर्मा हैं, जो एक ओर पुरानी कविता की अभिव्यंजना प्रणालियों, शक्तियों और सीमाओं से परिचित हैं और जिनकी परितृप्ति परम्परागत वस्तु और अभिव्यक्ति से सम्पूर्ण रूप में नहीं होती, और दूसरी ओर जो दिशाएँ खोजने में संलग्न नूतन प्रतिभा की क्षणिक असफलताओं और कठिनाइयों के प्रति सहानुभूतिशील होकर नये कवि की वास्तविक उपलब्धि की आशंसा करने में संकोच नहीं करते। *24 पाठकों को ही बौद्धिक होने का आग्रह करने वाली नयी कविता जटिलता, दुरूहता को अपने भीतर जुटाए हुए है।

नयी कविता ने अपने शिल्प को एकदम महीन-सा गढ़ लिया है। पारम्परिक पैटर्न पर चलना उसे स्वीकार नहीं सो जिन नयी राहों पर वह चलती है, वह हर राह नये ताज़गी भरे पैटर्न के रूप में उभर आती है। विषयवस्तु का वैविध्य नयी कविता को न केवल पारम्परिक लीक से मुक्त कर देता है बल्कि उसमें नयापन भी भर देता है। विषय-पक्ष और कला-पक्ष की एकता नयी कविता को अपेक्षित है। इस सन्दर्भ में विष्णुचन्द्र शर्मा कहते हैं- "आज की सभ्यता के उपकरण उसकी कविता के शिल्प के माध्यम हैं और संस्कृति के जातीय विकास से उसे काव्य-संस्कार के प्रश्न मिले हैं। 25 नयी कविता नये विषय और उनकी नयी प्रकार से अभिव्यक्ति करने में जुट गई। शिल्प के प्रति अतिरिक्त सजगता नयी कविता की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। टी. एस. इलियट की कृति 'वैस्ट लैंड' और एजरा पाउंड की रचना 'कैंटोज' के शिल्प ने नयी कविता के शिल्प को अत्यधिक मात्रा में प्रभावित किया। वर्तमान के प्रति असंतोष और भविष्य में आस्था जताना नये कवियों ने अपनी काव्य-भाषा के माध्यम से सम्भव बनाया।

नयी कविता में काव्य-भाषा के नयेपन को लेकर कई बार अतिरिक्त आग्रह भी झलकता है जो नयी कविता के विरोधकों को विरोध के लिए पर्याप्त सामग्री भी दे जाता है। उदाहरणार्थ मदन वात्स्यायन की 'केट केली' कविता-


"केट केली' चल दी


चीरती गई सड़क को विरल-वसना, अविरल रसना, बर्र कटि, चटपटी कथा, लौंग जैसी, बिच्छी जैसी, शामी कबाब जैसी, बंदूक बुलेटजैसी अप्सरा । 26


नयी कविता को उपर्युक्त किस्म के भटकाव से बचाने का काम अज्ञेय और शमशेर ने किया। अज्ञेय ने बिम्ब-विधान और प्रतीक-विधान पर अत्यधिक बल दिया। साथ ही, इस बात का ध्यान भी रखा कि नयी कविता का बिम्ब-विधान चित्रात्मक और ताज़गी भरा हो किन्तु परम्परा से विछिन्न न हो। एक अतिप्रचलित किन्तु सटीक उदाहरण के रूप में अज्ञेय की 'कलगी बाजरे की' की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-


अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता,


या शरद के भोर की नीहार न्हायी कुँई। टटकी कली चम्पे की, वगैरह, तो नहीं कारण कि मेरा हृदय उथला या कि सूना है या कि मेरा प्यार मैला है


बल्कि केवल यही ये उपमान मैले हो गये हैं । देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच ।


कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है। "



प्रेम के प्रति आस्था और परम्परा से कटे बिना नयी भाषा और शैली में अभिव्यक्ति को प्रधानता देना नये


