आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहास दृष्टि की नवीनता - Newness of history vision of Acharya Hazariprasad Dwivedi

साहित्येतिहासकार की इतिहास दृष्टि का निर्माण साहित्य सम्बन्धी उसकी समझ और जीवन-दृष्टि के आधार पर होता है। द्विवेदी जी के अनुसार इतिहास मनुष्य जीवन के अखण्ड प्रवाह का अध्ययन है। साहित्य के इतिहास में हम अपने समाज के विकास को जानने के साथ-साथ मनुष्य के रूप में, उस इतिहास के निर्माता के रूप में, स्वयं को जानने के सूत्र भी प्राप्त करते हैं। साहित्य का इतिहास कृतियों, कृतिकारों या रचनात्मक गतिविधियों का तिथिक्रम मात्र नहीं होता है। उसमें साहित्य के कालक्रम के अतिरिक्त साहित्य निर्माण की परिस्थितियों, साहित्य-रूपों, भाषा और सांस्कृतिक परम्पराओं के विकास का लेखा-जोखा भी होता है।


हिन्दी साहित्य के मूल्यांकन में आचार्य शुक्ल ने जो मानदण्ड स्थापित कर दिए थे, जिस प्रकार से कवियों का स्थान निर्धारित कर दिया था और साहित्यिक विकास क्रम का निरूपण कर दिया था, उसके बाद उसमें बहुत बड़ा परिवर्तन तो क्या कवियों या साहित्यिक धाराओं की स्थिति में मामूली परिवर्तन भी साधारण प्रतिभासम्पन्न आलोचक के बूते का कार्य नहीं था। आचार्य द्विवेदी ने साहित्यकारों के महत्त्व पर शुक्ल जी से टकराते हुए हिन्दी के इतिहास और क्षेत्र का विस्तार किया। उन्होंने अपने ज्ञान और इतिहास-बोध के आधार पर न केवल साहित्य की विस्मृत परम्पराओं को प्रकाश में लाने का कार्य किया, बल्कि उन्हें हिन्दी साहित्य के इतिहास में उचित स्थान भी प्रदान किया।

शुक्ल जी का ध्यान जिन कवियों और साहित्यिक परम्पराओं की ओर नहीं गया था, द्विवेदी जी ने उनकी खोज और मूल्यांकन करके हिन्दी जगत् में स्थापित किया। उन्होंने कई कवियों के पुनर्मूल्यांकन की राह खोली और शुक्ल जी की धारणाओं में परिवर्तन किया। उनके अनुसार साहित्य में किसी कृति और कृतिकार के महत्त्व को निरूपित करने के लिए सामाजिक, सांकृतिक और जातीय परम्परा के प्रवाह को दृष्टिगत रखना आवश्यक होता है। इसलिए आवश्यक है कि साहित्य के आलोचक को अपनी सांस्कृतिक और जातीय परम्परा का ज्ञान और समझ हो। उन्होंने हिन्दी साहित्य के स्वरूप और विकास को भली-भाँति समझने के लिए संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश आदि भाषाओं के साहित्य का ज्ञान आवश्यक माना है तथा उसी सन्दर्भ में हिन्दी साहित्य की व्याख्या करते हुए इस परम्परा से हिन्दी के सम्बन्ध को रेखांकित किया है।


द्विवेदी जी की इतिहास दृष्टि उनके साहित्येतिहास और आलोचना के साथ-साथ उनके सर्जनात्मक साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है। उन्होंने अपने उपन्यास 'पुनर्नवा' में एक पात्र से यह महत्त्वपूर्ण बात कहलावाई है कि "ज्ञान या रस तैयार माल की तरह नहीं होते। वे इतिहास में पलते हैं और इतिहास को बनाते हैं। " 'मध्यकालीन बोध का स्वरूप' और 'कालिदास की लालित्य योजना' पुस्तकों में द्विवेदी जी ने साहित्य को अन्य कलाओं के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा है। उन्होंने रस को काव्य-कला तक ही सीमित करके नहीं देखा, बल्कि उसे संगीत, नृत्य और चित्रकला आदि ललित कलाओं के सन्दर्भ में देखा है जिससे उनकी विशिष्ट सौन्दर्य दृष्टि का पता चलता है।

द्विवेदी जी के सांस्कृतिक और साहित्यिक इतिहास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात परम्पराओं की निरन्तरता की पहचान करते हुए सामाजिक विकास को रेखांकित करने वाली अन्तर्दृष्टि है।


आचार्य द्विवेदी मनुष्य को ही साहित्य का लक्ष्य मानते हैं। इसलिए "जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके" उसे साहित्य नहीं कहा जा सकता। साहित्य का इतिहास साहित्य के अध्ययन के माध्यम से अन्ततः उसके रचयिता मनुष्य के सामाजिक और मानसिक विकास को जानने का ही माध्यम है।

द्विवेदी जी ने लिखा है कि "साहित्य का इतिहास पुस्तकों और ग्रन्थकारों के उद्भव और विलय की कहानी नहीं है। यह कालस्रोत में बहे आते हुए जीवन्त समाज की विकास-कथा है। ग्रन्थ और ग्रन्थकार उस प्राण धारा की ओर इशारा भर करते हैं। वे ही मुख्य नहीं हैं, मुख्य है वह प्राण धारा जो नाना परिस्थितियों से गुजरती हुई आज हमारे भीतर प्रकाश कर रही है। साहित्य के इतिहास से हम अपने आप को ही पढ़ते हैं, वही हमारे आनन्द का कारण होता है। यह प्राणधारा अपनी पारिपार्श्विक अवस्थाओं से विच्छिन्न और स्वतन्त्र नहीं है। इसी रूप में हमें भक्ति साहित्य को भी देखना है।" (- 'विचार और वितर्क')