कवियों को अधिक उचित लगा।


मुक्तिबोध ने नयी कविता की काव्य-भाषा को फंतासी और बिम्ब-विधान से संवारा। अपनी अभिव्यक्ति के लिए नये कवियों को प्रकृति, पुराण, विज्ञान जहाँ-जहाँ से कच्ची सामग्री मिली, नये कवियों ने स्वीकारी और उसमें भरपूर चित्रात्मकता और अपना 'टच' भरकर स्वयं को अभिव्यक्त किया-


ताँबे का आसमान


टीन के सितारे


गैसीला अन्धकार


उड़ते हैं कसकुट के पंछी बेचारे।


लोहे की धरती पर


चाँदी की धारा


पीतल का सूरज है


राँगे का भोला-सा चाँद बड़ा प्यारा।


गन्धक का झौंका है


आदमी धुएँ के हैं (छाया ने रोका है।)


हीरे की चाहत ने घड़ी घड़ी टोका है,


शीशे ने समझा कि रेडियम का मौका है।


धूल 'अनकल्चर्ड' है, इसीलिए बकती है।


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जिंदगी नहीं है यह, धोखा है, धोखा है। # 28


आधुनिक समय की तमाम चिन्ताओं को काव्य भाषा की ताकत के माध्यम से व्यक्त करने में नये कवियों


को महारथ हासिल थी।


व्यंग्य और नयी कविता एक अद्भुत समीकरण है। नये कवियों ने जिस प्रकार व्यंग्य जैसे शस्त्र का अचूक प्रयोग किया, अन्यत्र दुर्लभ है। नयी कविता में यह अभिव्यक्ति का अनिवार्य साधन बन गया।

नयी कविता के लगभग सभी कवियों ने प्रखर व्यंग्य में अपनी बात कही। व्यंग्य को नये आयाम प्रदान करनेवाले अज्ञेय की कविता देखिए-


साँप !


तुम सभ्य तो हुए नहीं


नगर में बसना


भी तुम्हें नहीं आया।


एक बात पूछूं- (उत्तर दोगे ?)


तब कैसे सीखा डँसना- विष कहाँ पाया ?29



राजनीति, धर्म, दर्शन, आधुनिक जीवन की विडम्बनाएँ, मानवी जीवन की शोचनीय परिणति को व्यंग्य द्वारा बड़ी ही सटीक पद्धत्ति से अभिव्यक्त किया गया।

इसमें कई बार हताशा-निराशा उभर आयी। इन सभी ने मिलकर नयी कविता की भाषा को विशिष्ट नयापन प्रदान किया


श्रवण कीर्तन जप-तप नाना


से रहस्य हमने यह जाना शरणागत को मुक्ति मिलेगी विद्रोही को नहीं ठिकाना बड़े पुराने पंडे हैं हम गंग-जमुन के पुण्य तीर के।


हम फकीर हैं इस लकीर के। 30


अज्ञेय का ठण्डा तीखा व्यंग्य और अजित कुमार का मृदुल व्यंग्य दोनों ही शैलियों को नयी कविता की काव्य भाषा ने बखूबी समेटा ।


नयी कविता ने यौन प्रतीकों का अतिरिक्त प्रयोग किया। 'नदी की जाँघ पर सो रहे अन्धकार' का चित्रण काव्य-भाषा की नवीनता का परिचय तो अवश्य देता है,

भले ही संवेदना व वस्तु के स्तर पर इस प्रकार का कथन ग्राह्य हो या न हो। यौन भावना ने आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं में आश्रय पाकर विचित्र अभिव्यक्तियों को जन्म दिया । इसके परिणामस्वरूप नयी कविता में कभी भदेसपन, कभी ऊब, कभी निराशा तो कभी विकृति उभर आयी।


मेरे मन की अँधियारी कोठरी में अतृप्त आकांक्षा की वेश्या बुरी तरह खाँस रही है"


जैसी कविता हो या अनास्था प्रदर्शक निम्नलिखित कविता हो-


लगता है, कहीं कोई ठौर नहीं,


आज का मनुष्य गर्भ से धक्के देकर निकाला हुआ


ऋषि-पुत्र"


ऐसी अभिव्यक्तियाँ नयी कविता में विरूपता का समावेश कर देती हैं। इनकी भाषा आदि में नयापन अवश्य है किन्तु यह मन-मस्तिष्क में स्वस्थ-बोध नहीं जगाता। ठीक इसी प्रकार शिल्प-तन्त्र के अतिरेक का सर्वोच्च दुष्परिणाम भी नयी कविता में ही देखा जा सकता है-


प्रेम की ट्रैजेडी


(हाय (0)


(नहीं चैन


जगते ही कट गई रैन ...)


-


-


(प्रेम यानी इश्क यानी लव !)


?


( अरमानों के गाल पर चाँटा झरबेरी का काँटा) ?


- (मुहब्बत में घाटा !!)


यह सच है कि ऐसी कविताओं को सिद्धान्त कथन का आधार नहीं बनाना चाहिए। बावजूद इसके, चमत्कारप्रधानता व अनोखी काव्य भाषा के प्रति कवियों में निहित आसक्ति का परिचय ऐसी कविताओं से मिल जाता है। किन्तु ऐसी कविताओं के सन्दर्भ में जगदीश गुप्त कहते हैं कि "हमें अशक्त की चिन्ता छोड़ - शक्तिसम्पन्न कविता पर ही विचार करना चाहिए। 934 सशक्त कविताओं पर बात करने की ठान लें तो 'नयी 'कविता का मैनीफेस्टो' कहलाई जाने वाली, सहज भाषा में समष्टिवाद की व्यंजना करती अज्ञेय की कविता का उल्लेख अनिवार्य है -


यह दीप अकेला स्नेह भरा


है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। 35


नयी कविता की विशेषताओं में, जैसा कि संकेत दिया जा चुका है अर्थ की लय पर विशेष बल दिया है। छन्द की लय की तुलना में काव्य-भाषा के अन्तर्गत अर्थ की लय महत्त्वपूर्ण मानने के कारण काव्य-भाषा गद्य के निकट आ गई।

कई बार इसकी तुलना बी.बी.सी. पर प्रसारित वार्ता के साथ की गई। किन्तु नयी कविता अपनी अर्थगत लय, भाषा में संगीतात्मकता सम्बन्धी अपने विचार और कुल काव्य-तत्त्व के सम्बन्ध में अपने मतों पर अडिग रही। अज्ञेय ने स्पष्ट किया "साधारण का साधारण वर्णन कविता नहीं है। कविता तभी होती है जब - साधारण पहले निजी होता है और फिर व्यक्ति से छनकर साधारण होता है। जो इसको भूलते हैं उनके पद्य परम सदुद्देश्यपूर्ण होकर भी कविता नहीं बन सकते और चाहे जो कुछ हो जावे।"" नयी कविता जैसा कि बार-बार कहा जा चुका हैं, अपने रूप-विधान को लेकर अत्यधिक सजग कविता है। नयी कविता ने अपने वर्ण्य विषयों को समसामयिक जीवन से उठाया। परिणामतः भाषा भी नयी और जीवन्त हो उठी 'सब कुछ नया' अपनाते हुए नयी कविता सभी अर्थों में नयी हो उठी "नयी कविता का रूप विधान भी नयी मनःस्थिति के अनुरूप नया संतुलन खोजता विकसित हो रहा है।

जिस प्रकार आज के जीवन में अनावश्यक बन्धनों और विधि-निषेधों के प्रति अरुचि दिखाई देती है उसी प्रकार छन्द-विधान में भी स्वतन्त्रता का आग्रह अधिकाधिक विकसित हो रहा है। कथ्य की शक्तिमत्ता और महत्ता के साथ कथन की यथासम्भव अकृत्रिमता इस युग की कविता की एक विशेषता कही जा सकती है । " 37 इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि नयी कविता की भाषा कई बार विचित्र- अतिविचित्र बन उभरी है, शिल्प के अतिरेक के कारण बेतुकी बनी है। किन्तु यह भी सत्य है कि नयी काव्य-भाषा में तुलनात्मक दृष्टि से अधिक संतुलन और अधिक सुलझापन है। नयी कविता की भाषा में जो सर्वस्तरीय नयापन पाया जाता है, उसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि नयी कविता ने आधुनिक बोध अपनाया। नयी कविता के समस्त साधनों में नयापन भरने का श्रेय नयी कविता के आधुनिक बोध को जाता है।